नई दिल्ली | क्या आपको याद है जब बचपन में बिजली कटने पर हम छत पर लेटकर सितारों को गिना करते थे? वह चमकीली आकाशगंगा (Milky Way) अब शहरों के आसमान से ओझल हो चुकी है।
भारत के बड़े शहरों, खासकर दिल्ली और मुंबई में स्थिति अब इतनी खराब हो गई है कि रात के घने अंधेरे में भी सितारे नजर नहीं आते। हमारी आने वाली पीढ़ियों के लिए सितारे शायद सिर्फ किताबों के पन्नों तक ही सीमित रह जाएंगे।
क्या है 'बोर्टल स्केल' का गणित?
आसमान कितना अंधेरा या चमकदार है, इसे मापने के लिए 'बोर्टल स्केल' का इस्तेमाल किया जाता है। यह पैमाना 1 से 9 तक होता है। स्कोर 1 का मतलब है कि वहां सबसे गहरा प्राकृतिक अंधेरा है।
लद्दाख का हैनले इसी श्रेणी में आता है, जहां से लाखों प्रकाश वर्ष दूर की गैलेक्सी भी देखी जा सकती हैं। वहीं, दिल्ली का स्कोर 9 है, जिसका मतलब है कि यहां का आसमान बेजान और नारंगी दिखता है।
मुंबई की स्थिति भी कुछ खास अच्छी नहीं है, वहां का स्कोर 8 है। विशेषज्ञों का कहना है कि अब दिल्ली में बिजली गुल होने पर भी सितारे नहीं दिखते क्योंकि वातावरण में प्रकाश का प्रदूषण बहुत ज्यादा बढ़ चुका है।
स्ट्रीट लाइट का गलत डिजाइन है जिम्मेदार
वैज्ञानिकों के अनुसार, प्रकाश प्रदूषण का एक बड़ा कारण भारत में स्ट्रीट लाइटों का गलत डिजाइन है। अधिकांश लाइटें इस तरह लगाई जाती हैं कि उनका प्रकाश सीधे ऊपर आसमान की ओर जाता है।
यह रोशनी वातावरण में बिखर कर एक कृत्रिम धुंध पैदा कर देती है। अगर इन लाइटों पर शेड लगा दिया जाए और उनका रुख नीचे की ओर हो, तो आसमान की चमक को काफी हद तक बचाया जा सकता है।
हैनले और पेंच: उम्मीद की किरण
लद्दाख के हैनले में स्थित भारतीय खगोलीय वेधशाला (IAO) आज भी भारत की उन चुनिंदा जगहों में से एक है जहां आकाशगंगा की रोशनी से जमीन पर परछाई पड़ती है।
महाराष्ट्र का पेंच टाइगर रिजर्व भारत का पहला 'इंटरनेशनल डार्क स्काई पार्क' बना है। यहां रात में लाइटें बंद रखने से न केवल सितारे दिख रहे हैं, बल्कि वन्यजीवों का जीवन भी सुधर रहा है।
समाधान और भविष्य की राह
विशेषज्ञों का कहना है कि एस्ट्रो-टूरिज्म को बढ़ावा देने के लिए स्थानीय समुदायों को जागरूक करना जरूरी है। भारत में फिलहाल प्रकाश प्रदूषण को रोकने के लिए किसी राष्ट्रीय नीति या केंद्रीय कानून का अभाव है।
हमें यह समझना होगा कि 'अंधेरा' भी एक प्राकृतिक संसाधन है। विकास और रोशनी की होड़ में हमें अपने पुरखों की उस स्वर्णिम खगोलीय विरासत को नहीं भूलना चाहिए जो सदियों से हमारा मार्गदर्शन करती आई है।