राजनीति

बिहार राजनीति में महिलाएं: कड़वा सच: बिहार की राजनीति: महिलाओं को टिकट देने में पार्टियां पीछे

प्रदीप बीदावत · 27 अप्रैल 2026, 05:18 शाम
बिहार में महिला आरक्षण की चर्चा के बीच प्रमुख दलों में महिलाओं की वास्तविक स्थिति का विश्लेषण।

पटना | बिहार की राजनीति में इन दिनों महिला आरक्षण और नारी शक्ति वंदन अधिनियम को लेकर खूब चर्चा हो रही है। लेकिन जब हम जमीनी स्तर पर राजनीतिक दलों के भीतर महिलाओं की स्थिति देखते हैं, तो हकीकत काफी चौंकाने वाली नजर आती है। बिहार के प्रमुख राजनीतिक दल जैसे भाजपा, जदयू, राजद और कांग्रेस महिलाओं को हक देने के बड़े-बड़े दावे तो करते हैं। मगर जब टिकट बांटने या संगठन में महत्वपूर्ण पद देने की बात आती है, तो ये दल काफी पीछे छूट जाते हैं।

भाजपा: दावों और हकीकत के बीच की खाई

भारतीय जनता पार्टी केंद्र में महिला आरक्षण बिल पास कराने का श्रेय लेती है, लेकिन बिहार में स्थिति इसके विपरीत है। 2024 के लोकसभा चुनाव में भाजपा ने बिहार की 17 सीटों पर अपने उम्मीदवार उतारे थे, लेकिन एक भी महिला को टिकट नहीं दिया। इसका नतीजा यह है कि आज बिहार से भाजपा की एक भी महिला सांसद लोकसभा में मौजूद नहीं है। राज्यसभा की बात करें तो बिहार की 16 सीटों में से भाजपा की ओर से केवल धर्मशीला गुप्ता ही वहां प्रतिनिधित्व कर रही हैं। विधानसभा चुनाव 2025 के परिप्रेक्ष्य में देखें तो भाजपा ने 101 सीटों पर लड़कर 13 महिलाओं को मौका दिया था। इनमें से 10 महिलाओं ने जीत हासिल की, जो यह दिखाता है कि महिला उम्मीदवारों का सक्सेस रेट काफी अच्छा है।

संगठन में महिलाओं की मामूली हिस्सेदारी

राजनीतिक दलों में असली ताकत संगठन के पदों में होती है, जहां से महत्वपूर्ण निर्णय लिए जाते हैं। भाजपा की 35 सदस्यीय प्रदेश कमेटी में महिलाओं की हिस्सेदारी महज 15 फीसदी के आसपास सिमट कर रह गई है। पार्टी की प्रदेश पदाधिकारियों की सूची में 5 महामंत्री पदों में से केवल एक पद लाजवंती झा को दिया गया है। उपाध्यक्ष के 13 पदों में से 5 पर महिलाएं हैं, जिनमें अमृता भूषण और धर्मशिला गुप्ता जैसे नाम शामिल हैं। सचिव के पदों पर भी महिलाओं की संख्या बहुत कम है, जो निर्णय लेने की प्रक्रिया में उनकी कमी को दर्शाता है। रीता शर्मा, शोभा सिंह और पूनम रविदास जैसी नेता संगठन में मंत्री के रूप में काम तो कर रही हैं, पर प्रभाव सीमित है।

जदयू: महिला वोटर्स पर नजर, संगठन में डगर कठिन

मुख्यमंत्री नीतीश कुमार को बिहार में महिलाओं का सबसे बड़ा हितैषी माना जाता है, क्योंकि उन्होंने शराबबंदी जैसे फैसले लिए। जदयू ने 2024 के लोकसभा चुनाव में 2 महिलाओं को टिकट दिया और सुखद बात यह रही कि दोनों ने जीत दर्ज की। लेकिन जब बात संगठन की आती है, तो जदयू के भीतर भी महिलाओं को वह जगह नहीं मिली है जिसकी वे हकदार हैं। जदयू की राष्ट्रीय कार्यकारिणी में 24 सदस्यों में से केवल 2 महिलाओं को ही जगह मिल पाई है, जो 10% से भी कम है। प्रदेश कमेटी में भी 115 सदस्यों के बीच मात्र 9 महिलाएं शामिल हैं, जो पार्टी के दावों पर सवाल खड़े करती हैं।

जदयू की महिला पदाधिकारियों की स्थिति

पार्टी में कहकशां परवीन को महासचिव और रुही तागुंग को सचिव जैसे पदों की जिम्मेदारी दी गई है। प्रदेश स्तर पर प्रमिला कुमारी उपाध्यक्ष हैं, जबकि मंजू कुशवाहा और सविता नटराज जैसी नेता सचिव के पद पर हैं। नीतीश कुमार ने पंचायत चुनावों में महिलाओं को 50% आरक्षण दिया, लेकिन उनकी अपनी पार्टी में यह आंकड़ा काफी कम है। महिलाएं चुनावों में जदयू के लिए साइलेंट वोटर का काम करती हैं, फिर भी नेतृत्व में उनकी कमी खलती है। पार्टी के भीतर महिलाओं को सशक्त बनाने के लिए अभी बहुत काम किया जाना बाकी है ताकि वे निर्णय ले सकें।

राजद: परिवार की महिलाओं को ही प्राथमिकता

राष्ट्रीय जनता दल यानी राजद ने पिछले लोकसभा चुनाव में सबसे ज्यादा 6 महिला उम्मीदवारों को मैदान में उतारा था। हालांकि, इन 6 में से केवल लालू यादव की बेटी मीसा भारती ही चुनाव जीतने में सफल हो पाईं। राजद के मामले में एक खास बात यह है कि यहां सक्रिय महिला नेताओं में ज्यादातर किसी न किसी राजनीतिक परिवार से हैं। राबड़ी देवी, मीसा भारती और रोहिणी आचार्य जैसे नाम पार्टी के सबसे प्रमुख चेहरों में गिने जाते हैं। आम कार्यकर्ताओं के बीच से महिलाओं का नेतृत्व उभरकर सामने आना राजद में अभी भी एक बड़ी चुनौती बनी हुई है।

राजद संगठन में महिलाओं का स्थान

लालू यादव द्वारा घोषित 28 सदस्यीय राष्ट्रीय कार्यकारिणी में 5 महिलाओं को स्थान दिया गया है, जो एक सकारात्मक संकेत है। लेकिन प्रदेश कार्यकारिणी में महासचिव जैसे महत्वपूर्ण पद पर एक भी महिला को नियुक्त नहीं किया गया है। उपाध्यक्ष के पदों पर शोभा प्रकाश कुशवाहा और मधु मंजरी जैसी महिलाओं को जगह देकर संतुलन बनाने की कोशिश की गई है। पार्टी के भीतर राबड़ी देवी का कद सबसे बड़ा है, जो उपाध्यक्ष के रूप में पार्टी का मार्गदर्शन करती रहती हैं। फिर भी, राजद को अपने कैडर से नई महिला नेताओं को तराशने की जरूरत है जो परिवारवाद से बाहर हों।

कांग्रेस: बिहार में महिलाओं का सूखा

बिहार में कांग्रेस की स्थिति महिलाओं के प्रतिनिधित्व के मामले में सबसे ज्यादा चिंताजनक दिखाई देती है। 2024 के लोकसभा चुनाव में कांग्रेस 9 सीटों पर लड़ी, लेकिन उसने एक भी महिला को उम्मीदवार नहीं बनाया। विधानसभा चुनावों में भी कांग्रेस ने 61 सीटों पर उम्मीदवार उतारे, जिनमें से केवल 5 महिलाएं थीं। दुखद पहलू यह है कि कांग्रेस की एक भी महिला प्रत्याशी चुनाव जीतकर सदन तक नहीं पहुंच सकी। पार्टी की प्रदेश इकाई का गठन अभी पूरा नहीं हुआ है, जिससे महिलाओं की संगठनात्मक स्थिति स्पष्ट नहीं है।

वोटिंग में आगे, प्रतिनिधित्व में पीछे

बिहार की राजनीति का सबसे दिलचस्प आंकड़ा यह है कि यहां महिलाएं पुरुषों से कहीं ज्यादा बढ़-चढ़कर मतदान करती हैं। 2025 के चुनावों में महिलाओं का वोटिंग प्रतिशत पुरुषों की तुलना में 9.8% अधिक रहा है, जो एक रिकॉर्ड है। 2010 से ही बिहार में महिला वोटर्स ने लगातार पुरुषों को पीछे छोड़ा है, जिससे वे एक निर्णायक शक्ति बन गई हैं। लेकिन विडंबना यह है कि 1985 से 2005 के बीच विधायकों में महिलाओं की संख्या 6% से भी कम हुआ करती थी। आज यह आंकड़ा बढ़कर 14% तक पहुंचा है, लेकिन यह अभी भी आबादी के अनुपात में बहुत कम है।

नेतृत्व के संकट और सामाजिक बाधाएं

बिहार की किसी भी पार्टी ने आज तक किसी महिला को अपना प्रदेश अध्यक्ष बनाने का साहस नहीं दिखाया है। इसका मुख्य कारण यह माना जाता है कि पार्टियां अभी भी महिलाओं को स्वतंत्र नेतृत्व देने में हिचकिचाती हैं। ज्यादातर मामलों में महिलाओं को 'टोकन' के तौर पर पद दिए जाते हैं, जबकि असली कमान पुरुषों के हाथ में होती है। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि जब तक पार्टियों के भीतर का पितृसत्तात्मक ढांचा नहीं बदलेगा, स्थिति नहीं सुधरेगी। महिलाएं केवल वोट बैंक बनकर रह गई हैं, नीति निर्धारक बनने का उनका सपना अभी भी अधूरा है।

निष्कर्ष: बदलाव की जरूरत

बिहार में महिला आरक्षण बिल के लागू होने के बाद उम्मीद की जा रही है कि परिदृश्य में बदलाव आएगा। लेकिन केवल कानून बना देने से सामाजिक और राजनीतिक मानसिकता को बदलना मुमकिन नहीं होगा। राजनीतिक दलों को स्वेच्छा से महिलाओं को संगठन और टिकट वितरण में कम से कम 33% हिस्सेदारी देनी चाहिए। जब तक महिलाएं सदन में अपनी बात खुद नहीं रखेंगी, तब तक उनके मुद्दों का समाधान होना मुश्किल है। बिहार की आधी आबादी अब अपने हक के लिए जागरूक हो चुकी है और पार्टियों को इसे समझना होगा। बिहार में महिलाएं वोट तो ज्यादा देती हैं, लेकिन उन्हें नेतृत्व का मौका नहीं मिलता। राजनीति में महिलाओं की यह लड़ाई केवल सीटों के लिए नहीं, बल्कि अपनी पहचान और सम्मान के लिए भी है। आने वाले समय में यह देखना दिलचस्प होगा कि कौन सी पार्टी वास्तव में महिलाओं को नेतृत्व सौंपती है।

*Edit with Google AI Studio

← पूरा आर्टिकल पढ़ें (Full Version)