नई दिल्ली | संसद में गुरुवार को महिला आरक्षण कानून में संशोधन से जुड़े तीन महत्वपूर्ण विधेयक पेश किए गए। कानून मंत्री अर्जुन मेघवाल ने इन बिलों को सदन के पटल पर रखा।
इन विधेयकों का मुख्य उद्देश्य वर्ष 2029 तक महिलाओं के लिए आरक्षण की व्यवस्था को पूरी तरह लागू करना है। इसके साथ ही लोकसभा में सांसदों की संख्या 850 करने का प्रस्ताव है।
सदन में जोरदार हंगामा और विरोध
विधेयक पेश होते ही लोकसभा में विपक्षी दलों ने जमकर विरोध प्रदर्शन किया। समाजवादी पार्टी (सपा) ने इस कानून के मौजूदा स्वरूप पर सवाल उठाए और सदन में तीखी बहस हुई।
सपा सांसद अखिलेश यादव के सवालों का जवाब देते हुए गृह मंत्री अमित शाह ने सरकार का पक्ष मजबूती से रखा। उन्होंने कहा कि यह कदम महिला सशक्तिकरण की दिशा में मील का पत्थर है।
विपक्ष की मांग और वोटिंग प्रक्रिया
सदन में बिलों को पेश करने के बाद सरकार ने इन्हें ध्वनि मत से पास कराने का प्रयास किया। हालांकि, विपक्षी दलों ने पारदर्शिता के लिए डिवीजन वोटिंग की मांग पर जोर दिया।
स्पीकर ने इस मांग को स्वीकार करते हुए इलेक्ट्रॉनिक वोटिंग की प्रक्रिया शुरू की। इस दौरान सदन की कार्यवाही कुछ समय के लिए रुकी रही और तकनीकी पहलुओं को जांचा गया।
मतदान के दौरान सरकार के पक्ष में 251 सांसदों ने वोट डाले। वहीं, विपक्ष के विरोध में केवल 185 वोट ही पड़े। इस प्रक्रिया ने सरकार की विधायी मजबूती और बहुमत को स्पष्ट किया।
सचिवालय के निर्देश और पारदर्शिता
लोकसभा के सचिव-जनरल उत्पल सिंह ने सदस्यों को वोटिंग की बारीकियों से अवगत कराया। उन्होंने कहा कि सही समय पर बटन दबाना डेटा रिकॉर्ड करने के लिए अत्यंत आवश्यक है।
यदि किसी सदस्य को इलेक्ट्रॉनिक सिस्टम में समस्या आती है, तो वह स्लिप के माध्यम से अपना मत दर्ज करा सकता है। यह सुनिश्चित करता है कि हर सांसद की राय सही ढंग से गिनी जाए।
डिलिमिटेशन और भविष्य की रणनीति
बीजेपी सांसद कमलजीत सेहरावत ने 1971 की जनगणना और 1976 के परिसीमन का हवाला दिया। उन्होंने स्पष्ट किया कि 2026 में होने वाला डिलिमिटेशन पहले से ही संवैधानिक रूप से तय है।
नारी शक्ति वंदन अधिनियम 2023 को भविष्य की जरूरतों के अनुसार लागू किया जा रहा है। सरकार का तर्क है कि 850 सांसदों के साथ देश का लोकतांत्रिक ढांचा और मजबूत होगा।