पी.पी. चौधरी का चुनाव सुधार पर संबोधन: राहुल गांधी पर निशाना, EVM और SIR के मुद्दों पर विपक्ष को घेरा

पूर्व विधि मंत्री पी.पी. चौधरी (P.P. Chaudhary) ने लोकसभा में चुनाव सुधारों पर बोलते हुए राहुल गांधी (Rahul Gandhi) पर निशाना साधा। उन्होंने चुनाव आयोग (Election Commission) की शक्तियों और आर्टिकल 324 पर जोर दिया, साथ ही EVM और SIR के मुद्दों पर विपक्ष को घेरा।

नई दिल्ली: पूर्व विधि मंत्री पी.पी. चौधरी (P.P. Chaudhary) ने लोकसभा में चुनाव सुधारों पर बोलते हुए राहुल गांधी (Rahul Gandhi) पर निशाना साधा। उन्होंने चुनाव आयोग (Election Commission) की शक्तियों और आर्टिकल 324 पर जोर दिया, साथ ही EVM और SIR के मुद्दों पर विपक्ष को घेरा।

पाली के सांसद और देश के पूर्व विधि मंत्री पी.पी. चौधरी ने लोकसभा में चुनाव सुधारों पर एक महत्वपूर्ण संबोधन दिया। उन्होंने अपने संबोधन में कांग्रेस नेता राहुल गांधी पर तीखा हमला बोला और उन्हें भारतीय संविधान तथा चुनाव आयोग के अधिकारों की जानकारी न होने का आरोप लगाया।

चौधरी ने कहा कि राहुल गांधी ने बिहार चुनाव से पहले एसआईआर (Special Intensive Revision) पर जो बातें कहीं, उन्हें बिहार की जनता ने सिरे से खारिज कर दिया। उन्होंने जोर देकर कहा कि मतदाता अब बहुत समझदार हो चुका है और झूठे बयानों को स्वीकार नहीं करता।

चुनाव आयोग की असीमित शक्तियां और संवैधानिक प्रावधान

पी.पी. चौधरी ने भारतीय संविधान के आर्टिकल 324 के तहत चुनाव आयोग को प्राप्त असीमित शक्तियों पर विस्तार से प्रकाश डाला। उन्होंने कहा कि यह आर्टिकल चुनाव आयोग को स्वतंत्र और निष्पक्ष चुनाव कराने के लिए व्यापक कार्यकारी शक्तियां प्रदान करता है।

उन्होंने स्पष्ट किया कि पार्लियामेंट अपने किसी भी एक्ट या कानून के द्वारा आर्टिकल 324 को कमजोर या संशोधित नहीं कर सकता। इसे केवल आर्टिकल 368 के तहत भारत का संविधान जब अमेंड होता है, तभी संशोधित किया जा सकता है, और वह भी सुप्रीम कोर्ट के निर्णयों के अधीन है।

चौधरी ने इस बात पर जोर दिया कि चुनाव आयोग को प्राप्त ये शक्तियां हमारे लोकतंत्र के 'बेसिक स्ट्रक्चर' का हिस्सा हैं। इन्हें संशोधित नहीं किया जा सकता, क्योंकि ये स्वतंत्र और निष्पक्ष चुनावों के लिए अनिवार्य हैं।

उन्होंने कहा कि राहुल गांधी को शायद इस बात की जानकारी नहीं है कि भारत के संविधान में चुनाव आयोग को किस आर्टिकल के तहत अधिकार दिए गए हैं। आर्टिकल 324 के तहत, चुनाव आयोग के पास केंद्रीय सरकार की कार्यकारी शक्तियों के समानांतर स्वतंत्र कार्यकारी शक्तियां हैं।

आर्टिकल 324 में साफ लिखा है कि 'सुपरिटेंडेंस, डायरेक्शन एंड कंट्रोल ऑफ इलेक्शन' चुनाव आयोग में निहित है। इसमें 'प्रिपरेशन ऑफ द इलेक्ट्रल रोल्स' और 'स्पेशल इंटेंसिव रोल' भी शामिल है, जो इतना व्यापक है कि किसी अन्य प्रावधान की आवश्यकता नहीं है।

चौधरी ने दोहराया कि आर्टिकल 324 के तहत चुनाव आयोग की इन शक्तियों को आर्टिकल 327 के तहत भी कम नहीं किया जा सकता। आर्टिकल 327 स्पष्ट रूप से कहता है कि पार्लियामेंट भारत के संविधान के अनुसार कानून बना सकता है, लेकिन आर्टिकल 324 में निहित शक्तियों को पूर्वाग्रहित किए बिना।

सर्वोच्च न्यायालय के निर्णय और चुनाव आयोग की शक्ति

पी.पी. चौधरी ने सुप्रीम कोर्ट के कई महत्वपूर्ण निर्णयों का हवाला दिया, जो चुनाव आयोग की शक्तियों की पुष्टि करते हैं। उन्होंने 'अनूप बारावाल' मामले के पैरा 206 का उल्लेख किया।

इस पैरा में सुप्रीम कोर्ट ने कहा है कि 'आर्टिकल 324 स्वतंत्र और निष्पक्ष चुनाव कराने के लिए शक्तियों का एक भंडार है। संविधान का एक अंग होने के नाते आयोग इसे विभिन्न प्रकार की स्थितियों में प्रयोग कर सकता है। लोकतंत्र में चुनावी प्रक्रिया एक रणनीतिक भूमिका निभाती है।'

यह निर्णय स्पष्ट करता है कि चुनाव आयोग के पास असीमित परिस्थितियों में अपनी शक्तियों का प्रयोग करने का अधिकार है, जिसमें एसआईआर (Special Intensive Revision) भी शामिल है। इसकी शक्तियों को संविधान संशोधन के बिना कम नहीं किया जा सकता, और यह भी बेसिक स्ट्रक्चर का हिस्सा होने के कारण संभव नहीं है।

चौधरी ने 'मोहिंदर सिंह गिल' मामले के पैरा 113 को उद्धृत किया, जिसमें कहा गया है कि 'आर्टिकल 324 (1) व्यापक शब्दों में लिखा गया है। फिर भी, आर्टिकल 327 और 328 दोनों संविधान के प्रावधानों के अधीन हैं, जिसमें आर्टिकल 324 भी शामिल है।'

उन्होंने आगे कहा कि 'संविधान निर्माताओं ने आयोग द्वारा अवशिष्ट शक्तियों के प्रयोग के लिए गुंजाइश छोड़ी थी। यह अवशिष्ट शक्ति एसआईआर है। हर आकस्मिकता का अनुमान नहीं लगाया जा सकता था, इसीलिए आर्टिकल 324 में कोई बाधा नहीं है।'

चौधरी ने 'अमीन अहमद' मामले के पैरा 7 का भी जिक्र किया। इसमें कहा गया है कि 'पार्लियामेंट ने संविधान के आर्टिकल 327 द्वारा प्रदत्त विधायी अधिकार के आधार पर 'जनप्रतिनिधित्व अधिनियम' (Representation of the People Act) अधिनियमित किया।'

हालांकि, 'आर्टिकल 327 को संविधान के अन्य प्रावधानों, यानी आर्टिकल 324 के स्पष्ट रूप से अधीन किया गया है।' यह दर्शाता है कि चुनाव आयोग की शक्तियां सर्वोच्च हैं और न्यायिक हस्तक्षेप भी ऐसे मामलों में नहीं होता।

चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति प्रक्रिया: विपक्ष का दोहरा रवैया

पूर्व विधि मंत्री ने चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति प्रक्रिया पर विपक्ष द्वारा उठाए गए सवालों को 'जनता को गलत संदेश देने' का प्रयास बताया। उन्होंने कहा कि 2023 में सुप्रीम कोर्ट के फैसले से पहले, नियुक्तियां राष्ट्रपति द्वारा मंत्रिपरिषद की सलाह पर होती थीं, जैसा कि आर्टिकल 324(2) में वर्णित है।

संविधान में साफ लिखा है कि यह व्यवस्था तब तक रहेगी जब तक पार्लियामेंट कोई कानून नहीं बना लेता। चूंकि पार्लियामेंट ने उस समय कोई कानून नहीं बनाया था, सुप्रीम कोर्ट ने अपने फैसले में एक अंतरिम व्यवस्था दी।

सुप्रीम कोर्ट ने कहा था कि जब तक पार्लियामेंट कानून नहीं बनाता, तब तक प्रधानमंत्री, भारत के मुख्य न्यायाधीश और विपक्ष के नेता की एक समिति चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति करेगी। यह व्यवस्था केवल 'अनऑक्यूपाइड फील्ड' (unoccupied field) के लिए थी।

चौधरी ने बताया कि 2023 में ही पार्लियामेंट ने एक नया कानून बना लिया है। इस कानून के तहत अब नियुक्ति समिति में प्रधानमंत्री, लोकसभा में विपक्ष के नेता और एक कैबिनेट मंत्री शामिल होते हैं।

उन्होंने विपक्ष पर आरोप लगाया कि जिन लोगों ने पार्लियामेंट में बैठकर यह कानून बनाया, वही लोग अब इस पर सवाल उठा रहे हैं। उन्होंने कहा कि यह पार्लियामेंट का कानून है और इसके तहत ही समिति का गठन हुआ है।

चौधरी ने कहा कि 1947 से 2023 तक चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति राष्ट्रपति द्वारा होती थी। अब उन्हें मार्गदर्शन देने के लिए प्रधानमंत्री और विपक्ष के नेता के साथ एक कैबिनेट मंत्री की समिति है।

उन्होंने कहा कि यदि विपक्ष को इस कानून से तकलीफ है, तो उन्होंने सुप्रीम कोर्ट में इसे चुनौती दे रखी है, लेकिन सुप्रीम कोर्ट ने उस पर कोई रोक नहीं लगाई है। यह दर्शाता है कि उनके आरोपों में कोई दम नहीं है।

ईवीएम और बैलेट पेपर पर विपक्ष के निराधार आरोप

पी.पी. चौधरी ने ईवीएम (Electronic Voting Machine) और बैलेट पेपर पर विपक्ष द्वारा लगातार उठाए जा रहे सवालों को 'फालतू' करार दिया। उन्होंने कहा कि जब तक कांग्रेस 2014 से पहले चुनाव जीतती रही, तब तक उन्हें ईवीएम में कोई गड़बड़ नजर नहीं आई।

उन्होंने कहा कि यह एक अजीबोगरीब रुख है कि जब वे चुनाव हारते हैं, तो ईवीएम पर सवाल उठाते हैं और अपनी हार के लिए ईवीएम को दोषी ठहराते हैं। चौधरी ने याद दिलाया कि ईवीएम का मामला सुप्रीम कोर्ट तक गया है, जहां इसकी विश्वसनीयता पर कोई संदेह नहीं पाया गया।

उन्होंने कहा कि आज की तकनीक इतनी उन्नत है कि ईवीएम में किसी तरह की कोई कमी नहीं हो सकती। सुप्रीम कोर्ट में भी इस मामले की सुनवाई हुई, शिकायतें की गईं और केस लड़ा गया, लेकिन विपक्ष को कुछ भी हासिल नहीं हुआ।

चौधरी ने सुप्रिया सुले का धन्यवाद किया, जिन्होंने कहा कि वह ईवीएम और एसआईआर जैसे मुद्दों को नहीं उठाना चाहतीं। उन्होंने कहा कि मतदाता अब बहुत समझदार हो चुका है और इन 'फालतू' मुद्दों से गुमराह नहीं होगा।

उन्होंने राहुल गांधी के 'वोट चोरी, वोट चोरी' के बयान पर भी निशाना साधा। चौधरी ने कहा कि राहुल गांधी को यह भी पता नहीं है कि पब्लिक सर्वेंट को मिलने वाली इम्यूनिटी क्या होती है, जिस पर वे सवाल उठा रहे थे।

मतदाता सूची में सुधार: एसआईआर की अनिवार्यता

पी.पी. चौधरी ने मतदाता सूचियों के विशेष गहन पुनरीक्षण (SIR) की आवश्यकता पर विस्तार से प्रकाश डाला। उन्होंने कहा कि 2002 के बाद हुए शहरीकरण और वैश्वीकरण के कारण कई लोग अपने मूल निवास स्थान से शहरों में या अन्य स्थानों पर चले गए हैं।

इससे मतदाता सूचियों में डुप्लीकेट नाम और उन लोगों के नाम शामिल हो गए हैं, जो अब वहां के 'ऑर्डिनरी रेजिडेंट' नहीं हैं। उन्होंने स्पष्ट किया कि मतदाता होने के लिए 'सिटीजन' (नागरिक) और 'ऑर्डिनरी रेजिडेंट' (सामान्य निवासी) दोनों होना आवश्यक है।

चौधरी ने कांग्रेस पर आरोप लगाया कि उन्होंने 2014 से पहले मतदाता सूचियों को बिगाड़ रखा था। उन्होंने बिहार में 22 लाख मृत मतदाताओं का उदाहरण दिया, जिनके नाम सूची में थे, और विपक्ष ऐसे नामों को सूची में बनाए रखना चाहता है ताकि फर्जी मतदान किया जा सके।

उन्होंने कहा कि लगभग 65 लाख ऐसे मतदाता थे जिनके नाम फर्जी जुड़े हुए थे। जब सक्षम अधिकारियों ने उन्हें अपनी परिवेदना देने को कहा, तो केवल 70 हजार लोगों ने ही नाम जुड़वाने के लिए आवेदन किया।

इससे स्पष्ट होता है कि बाकी 64 लाख लोगों को इससे कोई लेना-देना नहीं था, जिससे फर्जी नामों की पुष्टि होती है। चौधरी ने कहा कि मतदाता सूची को ठीक करना देशहित में और सार्वजनिक हित में अत्यंत आवश्यक है।

उन्होंने पश्चिम बंगाल में बांग्लादेशी घुसपैठियों का मुद्दा भी उठाया, जहां लाखों की संख्या में ऐसे लोग मतदाता सूची में शामिल हो सकते हैं। उन्होंने कहा कि यह काम कांग्रेस को बहुत पहले कर लेना चाहिए था, लेकिन अब मोदी सरकार इसे कर रही है।

बूथ लेवल अधिकारी (बीएलओ) और उनकी भूमिका

पी.पी. चौधरी ने बूथ लेवल अधिकारी (बीएलओ) की भूमिका पर भी बात की। उन्होंने कहा कि बीएलओ संबंधित पार्टी का होता है और उसकी उस गांव और बूथ में जिम्मेदारी होती है।

बीएलओ का काम यह देखना है कि कौन से नाम सही जुड़े हैं, कौन से गलत जुड़े हैं, और किन नामों को हटवाना है या जुड़वाना है। उन्होंने कहा कि विपक्ष के कार्यकर्ता भी इस प्रक्रिया में शामिल होते हैं।

चौधरी ने कहा कि विपक्ष को सिर्फ अपनी हार नहीं पच रही है, इसीलिए वे लगातार एसआईआर जैसे मुद्दों पर झूठ बोल रहे हैं। उन्होंने बिहार चुनाव का उदाहरण दिया, जहां राहुल गांधी के एसआईआर पर दिए गए बयान के बाद जनता ने उन्हें खारिज कर दिया।

कांग्रेस का चुनावी इतिहास: धांधली और सत्ता का दुरुपयोग

पी.पी. चौधरी ने कांग्रेस पर बूथ कैप्चरिंग और चुनावी धांधली का लंबा इतिहास होने का आरोप लगाया। उन्होंने कहा कि यह परंपरा नेहरू जी के समय से चली आ रही है और कांग्रेस के डीएनए में है।

उन्होंने 1957 में पहली बार बूथ कैप्चर का मामला होने का जिक्र किया। इसके बाद 1987 में जम्मू-कश्मीर में 13 निर्वाचित सदस्यों को धमकी देकर और धांधली करके चुनाव पर कब्जा करने का उदाहरण दिया।

चौधरी ने कांग्रेस द्वारा आर्टिकल 356 का दुरुपयोग कर 100 से अधिक बार चुनी हुई राज्य सरकारों को भंग करने और राष्ट्रपति शासन लागू करने की भी आलोचना की। उन्होंने कहा कि जो लोग आज चुनाव आयोग की स्वतंत्रता पर सवाल उठा रहे हैं, उन्होंने स्वयं कभी ऐसी कमेटियां या एक्ट नहीं बनाए।

राज नारायण बनाम इंदिरा गांधी: लोकतंत्र पर खतरा

चौधरी ने 'राज नारायण बनाम इंदिरा गांधी' मामले का उल्लेख किया, जो भारतीय लोकतंत्र के इतिहास में एक काला अध्याय है। उन्होंने बताया कि इलाहाबाद हाईकोर्ट ने इंदिरा गांधी के चुनाव को 'भ्रष्ट आचरण' के कारण रद्द कर दिया था।

सुप्रीम कोर्ट ने 'निष्पक्ष और स्वतंत्र चुनाव' को संविधान का 'बेसिक स्ट्रक्चर' माना था। इस फैसले के बाद पूरे देश में 'सिंहासन खाली करो' की आवाज उठी।

इसके जवाब में इंदिरा गांधी ने पूरे देश में आपातकाल थोप दिया। उन्होंने अपने चुनाव को वैध बनाने के लिए भारत के संविधान में संशोधन किया, जिसमें यह लिखा गया कि प्रधानमंत्री और स्पीकर के चुनाव को चुनौती नहीं दी जा सकती।

चौधरी ने कहा कि यह इतिहास में किसी भी देश में कभी नहीं हुआ कि किसी प्रधानमंत्री ने अपने चुनाव को बचाने के लिए संविधान में संशोधन कर दिया हो। उन्होंने कहा कि जनता की अदालत ने 1977 में कांग्रेस को बुरी तरह से हराया, जिससे साबित होता है कि मतदाता बहुत जागरूक और समझदार है।

मोदी सरकार के नेतृत्व में ऐतिहासिक चुनाव सुधार

पी.पी. चौधरी ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में हुए महत्वपूर्ण चुनाव सुधारों की सराहना की। उन्होंने कहा कि मोदी सरकार ने देश के हित में कई ऐसे काम किए हैं, जिन्हें कांग्रेस ने कभी नहीं किया और हमेशा विरोध किया।

वाजपेयी सरकार के योगदान

चौधरी ने स्वर्गीय पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी के नेतृत्व वाली एनडीए सरकार के योगदान को भी याद किया। उन्होंने बताया कि वाजपेयी सरकार ने 'जनप्रतिनिधित्व अधिनियम' (Representation of the People Act) में धारा 33ए को जोड़ा।

इस संशोधन के तहत आपराधिक प्रवृत्ति के लोगों को चुनाव लड़ने से पहले अपना विवरण देना अनिवार्य किया गया। इससे पहले, सांसदों को अपने आपराधिक रिकॉर्ड का खुलासा करने की आवश्यकता नहीं थी।

इसके अलावा, राज्यसभा में 'ओपन बैलेट' की व्यवस्था करके वोट बिकने की परंपरा को खत्म किया गया। यह अपने आप में एक बहुत बड़ा चुनाव सुधार था।

मोदी सरकार के अभिनव सुधार

चौधरी ने मोदी सरकार द्वारा किए गए कई अभिनव चुनाव सुधारों पर प्रकाश डाला। उन्होंने 'नारी शक्ति वंदन अधिनियम' का जिक्र किया, जिसके तहत महिलाओं को पार्लियामेंट और विधानसभाओं में 33% आरक्षण देने का प्रावधान किया गया है। यह एक ऐतिहासिक कदम है जो महिला सशक्तिकरण को बढ़ावा देगा।

युवाओं के लिए, मोदी सरकार ने 18 साल की उम्र पूरी करने वाले मतदाताओं के लिए पंजीकरण की प्रक्रिया को अधिक सुलभ बनाया है। अब 1 जनवरी, 1 अप्रैल, 1 जुलाई और 1 अक्टूबर - इन चार चरणों में पात्रता निर्धारित की जाती है।

इससे युवाओं को वोट डालने के लिए लंबे समय तक इंतजार नहीं करना पड़ता। पहले, यदि कोई व्यक्ति 1 जनवरी के बाद 18 साल का होता था, तो उसे अगले 5 साल तक इंतजार करना पड़ सकता था।

चौधरी ने बताया कि 2024 के लोकसभा चुनाव में 40% दिव्यांगता वाले 90 लाख दिव्यांगों और 85 वर्ष से अधिक उम्र के 81 लाख बुजुर्गों को घर से मतदान करने का अधिकार दिया गया है। यह समावेशी लोकतंत्र की दिशा में एक बड़ा कदम है और मतदाताओं की भागीदारी बढ़ाता है।

गृह मंत्री अमित शाह के नेतृत्व में नक्सल गतिविधियों में उल्लेखनीय कमी आई है। 2009 में लोकसभा चुनाव के दौरान 18 लोग मारे गए थे और 2010 में 76 सीआरपीएफ के जवान नक्सलवादियों द्वारा मारे गए थे।

अमित शाह के कड़े रुख के कारण 2025 में 210 माओवादियों ने और 1225 नक्सलियों ने आत्मसमर्पण किया। इन लोगों द्वारा पहले चुनाव में गड़बड़ी और बूथ कैप्चरिंग की जाती थी।

इसके परिणामस्वरूप, 2023 में 40 ऐसे गांव थे जहां 40 साल के बाद मतदान हुआ। कुछ गांव ऐसे भी थे जहां 1947 के बाद पहली बार मतदान हुआ, जो लोकतंत्र की जड़ों को मजबूत कर रहा है।

चौधरी ने 'वन नेशन, वन इलेक्शन' की बात को भी एक बहुत बड़ा चुनाव सुधार बताया। उन्होंने कहा कि इससे शासन में सुधार होगा और देश को आर्थिक रूप से 5 साल में 5 से 7 लाख करोड़ रुपये का फायदा होगा।

हालांकि, कांग्रेस और इंडिया गठबंधन के लोग हमेशा अच्छे चुनाव सुधारों का विरोध करते हैं। वे देश के हित में नहीं, बल्कि अपने और अपनी पार्टी के हित में बात करते हैं।

उन्होंने चुनाव आयोग को भी धन्यवाद दिया, जिसने 2025 में 28 सुधार किए हैं और सभी राजनीतिक दलों से मिलकर उनकी बात सुनी है। उन्होंने एक बूथ पर एक वोटर के अधिकार को भी सुनिश्चित करने की बात कही।

झूठ बोलने पर सख्त सजा का आह्वान

पी.पी. चौधरी ने अपने संबोधन के अंत में एक महत्वपूर्ण चुनाव सुधार का आह्वान किया। उन्होंने कहा कि 'जनप्रतिनिधित्व अधिनियम' (Representation of the People Act) में ऐसा प्रावधान होना चाहिए कि चुनाव में झूठ बोलने वाले व्यक्ति की सदस्यता रद्द कर दी जाए।

उन्होंने कहा कि यह एक ऐसा सुधार है जिसकी देश में सख्त जरूरत है। यदि ऐसा कानून बन जाता है, तो कोई भी व्यक्ति जनता को गुमराह करने के लिए झूठ नहीं बोलेगा।

चौधरी ने विपक्ष को सलाह दी कि वे अपने चेहरे पर लगी धूल को साफ करें, बजाय इसके कि आईने को साफ करने की कोशिश करें। उन्होंने कहा कि जब तक वे यह नहीं समझेंगे कि धूल चेहरे पर है, तब तक वे भाजपा को हिला नहीं सकते।

उन्होंने कहा कि मतदाता बहुत जागरूक और समझदार है। कांग्रेस और इंडिया गठबंधन के लोग मतदाता को समझने में भूल कर रहे हैं, और उन्हें यह समझना चाहिए कि जनता अब झूठ और गुमराह करने वाली बातों में नहीं आएगी।