जालोर स्मार्टफोन बैन पर नोटिस: जालोर में महिलाओं के स्मार्टफोन पर बैन का मामला: मानवाधिकार आयोग ने कलेक्टर को भेजा नोटिस, 14 दिन में मांगी रिपोर्ट
जालोर में पंचों ने महिलाओं के स्मार्टफोन यूज पर बैन लगाया था, जिस पर अब राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग ने संज्ञान लेते हुए कलेक्टर से जवाब मांगा है।
जालोर | राजस्थान के जालोर जिले में पंचों द्वारा महिलाओं के स्मार्टफोन उपयोग पर लगाए गए प्रतिबंध के मामले में राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग ने कड़ा रुख अपनाया है। आयोग ने इस मामले को गंभीरता से लेते हुए जालोर के जिला कलेक्टर प्रदीप गावंडे को नोटिस जारी किया है। इस नोटिस में आयोग ने स्पष्ट किया है कि महिलाओं पर इस तरह का प्रतिबंध लगाना सीधे तौर पर लैंगिक भेदभाव को दर्शाता है। कलेक्टर को निर्देश दिए गए हैं कि वे इस पूरे मामले की जांच करें और 14 दिनों के भीतर विस्तृत रिपोर्ट सौंपें। राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग ने अपने नोटिस में कहा है कि किसी भी पंचायत या सामाजिक समूह को महिलाओं के संचार के साधनों या तकनीक के उपयोग को नियंत्रित करने का कोई कानूनी अधिकार नहीं है। यह कदम न केवल महिलाओं की स्वतंत्रता का हनन है बल्कि भविष्य में उनकी शिक्षा और आवाजाही की आजादी को भी प्रभावित कर सकता है। आयोग ने इसे प्रथम दृष्टया मानवाधिकारों का उल्लंघन माना है और प्रशासन को इस पर सख्त कार्रवाई करने को कहा है।
विवाद की शुरुआत और पंचों का फरमान
यह पूरा विवाद 21 दिसंबर को शुरू हुआ था जब जालोर जिले के चौधरी समाज की एक बड़ी बैठक आयोजित की गई थी। सुंधामाता पट्टी के गाजीपुर गांव में हुई इस बैठक की अध्यक्षता सुजनाराम चौधरी ने की थी। इस बैठक में चौधरी समाज के 14 पट्टियों के प्रतिनिधियों ने हिस्सा लिया था और सर्वसम्मति से यह निर्णय लिया गया था कि 15 गांवों की बहू-बेटियां अब स्मार्टफोन का उपयोग नहीं करेंगी। पंचों के इस फरमान में कहा गया था कि महिलाएं केवल साधारण कीपैड वाले फोन का ही इस्तेमाल कर सकेंगी। इतना ही नहीं सार्वजनिक कार्यक्रमों या पड़ोसियों के घर जाने पर भी स्मार्टफोन ले जाने पर पूरी तरह पाबंदी लगा दी गई थी। इस फैसले के पीछे तर्क दिया गया था कि स्मार्टफोन के उपयोग से बच्चों की आंखों पर बुरा असर पड़ता है और सामाजिक व्यवस्था बिगड़ती है। हालांकि यह नियम केवल महिलाओं के लिए बनाया गया था जिसने बड़े विवाद को जन्म दिया और इसे भेदभावपूर्ण माना गया।
विरोध के बाद फैसले की वापसी
जैसे ही यह खबर सार्वजनिक हुई समाज के भीतर और बाहर इसका कड़ा विरोध शुरू हो गया। मानवाधिकार कार्यकर्ताओं और विभिन्न संगठनों ने इसे दकियानूसी सोच करार दिया। बढ़ते दबाव को देखते हुए समाज के अध्यक्ष सुजनाराम चौधरी ने बाद में सफाई पेश की। उन्होंने कहा कि यह फैसला केवल बच्चों की भलाई के लिए था लेकिन विरोध को देखते हुए इसे वापस ले लिया गया है। समाज का कहना है कि वे किसी की स्वतंत्रता का हनन नहीं करना चाहते थे।
एनजीओ की शिकायत और आयोग का संज्ञान
इस मामले में पश्चिम बंगाल के नेशनल क्राइम इन्वेस्टिगेशन ब्यूरो के मनीष जैन ने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। उन्होंने 2 जनवरी को राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग को पत्र लिखकर इस कुप्रथा की शिकायत की थी। उन्होंने अपनी शिकायत में बताया था कि किस तरह ग्रामीण क्षेत्रों में महिलाओं की स्वतंत्रता को कुचला जा रहा है और तकनीक से उन्हें दूर रखा जा रहा है। इसी पत्र के आधार पर आयोग के सदस्य प्रियंक कानूनगो ने मामले का संज्ञान लिया और जिला मजिस्ट्रेट को नोटिस जारी कर जवाब तलब किया।
प्रशासनिक कार्रवाई और भविष्य के कदम
जिला कलेक्टर प्रदीप गावंडे ने पुष्टि की है कि उन्हें मानवाधिकार आयोग का नोटिस प्राप्त हुआ है। उन्होंने बताया कि हालांकि स्थानीय स्तर पर पंचों ने अपना फैसला वापस लेने की बात कही है लेकिन आयोग के निर्देशों का पालन करते हुए इस मामले की पूरी जांच की जाएगी। प्रशासन यह सुनिश्चित करेगा कि भविष्य में इस तरह के भेदभावपूर्ण फैसले न लिए जाएं। आयोग ने स्पष्ट किया है कि तकनीक तक पहुंच आज के समय में एक बुनियादी जरूरत है और इसे लिंग के आधार पर सीमित नहीं किया जा सकता।
डिजिटल सशक्तिकरण और संवैधानिक अधिकार
मानवाधिकार विशेषज्ञों का मानना है कि इस तरह के प्रतिबंध न केवल संवैधानिक अधिकारों का उल्लंघन हैं बल्कि यह समाज में महिलाओं की स्थिति को और पीछे धकेलने का प्रयास है। डिजिटल इंडिया के दौर में जहां तकनीक सशक्तिकरण और शिक्षा का मुख्य माध्यम है वहां इस तरह की पाबंदियां अनुचित और अवैध हैं। यह मामला देशभर में चर्चा का विषय बना हुआ है क्योंकि यह ग्रामीण भारत में आज भी मौजूद सामाजिक बेड़ियों को उजागर करता है। अब सबकी नजरें प्रशासन की उस रिपोर्ट पर टिकी हैं जो 14 दिनों के भीतर आयोग को भेजी जानी है।