सिरोही: आमथला वन भूमि घोटाले में लोकायुक्त सख्त: सिरोही में वन भूमि घोटाला: लोकायुक्त ने कलेक्टर से मांगी रिपोर्ट, भू-माफियाओं में हड़कंप
सिरोही के आमथला में बेशकीमती वन भूमि को खुर्द-बुर्द करने के मामले में लोकायुक्त ने कलेक्टर से जांच रिपोर्ट तलब की है।
सिरोही | राजस्थान के सिरोही जिले में आबूरोड स्थित आमथला की बेशकीमती वन भूमि को खुर्द-बुर्द करने का मामला अब गरमाता जा रहा है। भू-माफियाओं के चंगुल में फंसी इस जमीन को लेकर लोकायुक्त ने कड़ा रुख अपनाया है और जिला कलेक्टर से विस्तृत तथ्यात्मक जांच रिपोर्ट तलब की है। लोकायुक्त सचिवालय द्वारा भेजे गए पत्र के बाद प्रशासनिक गलियारों में खलबली मच गई है।
क्या है पूरा मामला?
आमथला क्षेत्र में वन विभाग की करोड़ों की भूमि पर भू-माफियाओं की नजर काफी समय से थी। लोकायुक्त को भेजी गई शिकायत के अनुसार, पटवार हल्का आमथला के खसरा संख्या-111 और अन्य खसरों में वन भूमि पर अतिक्रमण किया गया है। लोकायुक्त ने कलेक्टर को भेजे पत्र में स्पष्ट रूप से कृषि भूमि का सीमाज्ञान करवाने और अतिक्रमण की रिपोर्ट मांगी है। साथ ही, यह भी पूछा गया है कि अगर वन भूमि पर अतिक्रमण हुआ है, तो इसके लिए जिम्मेदार लोकसेवकों पर अब तक क्या कार्रवाई की गई है।
1966 से शुरू हुआ विवादों का सिलसिला
इस पूरे घोटाले की जड़ें दशकों पुरानी हैं। बताया जा रहा है कि वर्ष 1966 में सोमाराम नामक व्यक्ति को खसरा संख्या-111 में 22 बीघा भूमि आवंटित की गई थी। हालांकि, वर्ष 1972-73 के सेटलमेंट अभियान के दौरान यह भूमि वन विभाग के नाम दर्ज हो गई। लंबे समय बाद, वर्ष 2013 में आवंटी के परिवार ने माउंट आबू एसडीएम कोर्ट में अपने हक के लिए दावा पेश किया और फैसला उनके पक्ष में आया।
22 बीघा बनाम 13.15 बीघा का खेल
असली खेल एसडीएम कोर्ट के आदेश के बाद शुरू हुआ। आबूरोड तहसीलदार ने उस समय एक महत्वपूर्ण आवेदन दिया था, जिसमें कहा गया था कि 1966 में आवंटित 22 बीघा भूमि का माप नई जरीब के अनुसार केवल 13.15 बीघा ही बनता है। यानी आवंटी को केवल 13.15 बीघा जमीन ही मिलनी चाहिए थी। लेकिन इस तकनीकी तथ्य को नजरअंदाज कर दिया गया और पूरे 22 बीघा का नामांतरण खोल दिया गया।
भू-माफियाओं का जाल और कब्जा
आरोप है कि भू-माफिया ने आवंटी से जमीन खरीद ली और मौके पर जमीन कम होने के कारण आसपास की 9 बीघा वन भूमि पर भी कब्जा जमा लिया। इस तरह कागजों में 22 बीघा दिखाकर वास्तव में वन विभाग की जमीन को भी निजी संपत्ति में मिला लिया गया। अब लोकायुक्त की जांच में यह साफ होगा कि इस खेल में कौन-कौन से अधिकारी शामिल थे।
प्रशासनिक कार्रवाई का इंतजार
लोकायुक्त के हस्तक्षेप के बाद अब जिला प्रशासन को इस पूरे मामले की परतें खोलनी होंगी। सीमाज्ञान की रिपोर्ट आने के बाद यह स्पष्ट हो जाएगा कि वन विभाग की कितनी जमीन को खुर्द-बुर्द किया गया है। स्थानीय निवासियों का कहना है कि अगर निष्पक्ष जांच हुई, तो कई बड़े नाम इस घोटाले में बेनकाब हो सकते हैं।