सुहास सुब्रमण्यम का ट्रंप पर हमला: अमेरिकी टैरिफ पर सुहास सुब्रमण्यम ने राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप को घेरा, कहा भारत के साथ रिश्ते खराब किए
भारतीय-अमेरिकी सांसद सुहास सुब्रमण्यम ने भारत पर लगाए गए 50 प्रतिशत टैरिफ को लेकर डोनाल्ड ट्रंप की आलोचना की है। उन्होंने कहा कि इससे दोनों देशों के रणनीतिक और आर्थिक हितों को नुकसान हो रहा है।
वाशिंगटन | अमेरिका और भारत के बीच व्यापारिक संबंधों में आई हालिया कड़वाहट ने अंतरराष्ट्रीय स्तर पर नई बहस छेड़ दी है। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप द्वारा भारत से आने वाले सामानों पर 50 प्रतिशत का भारी टैरिफ लगाने के फैसले के बाद रिश्तों में एक बड़ा गतिरोध देखने को मिल रहा है। इस फैसले पर कड़ी प्रतिक्रिया व्यक्त करते हुए भारतीय मूल के अमेरिकी सांसद सुहास सुब्रमण्यम ने ट्रंप प्रशासन की नीतियों को आड़े हाथों लिया है। उन्होंने चेतावनी दी है कि इस तरह के कठोर कदम न केवल व्यापार को प्रभावित करेंगे बल्कि दुनिया के दो सबसे बड़े लोकतंत्रों के बीच दशकों से बने रणनीतिक संबंधों को भी कमजोर करेंगे। सुब्रमण्यम ने इस स्थिति को दोनों देशों के आर्थिक हितों के लिए एक गंभीर खतरे के रूप में पेश किया है।
ट्रंप प्रशासन की नीतियों की तीखी आलोचना
सुहास सुब्रमण्यम ने अपने संबोधन में कहा कि ट्रंप प्रशासन ने अमेरिका और भारत के बीच के उन मजबूत संबंधों को पूरी तरह से पटरी से उतार दिया है जिन्हें बनाने में वर्षों का समय लगा था। उन्होंने इस बात पर जोर दिया कि राष्ट्रपति ट्रंप ने अपने पहले कार्यकाल के दौरान प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के साथ मिलकर एक नई केमिस्ट्री विकसित की थी जिससे दोनों देशों को लाभ हुआ था। लेकिन अब नीतिगत और व्यक्तिगत मतभेदों की वजह से उन उपलब्धियों को मिट्टी में मिलाया जा रहा है। सुब्रमण्यम के अनुसार ट्रंप प्रशासन का यह रवैया समझ से परे है क्योंकि भारत और अमेरिका की साझेदारी वैश्विक स्थिरता के लिए बहुत महत्वपूर्ण है।
रणनीतिक और आर्थिक नुकसान का विश्लेषण
सांसद ने बताया कि भारत पर इस तरह के भारी शुल्क लगाने का कोई ठोस कारण नहीं दिखता है। उन्होंने तर्क दिया कि अगर अमेरिका भारत के साथ अपने आर्थिक संबंधों को नई दिशा देता है तो इससे अमेरिकी अर्थव्यवस्था को भी मजबूती मिलेगी। भारत की विशाल आबादी और बढ़ता बाजार अमेरिकी कंपनियों के लिए एक बड़ा अवसर प्रदान करता है। सुब्रमण्यम ने कहा कि जब हम वैश्विक पटल पर चीन की चुनौतियों को देखते हैं तो भारत एक स्वाभाविक सहयोगी के रूप में उभरता है। भारत और अमेरिका के बीच की यह दूरी केवल चीन जैसे देशों को फायदा पहुंचाएगी जो वैश्विक व्यापार व्यवस्था को अपने पक्ष में मोड़ना चाहते हैं।
रक्षा और तकनीक के क्षेत्र में सहयोग की जरूरत
सुब्रमण्यम ने रक्षा और उच्च तकनीक के क्षेत्रों में आपसी सहयोग बढ़ाने की आवश्यकता पर बल दिया। उन्होंने कहा कि वर्तमान में वैश्विक आपूर्ति श्रृंखला एक बड़े बदलाव के दौर से गुजर रही है। कई बड़ी बहुराष्ट्रीय कंपनियां अब चीन के विकल्प के रूप में भारत की ओर देख रही हैं। भारत में विनिर्माण और औद्योगिक इकाइयों को स्थापित करने की अपार संभावनाएं हैं। यदि अमेरिकी सरकार टैरिफ के जरिए बाधाएं पैदा करती है तो इससे उन कंपनियों का मनोबल गिरेगा जो भारत में निवेश करना चाहती हैं। उन्होंने स्पष्ट किया कि भारत और अमेरिका को मिलकर एक ऐसी व्यवस्था बनानी चाहिए जिससे दोनों देशों के उद्योगों को फलने-फूलने का मौका मिले।
अमेरिकी विदेश नीति और भरोसे का संकट
सांसद ने अमेरिका की वर्तमान विदेश नीति पर भी सवाल उठाए हैं। उनका मानना है कि ट्रंप प्रशासन ने दुनिया भर में युद्धों को समाप्त करने और आर्थिक संबंधों को बेहतर बनाने का जो वादा किया था वह अब खोखला साबित हो रहा है। टैरिफ युद्ध और सहयोगी देशों के साथ लगातार होते विवादों ने अमेरिका की विश्वसनीयता पर सवालिया निशान लगा दिया है। सुब्रमण्यम ने कहा कि अंतरराष्ट्रीय स्तर पर कई देश अब अमेरिका को एक भरोसेमंद साथी के रूप में देखने से कतरा रहे हैं। उन्होंने अमेरिकी कांग्रेस से इस मामले में हस्तक्षेप करने की मांग की है ताकि भारत जैसे महत्वपूर्ण सहयोगी के साथ बिगड़े हुए संबंधों को समय रहते सुधारा जा सके।
भविष्य की चुनौतियां और द्विपक्षीय व्यापार
हालिया नेशनल डिफेंस ऑथराइजेशन एक्ट की रिपोर्टों के अनुसार पिछले कुछ वर्षों में भारत और अमेरिका के बीच व्यापार और रक्षा खरीद में काफी तेजी आई है। हिंद-प्रशांत क्षेत्र में रणनीतिक संतुलन बनाए रखने के लिए भारत की भूमिका अपरिहार्य है। विशेषज्ञों का भी मानना है कि यदि व्यापारिक मोर्चे पर तनाव जारी रहा तो इसका नकारात्मक असर सुरक्षा सहयोग पर भी पड़ सकता है। सुहास सुब्रमण्यम ने कहा कि अब समय आ गया है कि दोनों देश बातचीत की मेज पर आएं और टैरिफ जैसे मुद्दों का समाधान निकालें। उन्होंने यह भी कहा कि भारत के साथ रिश्तों को सुधारना केवल एक राजनीतिक मजबूरी नहीं बल्कि एक आर्थिक अनिवार्यता है।
निष्कर्ष और आगे की राह
सुब्रमण्यम ने अंत में कहा कि दोनों देशों में ऐसे कई प्रभावशाली लोग हैं जो आपसी रिश्तों को मजबूत करना चाहते हैं। लेकिन ट्रंप प्रशासन की वर्तमान कार्यप्रणाली ने इसे बहुत कठिन बना दिया है। उन्होंने उम्मीद जताई कि आने वाले समय में अमेरिकी नेतृत्व अपनी भूल सुधारेगा और भारत के साथ एक न्यायसंगत और पारदर्शी व्यापार नीति अपनाएगा। उन्होंने दोहराया कि भारत और अमेरिका की दोस्ती केवल दो देशों की प्रगति के लिए ही नहीं बल्कि पूरी दुनिया के लोकतांत्रिक भविष्य के लिए आवश्यक है। विनिर्माण और तकनीक के क्षेत्र में साझा प्रयास ही दोनों देशों को भविष्य की चुनौतियों के लिए तैयार कर सकते हैं।