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बगलामुखी माता और मदनासुर की कथा: देवी बगलामुखी क्यों खींचती हैं असुर की जीभ? जानें रहस्य

प्रदीप बीदावत

जानें मां बगलामुखी के प्राकट्य और मदनासुर के वध की पौराणिक कथा।

HIGHLIGHTS

  • मां बगलामुखी का प्राकट्य वैशाख शुक्ल पक्ष की अष्टमी को हुआ था।
  • देवी ने मदनासुर की जीभ खींचकर उसके वाक् सिद्धि के दुरुपयोग को रोका।
  • पीले रंग की प्रधानता के कारण इन्हें पीताम्बरा और हरिद्रा भी कहा जाता है।
  • शत्रु विजय और अदालती मामलों में जीत के लिए इनकी विशेष पूजा होती है।
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उज्जैन | सनातन धर्म में शक्ति की उपासना का विशेष महत्व है, जिसमें दस महाविद्याओं की साधना को अत्यंत प्रभावशाली और रहस्यमयी माना गया है। इन महाविद्याओं में आठवीं शक्ति मां बगलामुखी हैं, जिन्हें शत्रुओं का नाश करने वाली और स्तंभन की देवी के रूप में पूजा जाता है।

बगलामुखी जयंती का पावन पर्व

हिंदू पंचांग के अनुसार, माता बगलामुखी की जयंती वैशाख महीने के शुक्ल पक्ष की अष्टमी तिथि को श्रद्धापूर्वक मनाई जाती है। इस दिन को जयंती कहना तकनीकी रूप से सही नहीं है, क्योंकि यह देवी के प्राकट्य का दिवस है जब वे जगत के कल्याण हेतु प्रकट हुई थीं। आने वाली 24 अप्रैल को देशभर के शक्तिपीठों में मां बगलामुखी का प्राकट्य उत्सव बहुत ही धूमधाम और विधि-विधान के साथ मनाया जाएगा। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, इसी दिन ब्रह्मांड की रक्षा के लिए मां ने अपने भयंकर और सौम्य स्वरूप को एक साथ धारण किया था।

देवी का अद्भुत पीताम्बरी स्वरूप

मां बगलामुखी का स्वरूप अत्यंत दिव्य और कांतिवान है, जिसमें पीले रंग की प्रधानता उन्हें अन्य शक्तियों से विशिष्ट बनाती है। उनका पूरा शरीर सोने की तरह चमकता हुआ सुनहला पीला है और उन्होंने पीले रंग के वस्त्र ही धारण किए हुए हैं। देवी के मस्तक पर एक अर्धचंद्र सुशोभित है, जो उनके शांत और शीतल पक्ष को दर्शाता है, जबकि उनकी आंखें तेज से भरी हैं। शुद्ध हल्दी के समान पीली चमक होने के कारण ही उन्हें 'हरिद्रा' के नाम से भी पुकारा जाता है, जो आरोग्य का प्रतीक है। इन्हीं विशेषताओं के कारण उन्हें 'पीताम्बरा' भी कहा जाता है, जिसका अर्थ है पीले वस्त्रों वाली और पीले आभा वाली देवी। कई चित्रों और मूर्तियों में देवी को बगुले पर सवार या बगुले जैसे मुख के साथ दिखाया जाता है, जो एकाग्रता का प्रतीक है।

असुर मदन की पौराणिक कथा

देवी बगलामुखी की प्रतिमा में सबसे अधिक ध्यान खींचने वाली बात यह है कि वे एक हाथ से असुर की जीभ पकड़े हुए हैं। तंत्रसार और अन्य पौराणिक ग्रंथों में इस असुर का नाम मदन बताया गया है, जिसे मदनासुर के नाम से भी जाना जाता है। मदन वास्तव में कोई जन्मजात असुर नहीं था, बल्कि वह एक अत्यंत विद्वान और कठोर तपस्या करने वाला साधक तांत्रिक था। उसने अपनी तपस्या के बल पर सृष्टिकर्ता ब्रह्माजी को प्रसन्न किया और उनसे एक अत्यंत दुर्लभ और शक्तिशाली वरदान प्राप्त कर लिया।

ब्रह्माजी का वरदान और अहंकार

मदन ने ब्रह्माजी से 'वाक् सिद्धि' का वरदान मांगा था, जिसका अर्थ है कि वह जो कुछ भी बोलेगा, वह तत्काल सत्य हो जाएगा। ब्रह्माजी ने उसकी तपस्या को देखते हुए उसे यह वरदान दे दिया कि उसकी वाणी में अमोघ शक्ति का वास होगा। वरदान पाने के बाद मदन का अहंकार बढ़ गया और उसने भगवान शिव की भी कठोर आराधना करके उन्हें प्रसन्न कर लिया। इन दो महान शक्तियों के आशीर्वाद ने मदन को अजेय बना दिया, लेकिन उसकी बुद्धि में विकार आने लगा और वह निरंकुश हो गया। वह अपनी वाणी की शक्ति का उपयोग जनकल्याण के बजाय अपनी व्यक्तिगत इच्छाओं और स्वार्थों की पूर्ति के लिए करने लगा।

वाक् सिद्धि का भयंकर दुरुपयोग

मदन अब जो चाहता था, वह अपनी जुबान से बोलकर प्राप्त कर लेता था और जो भी उसकी राह में आता, उसे श्राप दे देता था। उसने अपनी शत्रुता निकालने के लिए निर्दोष लोगों और जीव-जंतुओं का भारी नुकसान करना शुरू कर दिया, जिससे सृष्टि का संतुलन बिगड़ गया। उसकी हरकतों से ऋषि-मुनि और देवता सभी त्रस्त हो गए थे, क्योंकि उसकी वाणी के सामने कोई भी टिक नहीं पा रहा था। मदन ने कई सिद्ध साधुओं और तांत्रिकों को बंदी बना लिया और उनके वर्षों की तपस्या का फल जबरन छीनने का प्रयास किया। वह चाहता था कि पूरी दुनिया में केवल उसी का वर्चस्व रहे और हर कोई उसकी वाणी के आदेशों का गुलाम बनकर रहे।

जब सृष्टि में मच गया हाहाकार

मदनासुर के बढ़ते अत्याचारों के कारण तीनों लोकों में हाहाकार मच गया और प्रकृति के नियम टूटने लगे। जब देवताओं ने देखा कि मदन की वाणी से पूरी सृष्टि विनाश की ओर बढ़ रही है, तो वे भगवान शिव की शरण में पहुंचे। शिव ने भैरव रूप धारण किया ताकि वे मदन को दंडित कर सकें, लेकिन ब्रह्माजी के वरदान की मर्यादा आड़े आ रही थी। वरदान के कारण शिव भी सीधे तौर पर मदन का अहित नहीं कर पा रहे थे, क्योंकि उसकी वाणी में ब्रह्मा का सत्य समाहित था। तब भगवान शिव ने उस परम शक्ति की स्तुति की, जो शब्दों से परे है और जो वाणी को नियंत्रित करने की क्षमता रखती है।

देवी बगलामुखी का भयंकर प्राकट्य

शिव की प्रार्थना पर मां भगवती बगलामुखी के रूप में प्रकट हुईं, जिनका तेज करोड़ों सूर्यों के समान प्रज्वलित हो रहा था। उनका स्वरूप जितना सौम्य था, उतना ही भयंकर भी था, जिससे अधर्मियों के मन में भय का संचार होने लगा। जैसे ही देवी मदन की ओर बढ़ीं, मदन ने अपनी वाक् सिद्धि का प्रयोग करके देवी को भी वश में करने का प्रयास किया। उसने अपनी जुबान से ऐसे शब्द निकालने चाहे जो देवी की शक्ति को रोक सकें, लेकिन देवी ने अपना आकार विराट कर लिया। इससे पहले कि मदन कुछ और कह पाता, देवी ने उसके मुंह में हाथ डालकर उसकी जीभ को बाहर की ओर खींच लिया।

असुर की जीभ खींचने का रहस्य

देवी द्वारा असुर मदन की जीभ पकड़ना केवल एक शारीरिक क्रिया नहीं है, बल्कि यह एक गहरा आध्यात्मिक और दार्शनिक संदेश है। यह इस बात का प्रतीक है कि जब वाणी का दुरुपयोग बढ़ जाता है, तो ईश्वरीय शक्ति उसे जड़ या स्तंभित कर देती है। मदन की जीभ खींचकर देवी ने उसकी वाक् शक्ति को वहीं रोक दिया, जिससे वह आगे कोई अनर्थ न कर सके।

"वाणी ही वह अस्त्र है जो निर्माण भी कर सकती है और विनाश भी, इसीलिए इसे नियंत्रित रखना ही सच्ची साधना है।"

यही कारण है कि मां बगलामुखी को स्तंभन की देवी कहा जाता है, जो शत्रुओं की वाणी और बुद्धि को जड़ कर देती हैं।

वाणी पर नियंत्रण का प्रतीक

आज के समय में भी समाज में लोग झूठ, फरेब और षड्यंत्रकारी बातों का बहुत अधिक प्रयोग करते हैं। अदालती मामलों में झूठे गवाह और तर्क गढ़कर न्याय को प्रभावित करने की कोशिश की जाती है, जो मदन की प्रवृत्ति है। माता बगलामुखी इन सभी बुराइयों पर रोक लगाने वाली देवी हैं, जो सत्य की रक्षा के लिए झूठ की जीभ पर लगाम लगाती हैं। उनकी पूजा करने वाले साधक को यह सीख मिलती है कि उसे अपनी वाणी का उपयोग केवल सत्य और धर्म के लिए करना चाहिए। उनकी कृपा से व्यक्ति के भीतर वह शक्ति आती है जिससे वह अपने शत्रुओं के कुचक्रों को उनकी वाणी रोककर विफल कर सकता है।

पीत सरस्वती के रूप में मां बगलामुखी

मां बगलामुखी को 'पीत सरस्वती' के नाम से भी जाना जाता है, क्योंकि वे वाणी की देवी सरस्वती का ही एक विशिष्ट रूप हैं। तंत्र शास्त्र में देवी सरस्वती के तीन प्रमुख रूप बताए गए हैं, जो अलग-अलग उद्देश्यों और शक्तियों के प्रतीक हैं। पहला रूप 'नील सरस्वती' का है, जो महाविद्या तारा के समान मानी जाती हैं और जो अगाध ज्ञान और रहस्यों की देवी हैं। वे विज्ञान, कला और ब्रह्मांड के गूढ़ रहस्यों को समझने की शक्ति प्रदान करती हैं, जो साधक को उच्च चेतना तक ले जाती हैं।

श्वेत सरस्वती और ज्ञान का प्रकाश

दूसरा स्वरूप 'श्वेत सरस्वती' या शारदा देवी का है, जिन्हें हम सामान्यतः हंसवाहिनी के रूप में पूजते हैं। वे शुद्ध बुद्धि, विद्या और संगीत की अधिष्ठात्री हैं, जो मनुष्य के अज्ञान रूपी अंधकार को दूर कर उसे विवेक देती हैं। उनका श्वेत वर्ण सात्विकता और पवित्रता का प्रतीक है, जो विद्यार्थी और बुद्धिजीवियों के लिए अत्यंत वंदनीय है। वे वाणी में मधुरता और विचारों में स्पष्टता प्रदान करती हैं, जिससे समाज में ज्ञान का प्रकाश फैलता है।

पीत सरस्वती: भय और भ्रम का नाश

तीसरा स्वरूप 'पीत सरस्वती' यानी मां बगलामुखी का है, जो भय को दूर करने और भ्रम को मिटाने वाली देवी हैं। वे फरेब और धोखे की शत्रु हैं और उन लोगों की रक्षा करती हैं जो दूसरों के षड्यंत्रों का शिकार हो रहे होते हैं। पीत सरस्वती के रूप में वे साधक की वाणी में वह शक्ति भर देती हैं जिससे वह सत्य को निर्भीकता से कह सके। वे शत्रुओं के द्वारा बोले गए कटु वचनों और झूठे आरोपों के प्रभाव को खत्म कर देती हैं, जिससे साधक सुरक्षित रहता है।

कोर्ट-कचहरी और शत्रुओं पर विजय

यही कारण है कि मां बगलामुखी की पूजा विशेष रूप से कानूनी विवादों और अदालती मुकदमों के निपटारे के लिए की जाती है। जब कोई व्यक्ति किसी झूठे मामले में फंस जाता है, तो वह देवी की शरण लेकर न्याय की गुहार लगाता है। माना जाता है कि उनकी साधना से विपक्षी की बुद्धि भ्रमित हो जाती है और वह सत्य के विरुद्ध बोलने की शक्ति खो देता है। राजनीति और युद्ध के क्षेत्र में भी विजय प्राप्त करने के लिए प्राचीन काल से ही राजा-महाराजा बगलामुखी अनुष्ठान करवाते रहे हैं।

षड्यंत्रों से रक्षा का अचूक मार्ग

आज के प्रतिस्पर्धी युग में हर कदम पर षड्यंत्र और साजिशें रची जाती हैं, जिनसे बचना बहुत कठिन होता है। मां बगलामुखी की भक्ति कवच की तरह काम करती है, जो अदृश्य शत्रुओं और उनकी बुरी नजर से साधक को बचाती है। उनकी साधना से व्यक्ति के आत्मविश्वास में वृद्धि होती है और वह किसी भी विपरीत परिस्थिति का डटकर सामना कर पाता है। वे न केवल बाहरी शत्रुओं को शांत करती हैं, बल्कि हमारे भीतर के काम, क्रोध और लोभ जैसे आंतरिक शत्रुओं को भी जड़ कर देती हैं।

तांत्रिक साधना और सात्विक भक्ति

बगलामुखी माता की पूजा तांत्रिक और सात्विक दोनों विधियों से की जाती है, लेकिन इसमें शुद्धता का बहुत महत्व है। साधना के दौरान पीले वस्त्र पहनना, पीले रंग के आसन का प्रयोग करना और पीले फूलों से पूजा करना अनिवार्य माना गया है। हल्दी की माला से उनके मंत्रों का जाप करना अत्यंत फलदायी होता है, क्योंकि हल्दी देवी को अत्यंत प्रिय है। हालांकि, उनकी उग्र प्रकृति के कारण किसी योग्य गुरु के मार्गदर्शन में ही उनकी विशेष साधना करनी चाहिए।

समाज में झूठ और फरेब पर लगाम

देवी बगलामुखी का संदेश आज के समाज के लिए बहुत ही प्रासंगिक है, जहां वाणी का दुरुपयोग चरम पर है। मदनासुर की जीभ खींचना हमें याद दिलाता है कि असत्य की उम्र बहुत छोटी होती है और अंततः सत्य ही विजयी होता है। जो लोग अपनी बातों से दूसरों का अहित करते हैं, उन्हें देवी के इस स्वरूप से भयभीत होना चाहिए। वहीं, जो लोग सत्य के मार्ग पर हैं, उन्हें मां बगलामुखी अभय प्रदान करती हैं और उनकी रक्षा का दायित्व लेती हैं।

मां बगलामुखी की महिमा का निष्कर्ष

मां बगलामुखी का प्राकट्य उत्सव हमें अपनी वाणी को संयमित करने और सत्य के पक्ष में खड़े होने की प्रेरणा देता है। उनकी पूजा से न केवल शत्रुओं पर विजय मिलती है, बल्कि जीवन में स्थिरता और मानसिक शांति का भी अनुभव होता है। मदनासुर की कथा हमें सिखाती है कि अहंकार और शक्तियों का दुरुपयोग अंततः विनाश का कारण बनता है। इस वैशाख शुक्ल अष्टमी को मां बगलामुखी की आराधना कर हम अपने जीवन के सभी अवरोधों को दूर कर सकते हैं।

*Edit with Google AI Studio

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