thinQ360
thinQ360
🏠 टॉप 🔥 राजनीति 📍 राज्य 📰 लाइफ स्टाइल 🏏 खेल 🎬 मनोरंजन 👤 शख्सियत 💻 तकनीक ✍️ Blog ⭐ सफलता की कहानी 🚨 क्राइम 📰 मनचाही ▶️ YouTube
Blog

जयपुर: गोपीनाथ जी मंदिर का रहस्य: जहां भगवान श्रीकृष्ण की कलाई पर बंधती है धड़कन से चलने वाली घड़ी

बलजीत सिंह शेखावत

जयपुर की पुरानी बस्ती में स्थित गोपीनाथ जी मंदिर अपनी अनूठी परंपराओं और चमत्कारों के लिए प्रसिद्ध है। यहां भगवान के विग्रह की धड़कन से घड़ी चलने की अद्भुत कथा प्रचलित है।

HIGHLIGHTS

  • भगवान श्रीकृष्ण का यह विग्रह उनके प्रपौत्र वज्रनाभ द्वारा निर्मित माना जाता है।
  • मान्यता है कि विग्रह की धड़कन (पल्स) से भगवान की कलाई पर बंधी घड़ी चलती है।
  • गोपीनाथ जी, गोविंद देव जी और मदन मोहन जी के विग्रह एक ही शिला से बने हैं।
  • औरंगजेब के आक्रमण से बचाने के लिए इस प्रतिमा को वृंदावन से जयपुर लाया गया था।
gopinath ji temple jaipur mysterious watch history

जयपुर | राजस्थान की राजधानी जयपुर को छोटी काशी के नाम से भी जाना जाता है, क्योंकि यहाँ पग-पग पर भक्ति और इतिहास के निशान मिलते हैं।

इसी कड़ी में जयपुर की पुरानी बस्ती में स्थित गोपीनाथ जी का मंदिर अपनी अद्वितीय मान्यताओं और चमत्कारों के लिए पूरी दुनिया में प्रसिद्ध है।

यहाँ विराजमान भगवान श्रीकृष्ण का विग्रह न केवल अलौकिक है, बल्कि भक्तों के लिए साक्षात देवत्व का प्रमाण भी माना जाता है।

धड़कन से चलने वाली घड़ी का अद्भुत रहस्य

भगवान गोपीनाथ जी के मंदिर की सबसे अधिक चर्चा उस चमत्कारी घड़ी की वजह से होती है, जो भगवान की कलाई पर सुशोभित रहती है।

लोककथाओं के अनुसार, ब्रिटिश काल के दौरान एक अंग्रेज अधिकारी ने भगवान की जीवंतता को परखने की कोशिश की थी।

उसने एक ऐसी घड़ी मंगवाई जो केवल मनुष्य की नब्ज या धड़कन के संपर्क में आने पर ही चलती थी और इसे विग्रह को पहनाया।

आश्चर्यजनक रूप से, जैसे ही यह घड़ी श्रीकृष्ण की कलाई पर बांधी गई, वह तुरंत चलने लगी, जिसे देख अंग्रेज अधिकारी नतमस्तक हो गया।

आज भी भक्त श्रद्धापूर्वक भगवान को घड़ी अर्पित करते हैं और यह परंपरा सदियों से यहाँ अटूट रूप से चली आ रही है।

एक ही शिला से बने तीन दिव्य विग्रह

मंदिर के महंतों के अनुसार, गोपीनाथ जी की यह प्रतिमा कोई साधारण मूर्ति नहीं है, बल्कि इसका सीधा संबंध द्वापर युग से है।

माना जाता है कि भगवान श्रीकृष्ण के प्रपौत्र वज्रनाभ ने अपनी दादी के कहने पर तीन विशेष विग्रहों का निर्माण करवाया था।

ये तीनों विग्रह—मदन मोहन जी, गोपीनाथ जी और गोविंद देव जी—एक ही विशाल और पवित्र शिला से निर्मित किए गए थे।

मान्यता है कि यह वही शिला थी जिस पर कंस ने देवकी के बालकों का वध किया था, जिसे बाद में शुद्ध कर विग्रह बनाए गए।

इन तीनों विग्रहों में भगवान के अलग-अलग अंगों की छवि दिखाई देती है, जो भक्तों को अपनी ओर आकर्षित करती है।

वृंदावन से जयपुर तक का कठिन सफर

इतिहासकारों के अनुसार, गोपीनाथ जी का यह विग्रह मूल रूप से वृंदावन में स्थापित था और वहाँ वर्षों तक इसकी सेवा-पूजा होती रही।

मुगल शासक औरंगजेब के शासनकाल में जब हिंदू मंदिरों को नष्ट किया जा रहा था, तब पुजारियों ने विग्रह की सुरक्षा का बीड़ा उठाया।

वे प्रतिमा को लेकर वृंदावन से निकले और राधा कुंड, काम्यावन जैसे क्षेत्रों में छिपते हुए अंततः जयपुर की सुरक्षित गोद में पहुंचे।

जयपुर के तत्कालीन शासकों ने इस विग्रह को ससम्मान पुरानी बस्ती में स्थापित करवाया, जहाँ आज यह भव्य मंदिर स्थित है।

नौ झांकियों की दिव्य परंपरा

गोपीनाथ जी मंदिर में भक्ति का माहौल सुबह की मंगला आरती से ही शुरू हो जाता है और देर रात शयन आरती तक बना रहता है।

यहाँ दिन भर में कुल नौ बार झांकियां खोली जाती हैं, जिनमें भगवान के अलग-अलग रूपों का मनमोहक शृंगार किया जाता है।

श्रद्धालु इन झांकियों के दौरान भजन-कीर्तन करते हैं और भगवान के दर्शन कर अपनी मनोकामनाएं पूरी होने की प्रार्थना करते हैं।

यह मंदिर न केवल एक धार्मिक स्थल है, बल्कि यह जयपुर की समृद्ध सांस्कृतिक विरासत और अटूट आस्था का जीवंत प्रतीक भी है।

शेयर करें:

ताज़ा खबरें