thinQ360
🏠 टॉप 🔥 राजनीति 📍 राज्य 📰 लाइफ स्टाइल 🏏 खेल 🎬 मनोरंजन 📰 जालोर 👤 शख्सियत 💻 तकनीक ✍️ Blog ⭐ सफलता की कहानी 🚨 क्राइम 📰 मनचाही ▶️ YouTube
राज्य

400 साल पुरानी पहचान बचाने की मांग: इस्लामपुर का नाम बदलकर ‘श्रीरामपुर’ करने के प्रस्ताव का ग्रामीणों ने किया विरोध

बलजीत सिंह शेखावत
+Follow us
thinQ360 को गूगल पर फेवरेट बनाएँ
villagers opposed the proposal to rename islampur to shrirampur

झुंझुनूं। झुंझुनूं जिले की ग्राम पंचायत इस्लामपुर में गांव का नाम बदलकर ‘श्रीरामपुर’ करने के प्रस्ताव को लेकर विवाद गहरा गया है। ग्रामीणों का कहना है कि यह केवल नाम परिवर्तन का मामला नहीं, बल्कि चार सौ साल पुरानी ऐतिहासिक विरासत, सामाजिक पहचान और सांस्कृतिक इतिहास के अस्तित्व का प्रश्न है। नाम परिवर्तन के विरोध में ग्रामीणों ने 15 जून को गांव से जिला कलेक्ट्रेट तक पैदल मार्च निकालने की घोषणा की है।

करीब 15 हजार की आबादी वाला इस्लामपुर झुंझुनूं जिले का सबसे बड़ा राजस्व गांव माना जाता है। ग्रामीणों के अनुसार गांव की स्थापना 16वीं सदी में हुई थी और तब से यह क्षेत्र सामाजिक सौहार्द, देशभक्ति और सांस्कृतिक समन्वय की मिसाल बना हुआ है।

हकीम खां सूरी से जोड़ते हैं अपनी विरासत

गांव के पठान परिवार स्वयं को महाराणा प्रताप के वीर सेनापति हकीम खां सूरी का वंशज मानते हैं। ग्रामीणों का कहना है कि उनकी पहचान केवल धार्मिक आधार पर नहीं, बल्कि ऐतिहासिक और राष्ट्रीय विरासत से जुड़ी हुई है।

देशसेवा की परंपरा पर गर्व

इस्लामपुर के लोगों का दावा है कि गांव ने देश को कई सैनिक और अधिकारी दिए हैं। कर्नल अब्दुल रसूल खान को 1965 और 1971 के भारत-पाक युद्धों में उत्कृष्ट सेवाओं के लिए विशिष्ट सेवा मेडल से सम्मानित किया गया था। उनके पुत्र कर्नल नसीम हैदर भी सेना से सेवानिवृत्त हो चुके हैं, जबकि अब्दुल रऊफ भारतीय वायुसेना में सेवाएं दे रहे हैं।

15 जून को होगा पैदल मार्च

नाम परिवर्तन के प्रस्ताव के विरोध में शुक्रवार को गांव में प्रशासक आमीन मनियार की मौजूदगी में बैठक आयोजित की गई। ग्रामीणों ने जिला कलेक्टर को ज्ञापन सौंपकर प्रस्ताव वापस लेने की मांग की। ग्रामीण प्रतिनिधियों दामोदर मेघवाल, शैलेष भारती और दिनेश बरवड़ सहित अन्य लोगों ने कहा कि गांव का नाम किसी भी परिस्थिति में नहीं बदला जाना चाहिए।

सद्भाव और समरसता की मिसाल

ग्रामीणों के अनुसार इस्लामपुर की स्थापना के समय मस्जिद के साथ मंदिर भी स्थापित किया गया था। गांव स्थित सूफी संत हजरत इरादतुल्लाह शाह साहब की दरगाह आज भी सामाजिक समरसता और सांप्रदायिक सौहार्द का प्रतीक मानी जाती है, जहां सभी धर्मों के लोग श्रद्धा के साथ पहुंचते हैं।

‘विरासत पर मंडरा रहा खतरा’

अंजुमन अल पठान के सचिव मोहम्मद इब्राहीम खान ने कहा कि गांव का नाम बदलने के प्रयास उनकी 400 साल पुरानी ऐतिहासिक विरासत और पहचान के लिए खतरा हैं। उन्होंने कहा कि ग्रामीण अपने गांव के मूल नाम और इतिहास को संरक्षित रखने के लिए लोकतांत्रिक तरीके से संघर्ष जारी रखेंगे।

शेयर करें: