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राष्ट्रसंत जनार्दन स्वामी को नमन: श्रीमहंत हरि गिरि महाराज ने कोपरगांव में राष्ट्रसंत जनार्दन स्वामी की समाधि पर की विशेष पूजा, संतों ने दी भावभीनी श्रद्धांजलि

प्रदीप बीदावत

जूना अखाड़ा के महामंत्री श्रीमहंत हरि गिरि महाराज ने कोपरगांव स्थित राष्ट्रसंत जनार्दन स्वामी के समाधि मंदिर में दर्शन-पूजन किया। उन्होंने स्वामी जी के आध्यात्मिक और सामाजिक योगदान को याद किया।

HIGHLIGHTS

  • श्रीमहंत हरि गिरि महाराज ने जनार्दन स्वामी की समाधि पर राष्ट्र कल्याण की प्रार्थना की।
  • जनार्दन स्वामी को महाराष्ट्र में ईश्वर-भक्ति और अतिथि-सेवा का पर्याय माना जाता है।
  • श्रीमहंत नारायण गिरि ने स्वामी जी को भगवान दत्तात्रेय का महान साक्षात्कारकर्ता बताया।
  • उनकी उदारता से प्रभावित होकर हिंदू, मुस्लिम और अरब भक्त भी उनके अनुयायी बने।
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कोपरगांव | महाराष्ट्र की पावन और आध्यात्मिक धरती हमेशा से ही महान संतों की कर्मस्थली रही है। इसी कड़ी में हाल ही में एक महत्वपूर्ण आध्यात्मिक आयोजन हुआ।

जूना अखाड़ा के अंतरराष्ट्रीय संरक्षक और अखिल भारतीय अखाड़ा परिषद के महामंत्री श्रीमहंत हरि गिरि महाराज कोपरगांव पहुंचे।

वहां उन्होंने राष्ट्रसंत सद्गुरु जनार्दन स्वामी (मौनगिरि जी महाराज) के समाधि मंदिर में विधि-विधान से दर्शन और पूजन किया।

आध्यात्मिक ज्योति को नमन

श्रीमहंत हरि गिरि महाराज ने राष्ट्रसंत की समाधि पर श्रद्धासुमन अर्पित किए। उन्होंने सभी भक्तों के कल्याण के लिए विशेष प्रार्थना की।

इस अवसर पर उन्होंने कहा कि जनार्दन स्वामी महाराज का महाराष्ट्र में अत्यंत सम्मान है। जनता उन्हें अपना मार्गदर्शक मानती है।

उनके साथ जूना अखाड़ा के अध्यक्ष मोहन भारती महाराज और सचिव श्रीमहंत ओम गिरि महाराज भी उपस्थित रहे।

महामंडलेश्वर शिव गिरि महाराज और श्रीमहंत बिशंबर गिरि महाराज ने भी समाधि पर पूजा-अर्चना में भाग लिया।

समर्पण और भक्ति का जीवन

हरि गिरि महाराज ने बताया कि जनार्दन स्वामी का पूरा जीवन ईश्वर-भक्ति और अतिथि-सेवा के लिए समर्पित था।

उन्होंने कहा कि स्वामी जी ने रामकाज को अपने जीवन का मुख्य ध्येय बनाया। उनके द्वारा जलाई गई ज्योति आज भी करोड़ों को आलोकित कर रही है।

स्वामी जी ने न केवल आध्यात्मिक ज्ञान दिया, बल्कि व्यावहारिक जीवन जीना भी सिखाया। उन्होंने धर्म और कर्म के बीच संतुलन बनाना सिखाया।

भगवान दत्तात्रेय के अनन्य उपासक

गाजियाबाद के सिद्धपीठ श्री दूधेश्वर नाथ मठ महादेव मंदिर के पीठाधीश्वर श्रीमहंत नारायण गिरि महाराज ने भी स्वामी जी पर प्रकाश डाला।

उन्होंने बताया कि जनार्दन स्वामी एक महान दत्त-उपासक थे। बचपन से ही उनकी रुचि धर्म और अध्यात्म में बहुत गहरी थी।

उन्हें अंकलखोप में भगवान दत्तात्रेय का साक्षात अनुग्रह प्राप्त हुआ था। वे सिद्ध महंत शिवगिरि जी महाराज के परम शिष्य थे।

साधना और चमत्कारिक प्रभाव

जनार्दन स्वामी प्रतिदिन गुरुचरित्र और ज्ञानेश्वरी का पाठ करते थे। देवगिरि किले की गोरक्ष गुफा उनकी साधना का मुख्य केंद्र रही।

उनकी भक्ति का प्रभाव ऐसा था कि देवगिरि क्षेत्र में शुक्रवार की जगह गुरुवार को साप्ताहिक अवकाश रखा जाने लगा।

शूलभंजन पर्वत पर उन्होंने भगवान दत्तात्रेय का साक्षात्कार किया। उन्हें कलियुग में दत्तात्रेय का प्रथम शिष्य माना जाता है।

सामाजिक समरसता के अग्रदूत

जनार्दन स्वामी की उदारता की कोई सीमा नहीं थी। उनके शिष्यों में केवल हिंदू ही नहीं, बल्कि मुस्लिम और अरब भक्त भी शामिल थे।

उनकी विद्वत्ता और प्रेमपूर्ण व्यवहार ने समाज के हर वर्ग को प्रभावित किया। वे सही मायने में एक राष्ट्रसंत थे।

उनका जन्म, गुरु-दर्शन और समाधि दिवस एक ही तिथि 'फाल्गुन कृष्ण षष्ठी' को मनाया जाता है, जो अपने आप में अद्भुत है।

महाराष्ट्र में सेवा कार्यों का विस्तार

स्वामी जी ने कोपरगांव, नासिक, त्र्यंबकेश्वर और छत्रपति संभाजीनगर जैसे क्षेत्रों में अनेक शिव मंदिरों का निर्माण करवाया।

उन्होंने पूरे महाराष्ट्र को प्रदोष व्रत के महत्व से परिचित कराया। उन्हें 'कर्मयोगी योगी' के नाम से भी जाना जाता है।

आज भी उनके द्वारा स्थापित आश्रम और मंदिर लोगों को शांति और आध्यात्मिकता का संदेश दे रहे हैं।

निष्कर्ष: संतों का संदेश

श्रीमहंत नारायण गिरि महाराज ने कहा कि गुरु जनार्दन की कृपा से दत्त भगवान सदैव भक्तों के हृदय में वास करते हैं।

उन्होंने लोगों को भौतिकवाद से ऊपर उठकर आध्यात्मिक जीवन जीने की प्रेरणा दी। उनका जीवन आज भी एक प्रकाश स्तंभ है।

इस दर्शन यात्रा ने भक्तों के बीच नई ऊर्जा का संचार किया है। संतों का यह समागम धर्म की रक्षा का प्रतीक है।

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