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भारत

भारत ला रहा अपना सोना वापस: इंग्लैंड से क्यों अपना सोना वापस ला रहा भारत? जानिए वजह

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आरबीआई ने इंग्लैंड से 100 टन सोना वापस मंगाया, अब देश में है 77% भंडार।

HIGHLIGHTS

  • भारत ने पिछले 6 महीनों में इंग्लैंड से 100 टन से ज्यादा सोना वापस मंगाया है।
  • अब भारत के कुल गोल्ड रिजर्व का करीब 77 प्रतिशत हिस्सा देश के भीतर ही सुरक्षित है।
  • रूस-यूक्रेन युद्ध के बाद देशों में अपनी विदेशी संपत्तियों को लेकर असुरक्षा बढ़ी है।
  • भारत के विदेशी मुद्रा भंडार में सोने की कुल हिस्सेदारी बढ़कर 16.7 फीसदी हो गई है।
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नई दिल्ली | भारत अपनी आर्थिक ताकत को मजबूत करने के लिए एक बड़ा कदम उठा रहा है। पिछले कुछ समय से भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) विदेशों में रखे अपने सोने को वापस देश ला रहा है। यह कदम वैश्विक राजनीति और आर्थिक सुरक्षा के बदलते दौर में काफी महत्वपूर्ण माना जा रहा है। भारत अब अपने सोने को सुरक्षित रखने के लिए आत्मनिर्भर बन रहा है।

भारत का सोना और विदेशी तिजोरियां

सालों से दुनिया के कई देश अपना सोना बैंक ऑफ इंग्लैंड या न्यूयॉर्क के फेडरल रिजर्व में रखते आए हैं। इसका मुख्य उद्देश्य अंतरराष्ट्रीय व्यापार में सहूलियत और सुरक्षा सुनिश्चित करना था। लेकिन अब वैश्विक परिस्थितियां बदल रही हैं। भारत ने अपनी रणनीति में बड़ा बदलाव किया है। अब भारत का ध्यान अपने सोने को अपने ही देश की तिजोरियों में सुरक्षित रखने पर है। विदेशी बैंकों में सोना रखने का रिवाज पुराना है। वहां से सोने का लेन-देन और ट्रेडिंग करना काफी आसान होता था। मगर अब प्राथमिकताएं पूरी तरह बदल चुकी हैं।

तेजी से बढ़ता घरेलू भंडार

आरबीआई के ताजा आंकड़ों के अनुसार, अब भारत का लगभग 77 प्रतिशत सोना देश के भीतर ही सुरक्षित रखा गया है। इसका मतलब है कि करीब 680 टन सोना अब भारत में मौजूद है। हैरान करने वाली बात यह है कि पिछले महज छह महीनों के भीतर ही 100 टन से ज्यादा सोना इंग्लैंड से वापस मंगाया गया है। यह रफ्तार भारत की भविष्य की तैयारियों को दर्शाती है। भारत धीरे-धीरे अपने भंडार को बढ़ा रहा है। यह न केवल आर्थिक मजबूती का प्रतीक है, बल्कि यह देश के नागरिकों के भरोसे को भी बढ़ाता है।

भरोसे की बदलती परिभाषा

रूस और यूक्रेन के बीच चल रहे युद्ध ने दुनिया के कई देशों को अपनी संपत्तियों की सुरक्षा को लेकर सोचने पर मजबूर कर दिया है। युद्ध के दौरान कई देशों की विदेशी संपत्तियों पर रोक लगा दी गई थी।

"जब वैश्विक हालात बिगड़ते हैं, तो असली ताकत उसी देश के पास होती है, जिसके पास उसका सोना अपनी सीमाओं के भीतर सुरक्षित रखा हो।"

इस घटनाक्रम ने यह सवाल खड़ा कर दिया कि अगर आपका सोना विदेश में है, तो संकट के समय वह कितना आपका रहेगा? इसी डर ने सोने की वापसी को तेज कर दिया है। विकसित देशों के वॉल्ट अब पहले जितने सुरक्षित नहीं माने जा रहे। राजनीतिक अस्थिरता ने दुनिया भर के केंद्रीय बैंकों को सतर्क कर दिया है।

आर्थिक सुरक्षा का नया कवच

अब सोना केवल खजाने का हिस्सा नहीं है, बल्कि इसे एक मजबूत आर्थिक हथियार माना जा रहा है। भारत के विदेशी मुद्रा भंडार में सोने की हिस्सेदारी बढ़कर 16.7 फीसदी हो गई है। लंदन और न्यूयॉर्क दशकों से सोने के व्यापार के सबसे बड़े केंद्र रहे हैं। वहां सोना रखने से ट्रेडिंग आसान होती थी, लेकिन अब सुरक्षा और राजनीति ज्यादा महत्वपूर्ण हो गए हैं। भारत की यह रणनीति उसे किसी भी बाहरी दबाव से बचाने में मदद करेगी। अपनी संपत्ति पर अपना नियंत्रण होना ही सच्ची आर्थिक आजादी है।

दुनियाभर में मची है होड़

भारत अकेला ऐसा देश नहीं है जो यह कदम उठा रहा है। फ्रांस ने भी अपना काफी सोना पेरिस शिफ्ट कर लिया है। जर्मनी और पोलैंड जैसे देश भी धीरे-धीरे अपनी रणनीति बदल रहे हैं। जहां पोलैंड संतुलन बनाने की कोशिश कर रहा है, वहीं चेक गणराज्य जैसे कुछ देश अब भी विदेशों में सोना रखने को बेहतर मानते हैं। हर देश अपने जोखिम का आकलन कर रहा है। भारत ने पूरी तरह से विदेश से नाता नहीं तोड़ा है। कुछ सोना अभी भी बाहर रखा गया है ताकि अंतरराष्ट्रीय लेनदेन में कोई समस्या न आए, लेकिन प्राथमिकता अब देश है। इस पूरी प्रक्रिया का मुख्य उद्देश्य भारत की आर्थिक संप्रभुता को सुरक्षित करना है। अपने पास रखा सोना किसी भी वैश्विक संकट या प्रतिबंधों के समय देश को एक मजबूत सुरक्षा कवच प्रदान करता है। आने वाले समय में भारत अपने भंडार को और बढ़ा सकता है। यह कदम वैश्विक बाजार में भारत की साख को और भी ज्यादा मजबूत करने वाला साबित होगा।

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