जयपुर | राजस्थान की राजधानी जयपुर स्थित प्रदेश के सबसे बड़े सवाई मानसिंह (SMS) अस्पताल से मानवता को शर्मसार करने वाली एक तस्वीर सामने आई है। डीग जिले में हुए भीषण अग्निकांड में झुलसा एक युवक अस्पताल में स्ट्रेचर न मिलने के कारण हाथ में ड्रिप लिए खुद पैदल चलकर इमरजेंसी वार्ड तक पहुंचा।
SMS अस्पताल की शर्मनाक तस्वीर: जयपुर: झुलसा युवक हाथ में ड्रिप लिए खुद चलकर गया इमरजेंसी
जयपुर के SMS अस्पताल में लापरवाही: स्ट्रेचर न मिलने पर झुलसा युवक खुद चलकर इमरजेंसी पहुंचा।
HIGHLIGHTS
- डीग में एलपीजी सिलेंडर ब्लास्ट के बाद जयपुर के एसएमएस अस्पताल में बड़ी लापरवाही सामने आई।
- अस्पताल में स्ट्रेचर और व्हीलचेयर नहीं मिलने पर झुलसा युवक हाथ में ड्रिप लिए खुद चलकर इमरजेंसी गया।
- भीषण आग की चपेट में आने से परिवार के दो मासूम बच्चों की इलाज के दौरान दर्दनाक मौत हो गई।
- ईको वैन में गैस भरते समय हुआ जोरदार धमाका, कोल्ड ड्रिंक गोदाम और घर में फैली भीषण आग।
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प्रदेश के सबसे बड़े चिकित्सा केंद्र में इस घायल व्यक्ति को न तो स्ट्रेचर मिला और न ही व्हीलचेयर नसीब हुई। यह मंजर देखकर वहां मौजूद हर शख्स दंग रह गया। अस्पताल की इस लापरवाही ने सरकारी दावों की कलई खोलकर रख दी है।
डीग जिले के कामां इलाके में मंगलवार शाम को एक ईको वैन में गैस भरते समय भीषण ब्लास्ट हुआ था। इस हादसे में एक ही परिवार के सात लोग बुरी तरह झुलस गए थे, जिनमें से दो मासूमों की मौत हो गई।
अस्पताल की दहलीज पर सिस्टम की विफलता
घायल मनमोहन जब एंबुलेंस से एसएमएस अस्पताल पहुंचा, तो वहां भारी भीड़ और अफरा-तफरी का माहौल था। उसे तुरंत चिकित्सा सहायता की जरूरत थी, लेकिन अस्पताल प्रशासन की ओर से कोई वार्ड बॉय या सहायक उपलब्ध नहीं हुआ।
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मनमोहन के शरीर पर जलने के गहरे निशान थे और उसके हाथ में ग्लूकोज की ड्रिप लगी हुई थी। वह दर्द से कराह रहा था, लेकिन स्ट्रेचर की कमी ने उसे पैदल चलने पर मजबूर कर दिया। वह काफी देर तक गेट पर खड़ा रहा।
इमरजेंसी के गेट पर वह कुछ देर तक मदद की उम्मीद में इधर-उधर देखता रहा। जब कोई मदद नहीं मिली, तो वह हिम्मत जुटाकर खुद ही अंदर की तरफ चल पड़ा। बाद में किसी तरह एक व्हीलचेयर का इंतजाम किया गया।
पत्नी को ढांढस बंधाता रहा घायल पति
मनमोहन की पत्नी सरिता भी इस हादसे में गंभीर रूप से झुलसी हुई थी। वह एंबुलेंस में दर्द के मारे जोर-जोर से चीख रही थी। मनमोहन खुद गंभीर हालत में था, लेकिन उसने अपनी हिम्मत नहीं खोई और पत्नी का हौसला बढ़ाया।
उसने अपनी पत्नी के सिर पर हाथ रखकर बहुत ही धीमी आवाज में कहा कि वह बच्चों की फिक्र न करे, सब ठीक हो जाएगा। उस वक्त तक बदनसीब पिता को यह नहीं पता था कि उसका लाडला अब नहीं रहा।
हादसे के बाद करीब आधे घंटे तक प्रशासन का कोई भी जिम्मेदार व्यक्ति मौके पर नहीं पहुंचा। फायर ब्रिगेड भी काफी देर बाद आई। तब तक हम खुद ही लोगों को बचा रहे थे।
भीषण आग और छत से कूदते लोग
मनमोहन के चचेरे भाई भगवान सिंह ने बताया कि हादसा इतना अचानक और भयानक था कि नीचे का पूरा हिस्सा आग की लपटों से घिर गया। घर से बाहर निकलने का मुख्य रास्ता आग के कारण पूरी तरह बंद हो चुका था।
आग की लपटें तेजी से ऊपर की ओर बढ़ रही थीं और धुएं के कारण दम घुटने लगा था। ऐसे में बच्चों और महिलाओं को बचाने के लिए सामने की छत से नीचे कूदने के अलावा कोई दूसरा विकल्प नहीं बचा था।
सबसे पहले 11 साल की अक्षरा को नीचे उतारा गया। इसके बाद अन्य सदस्यों ने भी जान बचाने के लिए छलांग लगा दी। नीचे खड़े स्थानीय लोग कंबल और चादर लेकर उन्हें सुरक्षित उतारने की कोशिश कर रहे थे।
दो मासूमों की मौत से पसरा मातम
इस दर्दनाक हादसे में 11 साल की अक्षरा और 8 साल के लक्ष्य की जान चली गई। अक्षरा ने भरतपुर के अस्पताल में दम तोड़ा, जबकि लक्ष्य को जयपुर के एसएमएस अस्पताल में डॉक्टरों ने मृत घोषित कर दिया।
परिवार के अन्य सदस्य अभी भी बर्न यूनिट में जिंदगी और मौत के बीच जंग लड़ रहे हैं। हादसे के वक्त घर के बुजुर्ग दाताराम और लक्ष्मीचंद बाहर थे, जिसके चलते उनकी जान बच गई और वे सुरक्षित रहे।
गैस रिफिलिंग के दौरान हुआ धमाका
प्रारंभिक जांच के अनुसार, मनमोहन अपनी ईको वैन में घरेलू एलपीजी सिलेंडर से गैस भर रहा था। इसी दौरान अचानक विस्फोट हुआ। मनमोहन गांवों में कोल्ड ड्रिंक सप्लाई का काम करता है और इसी वैन का उपयोग करता था।
वैन के पास ही कोल्ड ड्रिंक का गोदाम था, जिसमें रखी प्लास्टिक की बोतलों ने आग में घी का काम किया। देखते ही देखते आग ने ऊपर बने मकान को चपेट में ले लिया। दो गाड़ियां पूरी तरह जलकर राख हो गईं।
स्थानीय निवासी जितेंद्र सिंह ने बताया कि 8 साल का लक्ष्य बुरी तरह झुलसा हुआ था और वह बार-बार बचाने की गुहार लगा रहा था। इस घटना ने पूरे इलाके में शोक की लहर पैदा कर दी है।
यह घटना राजस्थान की स्वास्थ्य सेवाओं और सुरक्षा मानकों पर गंभीर सवाल खड़े करती है। एक तरफ मासूमों की मौत का गम है, तो दूसरी तरफ अस्पताल की संवेदनहीनता ने लोगों के गुस्से को और भड़का दिया है।
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