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क्राइम

जयपुर में आतंकी 'खरगोश' का खुलासा: जयपुर में 1 साल रहा लश्कर आतंकी खरगोश, ऐसे बनाया फर्जी पासपोर्ट

प्रदीप बीदावत

लश्कर आतंकी उमर हारिस जयपुर में पहचान छिपाकर रहा और फर्जी पासपोर्ट बनवाकर विदेश भागने में सफल रहा।

HIGHLIGHTS

  • लश्कर-ए-तैयबा का आतंकी उमर हारिस उर्फ 'खरगोश' जयपुर के जयसिंहपुरा खोर में एक साल तक रहा।
  • उसने फर्जी दस्तावेजों के आधार पर भारतीय पासपोर्ट बनवाया और पुलिस वेरिफिकेशन को चकमा दिया।
  • आतंकी जयपुर की सी-स्कीम स्थित एक इलेक्ट्रॉनिक रिपेयरिंग कंपनी में नौकरी भी करता था।
  • नूंह-मेवात के चार मददगारों ने उसे कमरा दिलाने और दस्तावेज बनवाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।
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जयपुर | राजस्थान की राजधानी जयपुर, जो अपनी शांति और संस्कृति के लिए जानी जाती है, वहां से हाल ही में एक ऐसी खबर सामने आई जिसने सुरक्षा एजेंसियों की नींद उड़ा दी है। लश्कर-ए-तैयबा से जुड़ा एक खूंखार आतंकी उमर हारिस, जिसे सुरक्षा गलियारों में 'खरगोश' के कोड नेम से जाना जाता है, जयपुर के एक रिहायशी इलाके में करीब एक साल तक बड़े ही आराम से रहा।

हैरानी की बात यह है कि वह केवल यहां रहा ही नहीं, बल्कि उसने फर्जी दस्तावेजों के आधार पर भारत का पासपोर्ट भी बनवा लिया और सुरक्षा तंत्र को चकमा देकर विदेश भागने में भी सफल रहा। इस खुलासे के बाद अब जयपुर के सुरक्षा घेरे और पुलिस वेरिफिकेशन की प्रक्रिया पर कई गंभीर सवाल खड़े हो गए हैं।

जयपुर की गलियों में कैसे छिपा था 'खरगोश'?

आतंकी उमर हारिस ने जयपुर के जयसिंहपुरा खोर इलाके के अंतर्गत आने वाली राशिद विहार कॉलोनी को अपना ठिकाना बनाया था। यह इलाका शहर के मुख्य केंद्रों से थोड़ा दूर और सुनसान माना जाता है, जिससे बाहरी लोगों की आवाजाही कम रहती है। यहां उसने महज 1500 रुपये महीने के किराए पर एक छोटा सा कमरा लिया था।

यह कमरा पांच भाइयों—सद्दाम, आमिर हसन, जामिर, राहुल और अफरीदी के खेत में बने एक मकान का हिस्सा था। स्थानीय लोगों का कहना है कि उसने अपना नाम 'सज्जाद' बताया था और वह खुद को एक साधारण कर्मचारी के रूप में पेश करता था। उसकी इस सादगी और शांत व्यवहार के पीछे एक भयानक आतंकी साजिश छिपी थी, जिसकी भनक उसके पड़ोसियों तक को नहीं लगी।

16 घंटे लैपटॉप और मस्जिद: आतंकी की खामोश दिनचर्या

उमर हारिस की दिनचर्या बेहद सधी हुई और संदिग्ध गतिविधियों से भरी थी, लेकिन उसने इसे इतनी चालाकी से अंजाम दिया कि किसी को शक नहीं हुआ। पड़ोस में रहने वाले रिहान और अन्य लोगों ने बताया कि वह दिन के करीब 16 घंटे अपने लैपटॉप पर बिताता था। वह किसी से ज्यादा बात नहीं करता था और न ही किसी सामाजिक कार्यक्रम में हिस्सा लेता था।

वह केवल नमाज अदा करने के लिए पास की मस्जिद जाता था और वहां से सीधे अपने कमरे में लौट आता था। उसकी इसी 'चुप्पी' ने उसे एक साल तक गुमनाम बनाए रखने में मदद की। उसने अपनी दाढ़ी बढ़ा रखी थी और वह बेहद सौम्य दिखने का नाटक करता था, जिससे लोग उसे एक धार्मिक और सीधा व्यक्ति समझने की भूल कर बैठे।

सी-स्कीम में नौकरी और फर्जी दस्तावेजों का खतरनाक जाल

जयपुर में रहने के दौरान उमर हारिस ने केवल छिपने का काम नहीं किया, बल्कि उसने शहर के पॉश इलाके सी-स्कीम में एक इलेक्ट्रॉनिक रिपेयरिंग कंपनी में नौकरी भी हासिल कर ली थी। इस नौकरी के दौरान उसने शहर के कई महत्वपूर्ण इलाकों की रेकी की होगी, ऐसी आशंका जताई जा रही है।

 जांच में सामने आया है कि उसने स्थानीय लोगों से मेल-जोल बढ़ाकर अपना एक फर्जी किरायानामा तैयार करवाया। इसी किरायानामे और अन्य फर्जी दस्तावेजों के आधार पर उसने न केवल अपनी स्थानीय पहचान पुख्ता की, बल्कि भारतीय पासपोर्ट के लिए आवेदन भी कर दिया। सबसे चौंकाने वाला तथ्य यह है कि पुलिस वेरिफिकेशन के दौरान भी उसकी असलियत सामने नहीं आ पाई और उसे क्लीन चिट मिल गई।

चार मददगारों का नूंह-मेवात कनेक्शन और एटीएस की जांच

इस पूरे मामले में आतंकी की मदद करने वाले चार लोगों की भूमिका सबसे अहम रही है। जांच एजेंसियों के अनुसार, ये चारों मददगार मूल रूप से हरियाणा के नूंह-मेवात इलाके के रहने वाले हैं और लंबे समय से जयपुर में बस गए थे।

इनमें से एक ने उसे सी-स्कीम में नौकरी दिलवाई, दूसरे ने फर्जी किरायानामा बनवाने में मदद की, तीसरे ने पासपोर्ट बनवाने के लिए कागजात तैयार किए और चौथे शख्स ने उसे जयपुर के अलावा नेपाल, उत्तर प्रदेश और अन्य राज्यों में घुमाया।

राजस्थान एटीएस और जम्मू-कश्मीर पुलिस ने इन चारों संदिग्धों को हिरासत में लेकर पूछताछ की है। हालांकि इनका कोई सीधा आतंकी लिंक अभी तक स्थापित नहीं हुआ है, लेकिन इनकी मदद के बिना उमर का जयपुर में टिकना नामुमकिन था। एटीएस के अतिरिक्त पुलिस महानिदेशक दिनेश एम.एन के अनुसार, चार संदिग्धों को पकड़कर जम्मू कश्मीर पुलिस को सौंप दिया गया है और मामले की गहनता से जांच की जा रही है।

फर्जी पासपोर्ट और सुरक्षा तंत्र की बड़ी विफलता पर सवाल

उमर हारिस का मामला भारतीय सुरक्षा और पासपोर्ट जारी करने की प्रक्रिया में मौजूद खामियों को उजागर करता है। उसने जयपुर में पहचान बदलकर एक स्थानीय लड़की से निकाह भी किया था, जो लश्कर के ही एक ओवर ग्राउंड वर्कर (OGW) की बेटी बताई जा रही है।

निकाह के दस्तावेजों का इस्तेमाल उसने अपनी नागरिकता साबित करने के लिए किया। इसी पासपोर्ट की मदद से वह पहले इंडोनेशिया भागा और फिर वहां से फर्जी ट्रैवल डॉक्यूमेंट्स का उपयोग कर 2024 की शुरुआत में सऊदी अरब पहुंच गया।

श्रीनगर पुलिस और केंद्रीय खुफिया एजेंसियों की जांच में जब इस अंतरराष्ट्रीय मॉड्यूल का भंडाफोड़ हुआ, तब जाकर जयपुर पुलिस को इस बड़ी चूक का अहसास हुआ।

2012 से शुरू हुआ आतंकी सफर: घुसपैठ से अंतरराष्ट्रीय नेटवर्क तक

जांच में यह भी सामने आया है कि उमर हारिस साल 2012 में पाकिस्तान से घुसपैठ कर जम्मू-कश्मीर के रास्ते भारत आया था। वह लंबे समय तक घाटी में सक्रिय रहा और सुरक्षा बलों की नजरों से बचने के लिए बार-बार ठिकाने बदलता रहता था, इसी वजह से उसका कोड नेम 'खरगोश' रखा गया था।

उसका संबंध लश्कर के एक बड़े नेटवर्क से है, जिसमें अब्दुल्ला उर्फ अबू हुरैरा जैसे आतंकी शामिल हैं जो पिछले 16 सालों से फरार थे। यह मॉड्यूल हरियाणा के फरीदाबाद स्थित अल-फलाह विश्वविद्यालय के आसपास केंद्रित एक 'सफेदपोश' आतंकी सेल से भी जुड़ा हुआ पाया गया है।

फिलहाल, एजेंसियां इस बात की गहराई से पड़ताल कर रही हैं कि जयपुर में उसके और कौन-कौन से मददगार थे और उसके लैपटॉप में कौन से राज छिपे हैं। उमर हारिस उर्फ खरगोश का मामला एक गंभीर चेतावनी है कि कैसे आतंकी संगठन अब छोटे शहरों और शांत कॉलोनियों को अपना सुरक्षित ठिकाना बना रहे हैं।

जयपुर जैसे शहर में एक आतंकी का एक साल तक रहना और पासपोर्ट बनवाकर भाग जाना हमारी सुरक्षा व्यवस्था के लिए एक बड़ा सबक है। अब समय आ गया है कि किराएदारों के वेरिफिकेशन और पासपोर्ट जारी करने की प्रक्रिया को और अधिक सख्त और अभेद्य बनाया जाए ताकि भविष्य में कोई दूसरा 'खरगोश' हमारे बीच न छिप सके।

*Edit with Google AI Studio

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