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भारत

प्रोटीन पाउडर की कीमतों में भारी उछाल: प्रोटीन पाउडर हुआ महंगा, फिटनेस का शौक अब जेब पर भारी

जोगेन्द्र सिंह शेखावत

भारत में प्रोटीन सप्लीमेंट्स की कीमतें 40% तक बढ़ीं, जानिए क्यों हो रहा है ऐसा।

HIGHLIGHTS

  • व्हे प्रोटीन आइसोलेट की थोक कीमत 800 रुपये से बढ़कर 3600 रुपये प्रति किलो तक पहुंच गई है।
  • मसलब्लेज और योगा बार जैसी कंपनियों ने अपने उत्पादों के दाम 10 से 25 फीसदी तक बढ़ा दिए हैं।
  • भारत अपनी प्रोटीन जरूरत का लगभग 90 प्रतिशत हिस्सा यूरोप जैसे विदेशी बाजारों से आयात करता है।
  • वजन घटाने वाली दवाओं (GLP-1) के बढ़ते इस्तेमाल से दुनिया भर में प्रोटीन की मांग में अचानक उछाल आया है।
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नई दिल्ली | भारत में फिटनेस के प्रति बढ़ती जागरूकता के बीच एक चिंताजनक खबर सामने आ रही है। अगर आप भी अपनी सेहत और मसल्स बनाने के लिए प्रोटीन पाउडर पर निर्भर हैं, तो अब आपको अपनी जेब ज्यादा ढीली करनी पड़ेगी। प्रोटीन सप्लीमेंट्स की कीमतों में भारी उछाल आया है।

आसमान छूती सप्लीमेंट्स की कीमतें

पिछले कुछ सालों में प्रोटीन पाउडर केवल बॉडीबिल्डर्स तक सीमित नहीं रहा है। अब कॉलेज के छात्र और ऑफिस जाने वाले लोग भी इसे अपनी डाइट का हिस्सा बना रहे हैं।

लेकिन अब यही फिटनेस का शौक महंगा हो गया है। थोक बाजार में व्हे कंसंट्रेट की कीमत जो साल 2023-24 में 700 रुपये थी, वह अब 2700 रुपये प्रति किलो हो गई है।

यह बढ़ोत्तरी लगभग चार गुना है, जिसने सप्लीमेंट इंडस्ट्री को हिलाकर रख दिया है। प्रीमियम व्हे आइसोलेट की स्थिति तो और भी ज्यादा खराब नजर आ रही है।

इसकी कीमत 800 रुपये से बढ़कर 3600 रुपये प्रति किलो तक पहुंच गई है। इससे रिटेल ग्राहकों के लिए सप्लीमेंट खरीदना अब एक बड़ी आर्थिक चुनौती बन गया है।

कंपनियों ने बढ़ाए रिटेल दाम

द होल ट्रुथ, योगा बार और मसलब्लेज जैसी प्रमुख कंपनियों ने अपने उत्पादों की कीमतों में 10 से 25 फीसदी की बढ़ोतरी की है। यह ग्राहकों के लिए बड़ा झटका है।

कुछ खास प्रोडक्ट्स तो पिछले साल की तुलना में 40 फीसदी तक महंगे हो गए हैं। पहले जो प्रोटीन डिब्बा 2000 रुपये में मिलता था, वह अब 3500 रुपये के पार है।

वहीं व्हे आइसोलेट अब 4500 रुपये प्रति किलो के आसपास बिक रहा है। यह कीमत मध्यम वर्ग के युवाओं के मासिक बजट को पूरी तरह से बिगाड़ रही है।

प्रोटीन के एक स्कूप की कीमत भी अब बढ़ गई है। साल 2024 की शुरुआत में एक स्कूप प्रोटीन लगभग 80 रुपये का पड़ता था, जो अब 120 रुपये तक है।

आखिर क्यों बढ़ रहे हैं दाम?

भारत अपनी प्रोटीन जरूरत का लगभग 90 प्रतिशत हिस्सा विदेशों से, खासकर यूरोप से आयात करता है। अंतरराष्ट्रीय सप्लाई चेन में आई दिक्कतों ने भारतीय बाजार पर सीधा प्रहार किया है।

दुनिया भर में हाई-प्रोटीन डाइट का चलन तेजी से बढ़ा है। लोग अब कार्बोहाइड्रेट की जगह प्रोटीन को प्राथमिकता दे रहे हैं, जिससे मांग और आपूर्ति का संतुलन बिगड़ गया है।

"प्रोटीन की बढ़ती मांग और वैश्विक आपूर्ति में कमी के कारण कीमतों पर दबाव बढ़ रहा है। हमें अब वैकल्पिक स्रोतों और स्थानीय उत्पादन पर ध्यान देना होगा।"

वजन घटाने वाली आधुनिक दवाओं (GLP-1) के बढ़ते इस्तेमाल ने भी प्रोटीन की मांग को बढ़ाया है। डॉक्टर इन दवाओं के साथ ज्यादा प्रोटीन लेने की सलाह देते हैं।

शिपिंग और भू-राजनीतिक तनाव का असर

भू-राजनीतिक तनाव और रेड सी संकट के कारण शिपिंग खर्च में भारी इजाफा हुआ है। मालवाहक जहाजों को अब लंबे रास्तों से आना पड़ रहा है, जिससे किराया बढ़ गया है।

इसके साथ ही डॉलर के मुकाबले रुपये की कमजोरी ने आयात को और भी ज्यादा महंगा बना दिया है। भारतीय कंपनियों को कच्चा माल खरीदने के लिए अधिक भुगतान करना पड़ रहा है।

सिर्फ पाउडर ही नहीं, स्नैक्स भी महंगे

प्रोटीन सप्लीमेंट्स के अलावा हाई-प्रोटीन बार और हेल्थ स्नैक्स बनाने वाली कंपनियों को भी बड़ा झटका लगा है। कच्चा माल महंगा होने से उत्पादन लागत काफी बढ़ गई है।

ड्राई फ्रूट्स और कोको की कीमतों में भी तेजी देखी गई है। पिस्ता की कीमतों में करीब 70 फीसदी का उछाल आया है, जिससे हेल्थ बार का गणित बिगड़ गया है।

प्लांट प्रोटीन की ओर बढ़ता रुझान

लागत को नियंत्रित करने के लिए कई कंपनियां अब प्लांट प्रोटीन और यीस्ट प्रोटीन जैसे विकल्पों को तलाश रही हैं। ये विकल्प व्हे प्रोटीन की तुलना में थोड़े सस्ते हैं।

हालांकि, फिटनेस एक्सपर्ट्स का मानना है कि व्हे प्रोटीन का टेक्सचर और स्वाद लोगों की पहली पसंद है। प्लांट प्रोटीन को अभी उस स्तर तक पहुंचना बाकी है।

कंपनियां अब ऐसे ब्लेंड बना रही हैं जिनमें व्हे और प्लांट प्रोटीन दोनों का मिश्रण हो। इससे स्वाद भी बना रहता है और उत्पाद की कीमत भी नियंत्रण में रहती है।

भारत को बनना होगा आत्मनिर्भर

विशेषज्ञों का कहना है कि भारत लंबे समय तक आयात पर निर्भर नहीं रह सकता। देश में पनीर और चीज का उत्पादन बढ़ रहा है, लेकिन व्हे उत्पादन अभी कम है।

कुछ भारतीय कंपनियां अब स्थानीय स्तर पर बड़े मैन्युफैक्चरिंग प्लांट लगाने की योजना बना रही हैं। इससे भविष्य में विदेशी निर्भरता कम होगी और कीमतें भी स्थिर हो सकेंगी।

प्रोटीन सप्लीमेंट्स की बढ़ती कीमतें फिटनेस प्रेमियों के लिए एक परीक्षा की घड़ी है। आने वाले महीनों में अगर वैश्विक हालात नहीं सुधरे, तो कीमतें और बढ़ सकती हैं।

*Edit with Google AI Studio

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