अजमेर | राजस्थान में फर्जी दिव्यांग प्रमाण पत्रों के जरिए सरकारी नौकरी हासिल करने वाले गिरोहों के खिलाफ एसओजी (SOG) ने अब मोर्चा खोल दिया है। इसी कड़ी में अजमेर संभाग के ब्यावर जिले से जुड़े एक मामले में कृषि विभाग के कर्मचारी पर कार्रवाई की तलवार लटक रही है।
फर्जी सर्टिफिकेट: कृषि विभाग में जांच: कृषि विभाग में फर्जी दिव्यांग सर्टिफिकेट केस: SOG की बड़ी जांच
राजस्थान के कृषि विभाग में फर्जी दिव्यांग प्रमाण पत्र मामले में SOG ने शुरू की कड़ी जांच।
HIGHLIGHTS
- एसओजी के निर्देश पर कृषि विभाग के कर्मचारी पवन दाधीच का अजमेर में मेडिकल करवाया गया।
- पवन दाधीच पर फर्जी दिव्यांग प्रमाण पत्र के आधार पर सरकारी नौकरी पाने का गंभीर आरोप है।
- कर्मचारी का दावा है कि वह 1999 से 70 प्रतिशत दिव्यांग है और उसके पास वैध दस्तावेज हैं।
- मसूदा सीओ जय सिंह के नेतृत्व में पुलिस टीम ने जेएलएन अस्पताल में ईएनटी जांच करवाई।
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अजमेर के जेएलएन अस्पताल में गहन मेडिकल जांच
जयपुर एसओजी की ओर से प्रदेश भर में फर्जी दिव्यांग प्रमाण पत्र मामले में की जा रही कार्रवाई के तहत ब्यावर पुलिस सक्रिय हो गई है। पुलिस की एक विशेष टीम कृषि विभाग में कार्यरत कर्मचारी पवन दाधीच को मेडिकल परीक्षण के लिए अजमेर के जेएलएन अस्पताल लेकर पहुंची। यहां अस्पताल के ईएनटी (नाक, कान, गला) विभाग में विशेषज्ञों की एक टीम ने कर्मचारी के सुनने की क्षमता की विस्तृत जांच की। मेडिकल बोर्ड के सामने पवन दाधीच को पेश किया गया, जहां उनके कानों की मशीन और सुनने की संवेदनशीलता का परीक्षण हुआ।
मसूदा सीओ जय सिंह की मौजूदगी में हुई कार्रवाई
इस पूरी प्रक्रिया के दौरान मसूदा सीओ जय सिंह स्वयं अस्पताल में मौजूद रहे और जांच की निगरानी करते नजर आए। उन्होंने बताया कि एसओजी मुख्यालय से फर्जी दिव्यांग प्रमाण पत्र के संबंध में एक गोपनीय शिकायत प्राप्त हुई थी। शिकायत में दावा किया गया था कि पवन दाधीच ने गलत तरीके से आरक्षण का लाभ लेकर सरकारी पद प्राप्त किया है। पुलिस ने कर्मचारी को हिरासत में लेकर उसके स्वास्थ्य और दिव्यांगता के वास्तविक स्तर की पुष्टि करने की प्रक्रिया शुरू कर दी है।
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कर्मचारी पवन दाधीच का अपना पक्ष और दलीलें
दूसरी ओर, आरोपित कर्मचारी पवन दाधीच ने इन सभी आरोपों को सिरे से खारिज करते हुए अपना पक्ष मजबूती से रखा है। पवन ने मीडिया को बताया कि उन्हें साल 1999 से ही दोनों कानों से सुनने में अत्यंत गंभीर समस्या का सामना करना पड़ रहा है। उन्होंने अपनी बात को पुख्ता करने के लिए पुराने मेडिकल रिकॉर्ड्स का हवाला दिया जो भीलवाड़ा जिला चिकित्सालय से जारी हुए थे। पवन का कहना है कि उनकी दिव्यांगता की पुष्टि जयपुर के प्रतिष्ठित एसएमएस मेडिकल कॉलेज में भी कई बार हो चुकी है।
70 प्रतिशत दिव्यांगता का दावा और मशीनों का सहारा
पवन दाधीच वर्तमान में बदनोर क्षेत्र के ग्राम चतरपुरा में कृषि विभाग में एग्रीकल्चर सुपरवाइजर के पद पर सेवाएं दे रहे हैं। उन्होंने स्पष्ट किया कि उनके दोनों कानों में सुनने वाली मशीनें लगी हुई हैं, जिनके बिना वे सामान्य संवाद नहीं कर सकते। पवन के अनुसार, 2018 की प्रतियोगी परीक्षा में उन्होंने अपनी मेहनत और वैध कोटे के तहत सफलता प्राप्त की थी। 31 जुलाई 2020 को उनकी पहली पोस्टिंग भीलवाड़ा में हुई थी, जहां उन्होंने अपना प्रशिक्षण सफलतापूर्वक पूरा किया था।
एसओजी की रडार पर राजस्थान के कई विभाग
राजस्थान में पिछले कुछ समय से फर्जी डिग्री और फर्जी प्रमाण पत्रों के आधार पर नौकरी पाने के मामलों में तेजी आई है। एसओजी के महानिदेशक के निर्देश पर अब हर उस विभाग की फाइलें खंगाली जा रही हैं जहां दिव्यांग कोटे में नियुक्तियां हुई हैं। विशेष रूप से कृषि विभाग, शिक्षा विभाग और राजस्व विभाग में संदिग्ध प्रमाण पत्रों की जांच के लिए मेडिकल बोर्ड गठित किए गए हैं। पवन दाधीच का मामला केवल एक उदाहरण है, ऐसे सैकड़ों कर्मचारी अब जांच एजेंसी के रडार पर आ चुके हैं।
भर्ती परीक्षाओं की सुचिता पर उठते गंभीर सवाल
जब भी कोई फर्जी प्रमाण पत्र वाला व्यक्ति नौकरी पाता है, तो वह एक योग्य और वास्तविक दिव्यांग उम्मीदवार का हक मारता है। सामाजिक कार्यकर्ताओं का कहना है कि 2018 की भर्तियों में व्यापक स्तर पर दिव्यांगता के फर्जी प्रमाण पत्र जारी किए गए थे। एसओजी अब उन डॉक्टरों की भी सूची तैयार कर रही है जिन्होंने इन संदिग्ध प्रमाण पत्रों पर अपने हस्ताक्षर किए थे। यदि पवन दाधीच की रिपोर्ट में दिव्यांगता का प्रतिशत कम पाया जाता है, तो प्रमाण पत्र जारी करने वाले डॉक्टरों पर भी गाज गिरेगी।
कानूनी प्रक्रिया और संभावित कठोर कार्रवाई
मसूदा सीओ जय सिंह ने स्पष्ट किया है कि अस्पताल से मेडिकल रिपोर्ट मिलते ही उसे तुरंत एसओजी मुख्यालय भेजा जाएगा। यदि रिपोर्ट में दिव्यांगता के दावों में विसंगति पाई जाती है, तो पवन दाधीच के खिलाफ धोखाधड़ी का मामला दर्ज होगा। ऐसी स्थिति में न केवल उनकी नौकरी जाएगी, बल्कि उन्हें अब तक मिले वेतन की वसूली और जेल की सजा भी भुगतनी पड़ सकती है। पुलिस प्रशासन इस मामले में किसी भी तरह की ढिलाई बरतने के मूड में नहीं है और पूरी पारदर्शिता बरत रही है।
कृषि विभाग में हड़कंप और कर्मचारियों में भय
जैसे ही पवन दाधीच को पुलिस द्वारा अस्पताल ले जाने की खबर फैली, कृषि विभाग के अन्य कर्मचारियों में हड़कंप मच गया। कई कर्मचारी जो इसी तरह के कोटे से भर्ती हुए हैं, वे अब अपनी फाइलों और दस्तावेजों को दुरुस्त करने में जुट गए हैं। विभाग के उच्च अधिकारियों ने भी इस मामले पर चुप्पी साध रखी है और वे पुलिस की अंतिम रिपोर्ट का इंतजार कर रहे हैं। यह मामला राजस्थान की प्रशासनिक व्यवस्था में व्याप्त भ्रष्टाचार की जड़ों को खोदने जैसा साबित हो रहा है।
दिव्यांग कोटे का दुरुपयोग और समाज पर प्रभाव
दिव्यांगता आरक्षण का उद्देश्य समाज के वंचित और शारीरिक रूप से अक्षम लोगों को मुख्यधारा में शामिल करना है। लेकिन जब स्वस्थ लोग इस कोटे का लाभ उठाते हैं, तो यह पूरे आरक्षण तंत्र की विश्वसनीयता पर सवालिया निशान लगाता है। अजमेर का यह मामला अब राज्य स्तर पर चर्चा का विषय बन गया है और लोग कड़ी कार्रवाई की मांग कर रहे हैं। सरकार पर भी दबाव है कि वह सभी संदिग्ध नियुक्तियों की न्यायिक जांच करवाए ताकि दूध का दूध और पानी का पानी हो सके।
मेडिकल रिपोर्ट का इंतजार और अगली रणनीति
अजमेर के जेएलएन अस्पताल में पवन दाधीच का दो दिनों तक अलग-अलग चरणों में मेडिकल टेस्ट किया गया है। विशेषज्ञों ने ऑडियोमेट्री और अन्य आधुनिक मशीनों के जरिए उनके सुनने की क्षमता का सटीक डेटा एकत्र किया है।
मसूदा सीओ जय सिंह ने कहा, 'हमें एसओजी से निर्देश मिले थे, जिसके पालन में मेडिकल करवाया गया है। रिपोर्ट के आधार पर ही आगे की कानूनी कार्रवाई तय की जाएगी।'
पवन दाधीच ने उम्मीद जताई है कि सत्य की जीत होगी और उनके दस्तावेजों को सही माना जाएगा।
निष्कर्ष: भ्रष्टाचार के खिलाफ एक निर्णायक जंग
राजस्थान में सरकारी नौकरियों में पारदर्शिता लाने के लिए एसओजी की यह मुहिम अत्यंत आवश्यक और स्वागत योग्य है। फर्जी दिव्यांग सर्टिफिकेट मामले की गहराई से जांच होने पर कई बड़े नामों का खुलासा होने की पूरी संभावना है। यह देखना दिलचस्प होगा कि मेडिकल रिपोर्ट आने के बाद एसओजी इस मामले को किस दिशा में ले जाती है। न्याय की इस प्रक्रिया से न केवल दोषियों को सजा मिलेगी, बल्कि योग्य उम्मीदवारों का विश्वास भी बहाल होगा।
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