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राजस्थान

चुनाव टलने पर चुनाव आयोग का जवाब: राजस्थान चुनाव देरी पर निर्वाचन आयोग ने दी सफाई

प्रदीप बीदावत

हाईकोर्ट में अवमानना याचिका पर राज्य निर्वाचन आयोग ने दाखिल किया जवाब।

HIGHLIGHTS

  • राज्य निर्वाचन आयोग ने हाईकोर्ट में अवमानना याचिका पर अपना लिखित जवाब दाखिल कर दिया है।
  • आयोग ने कहा कि चुनाव कराने के लिए वह तैयार था, लेकिन परिसीमन और आरक्षण का काम सरकार का है।
  • ओबीसी आरक्षण के लिए ट्रिपल टेस्ट और अन्य तकनीकी कारणों से चुनाव समय पर कराना संभव नहीं था।
  • आयोग ने स्पष्ट किया कि उसने जानबूझकर अदालत के किसी आदेश की अवहेलना नहीं की है।
rajasthan election commission reply contempt petition

जयपुर | राजस्थान में स्थानीय निकायों और पंचायती राज संस्थाओं के चुनाव समय पर न होने के मामले में राज्य निर्वाचन आयोग ने हाईकोर्ट में अपना पक्ष रख दिया है। याचिकाकर्ता संयम लोढ़ा की अवमानना याचिका पर आयोग के आयुक्त और सचिव ने अलग-अलग जवाब पेश किए हैं। दोनों ने अदालत के प्रति सम्मान जताते हुए बिना शर्त माफी मांगी है। आयोग ने साफ किया कि चुनाव टालने के पीछे कोई जानबूझकर की गई कोताही या अवमानना की मंशा नहीं थी। व्यावहारिक और कानूनी दिक्कतों के कारण समय पर चुनाव कराना संभव नहीं हो पाया।

फंक्शनल इम्पॉसिबिलिटी का दिया तर्क

आयोग ने अपने जवाब में इसे व्यावहारिक असमर्थता यानी 'फंक्शनल इम्पॉसिबिलिटी' करार दिया है। आयोग का कहना है कि जब तक सरकार जरूरी डेटा नहीं देती, चुनाव कराना नामुमकिन है।

सरकार की भूमिका पर उठाए सवाल

आयोग ने स्पष्ट किया कि वह चुनाव कराने के लिए केवल एक माध्यम यानी 'कंडक्टर' की तरह काम करता है। लेकिन चुनाव का पूरा मंच यानी वार्डों का परिसीमन और आरक्षण तय करना राज्य सरकार का काम है। जब तक सरकार अंतिम रूप से आरक्षण और सीमाओं की जानकारी नहीं देती, तब तक चुनाव कार्यक्रम घोषित नहीं किया जा सकता। आयोग इस मामले में पूरी तरह सरकार की रिपोर्ट पर निर्भर रहता है।

हम चुनाव कराने के लिए पूरी तरह तैयार थे, लेकिन आवश्यक तकनीकी डेटा और आरक्षण की स्थिति साफ न होने के कारण चुनाव कार्यक्रम की घोषणा करना कानूनी रूप से असंभव था।

ओबीसी आरक्षण और ट्रिपल टेस्ट की पेंच

जवाब में कहा गया है कि एससी, एसटी, ओबीसी और महिला आरक्षण की अंतिम स्थिति सरकार से समय पर नहीं मिली। ओबीसी आरक्षण के लिए आवश्यक 'ट्रिपल टेस्ट' की जानकारी भी उपलब्ध नहीं थी। इसके अलावा राजस्थान राज्य अन्य पिछड़ा वर्ग आयोग का कार्यकाल सितंबर 2026 तक बढ़ा दिया गया था। इस वजह से 15 अप्रैल 2026 तक चुनाव कराना गणितीय और व्यावहारिक रूप से बेहद कठिन हो गया।

तैयारियां थीं पूरी, प्रक्रिया में लगता है वक्त

आयोग ने अदालत को बताया कि उसकी तरफ से तैयारियां समय पर शुरू कर दी गई थीं। आयोग ने 29 अप्रैल 2024 को ही सरकार को पत्र लिखकर चुनाव वाले निकायों की जानकारी मांगी थी। मतदाता सूची तैयार करना और उसे अंतिम रूप देना चुनाव का एक अनिवार्य हिस्सा है। ड्राफ्ट रोल प्रकाशित करने, आपत्तियां लेने और उनके निस्तारण के लिए कानूनन एक निश्चित समय देना जरूरी होता है।

जल्दबाजी से प्रभावित होती चुनाव की निष्पक्षता

अगर इस प्रक्रिया में जल्दबाजी की जाती तो हजारों मतदाता अपने अधिकार से वंचित रह जाते। इससे चुनाव की निष्पक्षता प्रभावित होती और बाद में इसे कोर्ट में चुनौती दी जा सकती थी। आयोग ने एमपी चुनाव आयोग से ईवीएम के लिए एमओयू भी किया था। लेकिन सरकार द्वारा 86 नए निकायों के परिसीमन पर रोक लगाने से पूरी तैयारी प्रभावित हो गई।

अदालती फैसलों का दिया हवाला

आयोग ने अपने बचाव में सुप्रीम कोर्ट के कई पुराने फैसलों का भी हवाला दिया है। आयोग का कहना है कि अवमानना की कार्यवाही तभी की जा सकती है जब आदेश का जानबूझकर उल्लंघन किया गया हो। इस मामले में आयोग लगातार चुनाव कराने के प्रयास कर रहा था और उसने समय बढ़ाने की याचिका भी दायर की थी। इसलिए आयोग को जिम्मेदार ठहराना वैधानिक रूप से न्यायसंगत नहीं है।

अवमानना याचिका को बताया आधारहीन

आयोग ने दलील दी कि मूल याचिका में उसे पक्षकार नहीं बनाया गया था। इसलिए सीधे तौर पर उस पर अवमानना का मामला नहीं बनता। आयोग ने समय बढ़ाने के लिए पहले ही अर्जी दे रखी है।

निष्कर्ष और आयोग की प्रार्थना

इस प्रकार, आयोग ने स्पष्ट कर दिया है कि चुनाव टलने के पीछे सरकार की ओर से मिली देरी मुख्य कारण थी। आयोग ने हाईकोर्ट से प्रार्थना की है कि अवमानना का नोटिस वापस लेकर याचिका खारिज की जाए।

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