राजस्थान का खाद घोटाला: राजस्थान खाद घोटाला: किसानों पर 'बाबू राज' का हंटर
राजस्थान में सहकारी संस्थाओं द्वारा 70% से अधिक खाद निजी डीलरों को डायवर्ट करने का खुलासा। 'बाबू राज' के इस खेल में किसान ठगे जा रहे हैं और प्रतिबंधित रसायन खरीदने को मजबूर हैं।
HIGHLIGHTS
- बीकानेर में 70.61% खाद सहकारी समितियों के बजाय निजी डीलरों को दी गई।
- इफको और कृभको का नेतृत्व गैर-कृषि पृष्ठभूमि वाले अधिकारी कर रहे हैं।
- किसानों को खाद के साथ फोरेट और पैराक्वाट डाइक्लोराइड जैसे प्रतिबंधित रसायन खरीदने के लिए मजबूर किया जा रहा है।
- घोटाले में बीकानेर की लगभग 200 डमी सोसायटियों का एक नेटवर्क शामिल है।
संबंधित खबरें
बीकानेर | सहकारिता का मूल दर्शन 'बिना लाभ-हानि' के सिद्धांत पर आधारित था, जिसका उद्देश्य ग्रामीण अर्थव्यवस्था की रीढ़, यानी किसान को मजबूती प्रदान करना था।
लेकिन आज राजस्थान के खेतों की हकीकत सहकार नहीं, बल्कि 'सहकारी स्टालिनवाद' को दर्शाती है।
इफको (IFFCO) और कृभको (KRIBHCO) जैसी संस्थाएं, जिन्हें किसानों के पसीने से सींचा गया था, अब कॉर्पोरेट लालच और प्रशासनिक निरंकुशता का केंद्र बन चुकी हैं।
यह लेख केवल खाद की कमी पर एक रिपोर्ट नहीं है, बल्कि यह उस सुनियोजित लूट का पर्दाफाश है, जहां 'बाबू राज' का हंटर सीधे अन्नदाता की पीठ पर बरस रहा है।
संबंधित खबरें
आंकड़ों का मायाजाल: टर्नओवर बनाम किसान की बदहाली
एक तरफ सहकारी संस्थाओं की बैलेंस शीट करोड़ों के मुनाफे से चमक रही है, लेकिन सवाल यह है कि क्या यह चमक किसान के घर का अंधेरा दूर कर पा रही है?
इन संस्थाओं का नेतृत्व ऐसे लोगों के हाथ में है, जिन्हें कृषि का बुनियादी ज्ञान तक नहीं है, जो एक गंभीर प्रशासनिक विडंबना को उजागर करता है।
इफको (IFFCO) और कृभको (KRIBHCO) का नेतृत्व
इफको का नेतृत्व एक राजनीतिज्ञ (दिलीप संघानी) और एक मैकेनिकल इंजीनियर (जे.के. पटेल) कर रहे हैं, जिन्हें मिट्टी विज्ञान की कोई समझ नहीं है।
वहीं, कृभको की कमान एक ITS अधिकारी (एस.एस. यादव) के हाथ में है, जो दूरसंचार विशेषज्ञ हैं और उन्हें कृषि का कोई अनुभव नहीं है।
एक मैकेनिकल इंजीनियर और एक टेलीकॉम अधिकारी को खाद वितरण की जिम्मेदारी सौंपना प्रशासनिक साठगांठ का स्पष्ट प्रमाण है।
इन्हें 'मृदा विज्ञान' या 'फसल चक्र' की बुनियादी समझ नहीं है। यही कारण है कि खाद का वितरण खेतों की जरूरत के अनुसार नहीं, बल्कि निजी डीलरों के मुनाफे को ध्यान में रखकर किया जाता है।
बीकानेर का कच्चा चिट्ठा: 70% विचलन की साजिश
बीकानेर जिला आज सहकारी भ्रष्टाचार की एक प्रयोगशाला बन चुका है। जून 2026 की एक जांच रिपोर्ट ने ऐसे आंकड़े सामने रखे हैं जो किसी भी व्यवस्था को शर्मसार कर सकते हैं।
यह जांच डिप्टी रजिस्ट्रार कैलाश चंद्र सैनी और राजफेड के उमाकांत व्यास ने की थी।
12 अप्रैल से 11 जून 2026 के बीच की हकीकत
इस अवधि के दौरान बीकानेर को कुल 1,66,964 बैग खाद प्राप्त हुई।
इसमें से सहकारी समितियों (GSS/KVSS) को मात्र 49,061 बैग (29.38%) आवंटित किए गए।
वहीं, 1,17,903 बैग (70.61%) खाद निजी डीलरों और FPO को डायवर्ट कर दिया गया।
यह 70.61% का विचलन कोई मानवीय भूल नहीं, बल्कि एक आपराधिक षड्यंत्र है। जब 70 प्रतिशत खाद निजी हाथों में चली जाएगी, तो किसान सहकारी समितियों के चक्कर काटते रहेंगे और निजी डीलर ब्लैक मार्केटिंग के जरिए उनकी जेबें खाली करेंगे।
'टैगिंग' का ब्लैकमेल: जहरीला सौदा
निजी डीलरों को खाद सौंपने का सबसे वीभत्स रूप 'टैगिंग' के ब्लैकमेल के रूप में सामने आता है।
जब किसान यूरिया या DAP खरीदने जाता है, तो उसे उन रसायनों को खरीदने के लिए मजबूर किया जाता है जो उसकी जमीन को बंजर बना रहे हैं।
प्रतिबंधित उत्पादों का आतंक
खाद के साथ फोरेट, ऑक्सीटोसिन, ह्यूमिक एसिड और पैराक्वाट डाइक्लोराइड जैसे खतरनाक रसायन जबरन बेचे जा रहे हैं।
इनमें से कई रसायन भारत में प्रतिबंधित हैं, फिर भी 'बाबू राज' की नाक के नीचे इनका कारोबार फल-फूल रहा है।
कृषि विशेषज्ञों के अनुसार, DAP का उपयोग बिजाई के समय होना चाहिए। लेकिन घोटाले के कारण खाद तब मिलती है जब फसल बड़ी हो चुकी होती है।
बिना मिट्टी परीक्षण के यूरिया और अनावश्यक सल्फर/जिंक थोपना ग्रामीण अर्थव्यवस्था के साथ एक बड़ा खिलवाड़ है।
सब्सिडी की डकैती
सरकार DAP और यूरिया पर हजारों करोड़ की सब्सिडी देती है, लेकिन इसका बड़ा हिस्सा निजी डीलरों की तिजोरियों में जा रहा है।
प्रशासनिक विफलता और 28 जुलाई की रैक का सच
सहकारिता मंत्री गौतम दक ने जांच के आदेश दिए, लेकिन क्या इससे सिस्टम में कोई बदलाव आया?
28 जुलाई 2026 को बीकानेर पहुंची नई रैक (57,290 बैग) का डेटा इस घोटाले की पुष्टि करता है।
इस बार सहकारी समितियों का हिस्सा 30% से बढ़कर 47% (20,790 बैग) हो गया। यह वृद्धि इस बात की स्वीकारोक्ति है कि पिछली बार जानबूझकर खाद की चोरी की गई थी।
हालांकि, अभी भी चूरू (3,350 बैग) और श्रीगंगानगर (6,700 बैग) जैसे जिलों के आवंटन में भारी विसंगतियां हैं और निजी नेटवर्क का दबदबा कायम है।
समाधान और कठोर मांगें
यदि राजस्थान की कृषि अर्थव्यवस्था को बचाना है, तो कुछ कठोर कदम उठाने अनिवार्य हैं।
डमी सोसायटियों का अंत जरूरी
बीकानेर में सक्रिय करीब 200 फर्जी (Dummy) समितियों की तत्काल फोरेंसिक जांच होनी चाहिए और उन्हें ब्लैकलिस्ट किया जाना चाहिए।
GSS और KVSS को आर्थिक रूप से पंगु बना दिया गया है। उनके पास खाद खरीदने के लिए पैसे नहीं हैं, जिसका फायदा निजी डीलर उठा रहे हैं। बैंक फाइनेंसिंग को तत्काल बहाल किया जाना चाहिए।
प्रतिबंधित रसायन बेचने वाले डीलरों के लाइसेंस रद्द कर उन पर आपराधिक मुकदमे दर्ज होने चाहिए। 100% सब्सिडी वाला उर्वरक केवल सहकारी तंत्र के माध्यम से ही वितरित होना चाहिए।
अंतिम निष्कर्ष: एक चेतावनी
यह 'सहकारी स्टालिनवाद' की व्यवस्था किसानों को गुलाम बना रही है। जब एयर-कंडीशंड कमरों में बैठे मैकेनिकल इंजीनियर और टेलीकॉम अफसर मिट्टी की सेहत का फैसला करेंगे, तो परिणाम खाद घोटाले जैसा ही होगा।
सरकार और प्रशासन को यह समझना होगा कि किसान का सब्र टूट रहा है। यदि इन 200 डमी सोसायटियों और निजी डीलरों के नेक्सस को नहीं तोड़ा गया, तो यह 'बाबू राज' का हंटर सत्ता के लिए भी घातक सिद्ध हो सकता है। अब समय केवल कागजी जांच का नहीं, बल्कि अपराधियों को जेल भेजने का है।