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राजस्थान

APO पर 30 दिन की लगाम: राजस्थान में अब 30 दिन से ज्यादा APO नहीं, अफसरों पर नकेल

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वित्त विभाग का सख्त फरमान, नियम तोड़ने पर अफसर होंगे जवाबदेह, कर्मचारियों का शोषण रुकेगा।

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HIGHLIGHTS

  • राजस्थान में सरकारी कर्मचारियों के लिए 'पदस्थापन की प्रतीक्षा' (APO) की अधिकतम अवधि 30 दिन तय कर दी गई है।
  • नियमों का उल्लंघन करने पर संबंधित विभाग के अधिकारियों की जवाबदेही तय की जाएगी।
  • मुख्य सचिव हर तिमाही में एपीओ के मामलों की समीक्षा करेंगे और रिपोर्ट सीएमआईएस पोर्टल पर अपलोड होगी।
  • एपीओ को अब सजा या अनुशासनात्मक कार्रवाई के विकल्प के रूप में इस्तेमाल नहीं किया जा सकेगा।
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जयपुर | राजस्थान में सरकारी कर्मचारियों को महीनों तक 'पदस्थापन की प्रतीक्षा' (APO) में रखकर नियुक्ति लटकाने का खेल अब खत्म होने जा रहा है। राज्य के वित्त विभाग ने एक सख्त फरमान जारी करते हुए एपीओ की अधिकतम अवधि 30 दिन तय कर दी है। इस कदम से अफसरों की मनमानी पर लगाम लगने की उम्मीद है।

यह नई गाइडलाइन वित्त विभाग की विशेष सचिव शिवांगी स्वर्णकार द्वारा राजस्थान सेवा नियम 1951 के नियम 25-ए के तहत जारी की गई है। सरकार का मानना है कि इस संबंध में 1981, 1984 और 2007 में जारी पुराने आदेशों का ठीक से पालन नहीं हो रहा था।

30 दिन की 'लक्ष्मण रेखा', अब नहीं चलेगी मनमानी

नए नियमों के तहत, किसी भी अधिकारी या कर्मचारी को 30 दिनों से अधिक समय तक एपीओ नहीं रखा जा सकेगा। यह एक तरह की लक्ष्मण रेखा है जिसे पार करना अब आसान नहीं होगा।

यदि किसी विशेष परिस्थिति में इस अवधि को बढ़ाने की आवश्यकता होती है, तो इसके लिए ठोस कारण बताने होंगे। विभाग को इसके लिए वित्त विभाग से अग्रिम मंजूरी लेनी होगी, जिसके साथ एक चेकलिस्ट भी संलग्न करनी होगी।

जवाबदेही होगी तय

सर्कुलर में स्पष्ट कहा गया है कि यदि 30 दिनों के भीतर पोस्टिंग के आदेश जारी नहीं किए जाते हैं, तो संबंधित विभाग के अतिरिक्त मुख्य सचिव या प्रमुख सचिव को जवाब देना होगा।

उन्हें हर महीने मुख्य सचिव और मुख्यमंत्री के प्रमुख सचिव को एक डीओ लेटर के माध्यम से रिपोर्ट देनी होगी। इस रिपोर्ट में कर्मचारी का नाम, पद और एपीओ की कुल अवधि का स्पष्ट उल्लेख करना होगा।

क्यों पड़ी इस नियम की जरूरत?

लंबे समय से यह देखा जा रहा था कि एपीओ को एक हथियार की तरह इस्तेमाल किया जा रहा था। कई मामलों में, कर्मचारियों को महीनों और कभी-कभी सालों तक बिना किसी पोस्टिंग के रखा जाता था, जिससे उनका मानसिक और आर्थिक शोषण होता था।

इसके अलावा, नियम विरुद्ध एपीओ के कई मामले हाईकोर्ट तक पहुंचे, जहां सरकार को फटकार का सामना करना पड़ा। इन सब वजहों से सरकार पर एक पारदर्शी और जवाबदेह प्रणाली बनाने का दबाव था।

शोषण और वित्तीय बोझ पर लगेगी लगाम

कर्मचारी संगठनों द्वारा लंबे समय से यह मांग की जा रही थी कि एपीओ के नाम पर होने वाले शोषण को बंद किया जाए। बिना काम के वेतन देने से राज्य के खजाने पर भी अनावश्यक वित्तीय भार पड़ रहा था।

एक कर्मचारी संगठन के प्रतिनिधि ने कहा, "यह एक स्वागत योग्य कदम है। एपीओ को अक्सर एक सजा के तौर पर इस्तेमाल किया जाता था, जिससे कर्मचारी परेशान होता था। अब इस पर रोक लगेगी और व्यवस्था में सुधार होगा।"

नई गाइडलाइन से यह सुनिश्चित होगा कि अधिकारियों को समय पर पोस्टिंग आदेश जारी करने होंगे, जिससे न केवल कर्मचारियों का शोषण रुकेगा बल्कि वित्तीय बोझ भी कम होगा।

अन्य महत्वपूर्ण प्रावधान

नए सर्कुलर में कुछ और अहम प्रावधान भी शामिल किए गए हैं ताकि पूरी प्रक्रिया को सुचारू बनाया जा सके।

छुट्टी और प्रतिनियुक्ति के लिए भी नियम

अब किसी कर्मचारी की छुट्टी मंजूर करते समय ही उसकी वापसी पर पोस्टिंग के स्थान का उल्लेख करना अनिवार्य होगा। छुट्टी समाप्त होने से पहले ही पोस्टिंग का आदेश जारी कर दिया जाएगा।

इसी तरह, प्रतिनियुक्ति या प्रशिक्षण से लौटने वाले कर्मचारियों के मामले में, उनके लौटने से 15 दिन पहले ही पोस्टिंग के आदेश जारी करने होंगे। इससे उन्हें वापस आने के बाद इंतजार नहीं करना पड़ेगा।

कुल मिलाकर, सरकार का यह कदम प्रशासनिक सुधारों की दिशा में एक महत्वपूर्ण मील का पत्थर है। इससे न केवल सरकारी खजाने पर पड़ रहा अनावश्यक बोझ कम होगा, बल्कि कर्मचारियों को भी बड़ी राहत मिलेगी और व्यवस्था में पारदर्शिता आएगी।

*Edit with Google AI Studio

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