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राजनीति

नए जिले, पुरानी कमान: राजस्थान: नए जिलों का विकास पुराने परिषदों के हाथ, जानें क्यों

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पंचायतीराज चुनाव न होने से 9 नए जिलों में जिला परिषदों का गठन अटका, विकास योजनाओं पर पड़ रहा असर।

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HIGHLIGHTS

  • राजस्थान में बनाए गए 9 नए जिलों में अब तक जिला परिषदों का गठन नहीं हो पाया है।
  • विकास योजनाओं का संचालन फिलहाल पुराने जिलों की जिला परिषदों के माध्यम से ही किया जा रहा है।
  • पंचायतीराज संस्थाओं के चुनाव में हो रही देरी को इसका मुख्य कारण माना जा रहा है।
  • भजनलाल सरकार ने पूर्ववर्ती गहलोत सरकार द्वारा बनाए गए कुछ जिलों को रद्द कर दिया था।
rajasthan new districts development stalled old zila parishad in charge

जयपुर | राजस्थान में हाल ही में बने नए जिलों के विकास की रफ्तार पर एक बड़ा सवालिया निशान लग गया है। सबसे बड़ी वजह यह है कि इन जिलों में अभी तक अपनी जिला परिषदें ही नहीं बन पाई हैं, जिसके चलते विकास की पूरी कमान पुराने जिलों के हाथों में ही सिमटी हुई है।

क्यों अटकी नए जिलों में विकास की गाड़ी?

राजस्थान में पंचायतीराज संस्थाओं के चुनाव समय पर नहीं हो पाने का सीधा और गहरा असर नवगठित जिलों के भविष्य पर पड़ा है। प्रदेश में बनाए गए 9 नए जिलों में अब तक जिला परिषदों का गठन नहीं हो सका है।

यह प्रशासनिक ढांचा किसी भी जिले के ग्रामीण विकास की रीढ़ माना जाता है। इसके अभाव में नई योजनाओं को धरातल पर उतारना और उनका सही तरीके से प्रबंधन करना एक बहुत बड़ी चुनौती बन गया है।

जब तक स्थानीय स्तर पर निर्वाचित प्रतिनिधि नहीं होंगे, तब तक इन नए जिलों के ग्रामीण क्षेत्रों की विशिष्ट जरूरतों और आकांक्षाओं को समझना और उन्हें पूरा करना लगभग असंभव है।

पंचायतीराज चुनाव में देरी का बड़ा असर

प्रशासनिक विशेषज्ञों का मानना है कि जब तक राज्य में पंचायतीराज चुनाव संपन्न नहीं हो जाते, तब तक यह अनिश्चितता की स्थिति बनी रहेगी। चुनावों के बाद ही नई जिला परिषदों, पंचायत समितियों और ग्राम पंचायतों का विधिवत गठन संभव हो पाएगा।

इस देरी के कारण न केवल विकास से जुड़े महत्वपूर्ण कार्य प्रभावित हो रहे हैं, बल्कि वित्तीय आवंटन में भी पुरानी व्यवस्था ही लागू है, जो नए जिलों की बदली हुई भौगोलिक और सामाजिक परिस्थितियों के लिए पूरी तरह से कारगर नहीं है।

पुरानी परिषदों के भरोसे चल रहीं नई योजनाएं

इस प्रशासनिक खालीपन को भरने के लिए, सरकार ने फिलहाल एक अस्थायी और वैकल्पिक व्यवस्था अपनाई है। ग्रामीण विकास एवं पंचायतीराज विभाग की सभी महत्वपूर्ण योजनाएं पुराने जिलों की जिला परिषदों के माध्यम से ही संचालित की जा रही हैं।

इसका सीधा मतलब यह है कि जो जिले भौगोलिक रूप से पूरी तरह अलग हो चुके हैं, वे प्रशासनिक और वित्तीय रूप से आज भी अपने पुराने 'मूल' जिले पर ही निर्भर रहने को मजबूर हैं। यह स्थिति विकास में असंतुलन पैदा कर सकती है।

विकसित भारत गारंटी मिशन भी पुराने ढर्रे पर

केंद्र सरकार की महत्वाकांक्षी योजना, 'विकसित भारत गारंटी फॉर रोजगार एंड आजीविका मिशन', का संचालन भी इन नए जिलों में पुरानी जिला परिषदों को ही सौंपा गया है। यह फैसला योजनाओं के प्रभावी कार्यान्वयन पर सवाल खड़े करता है।

इसी तरह, श्यामा प्रसाद मुखर्जी जिला उत्थान योजना के लिए भी यही निर्देश जारी किए गए हैं। परियोजना निदेशक ओमकारेश्वर शर्मा ने अपने निर्देशों में स्पष्ट रूप से कहा है कि:

"योजना का संचालन पूर्व की नोडल जिला परिषदों के माध्यम से ही किया जाए।"

इस आधिकारिक निर्देश से यह पूरी तरह साफ हो जाता है कि जब तक नई परिषदें अस्तित्व में नहीं आतीं, तब तक वित्तीय प्रबंधन से लेकर प्रशासनिक नियंत्रण तक, सब कुछ पुरानी व्यवस्था के तहत ही चलता रहेगा।

सरकार के फैसले और जिलों का जटिल गणित

यह जानना भी दिलचस्प है कि राजस्थान में जिलों की संख्या को लेकर पिछले एक साल में काफी बड़े बदलाव हुए हैं। पूर्ववर्ती अशोक गहलोत सरकार ने 2023 में 19 नए जिले और 3 नए संभाग घोषित किए थे, जिससे राज्य में कुल जिलों की संख्या 50 हो गई थी।

हालांकि, दिसंबर 2023 में सत्ता में आई भजनलाल शर्मा सरकार ने इस फैसले की व्यापक समीक्षा की। नई सरकार ने प्रशासनिक और वित्तीय जरूरतों का हवाला देते हुए गहलोत सरकार के बनाए कुछ जिलों के गठन को निरस्त करने का फैसला किया।

गहलोत से भजनलाल सरकार तक का सफर

भजनलाल सरकार ने एक अहम फैसले में दूदू, केकड़ी, शाहपुरा, नीम का थाना, गंगापुर सिटी, जयपुर ग्रामीण, जोधपुर ग्रामीण, अनूपगढ़ और सांचौर जैसे जिलों को रद्द कर दिया था।

वहीं, बालोतरा, ब्यावर, डीग, डीडवाना-कुचामन, कोटपूतली-बहरोड़, खैरथल-तिजारा, फलौदी और सलूंबर जैसे नए जिले अपने अस्तित्व में बने रहे। इन सभी बदलावों के बाद, राजस्थान में वर्तमान में कुल 41 जिले और 7 संभाग हैं।

अब इन नए बने जिलों के लाखों निवासियों को अपनी स्थानीय जिला परिषद का बेसब्री से इंतजार है, ताकि उनके क्षेत्र का विकास उनकी अपनी प्राथमिकताओं और स्थानीय जरूरतों के हिसाब से तेजी से हो सके।

क्या है भविष्य की राह?

अब सभी की निगाहें राज्य सरकार और राज्य चुनाव आयोग पर टिकी हुई हैं। पंचायतीराज चुनावों की घोषणा के बाद ही इन नए जिलों को उनकी असली प्रशासनिक पहचान और स्वायत्तता मिल सकेगी।

जब तक ऐसा नहीं होता, तब तक इन क्षेत्रों के विकास की गाड़ी पुराने जिलों के सहारे ही धीरे-धीरे आगे बढ़ती रहेगी, जो एक स्थायी और प्रभावी समाधान बिल्कुल नहीं है। यह स्थिति जल्द से जल्द बदलनी चाहिए।

*Edit with Google AI Studio

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