जयपुर | राजस्थान भारत का 'ऑयल कैपिटल' बनने की ओर तेजी से अग्रसर है। देश में खाद्य तेलों की बढ़ती मांग और भारी आयात के बीच राजस्थान ने अपनी उत्पादन क्षमता से सबको चौंका दिया है।
राजस्थान बनेगा 'ऑयल कैपिटल': राजस्थान बनेगा देश का 'ऑयल कैपिटल', बचेगा ₹1.61 लाख करोड़
राजस्थान अपनी जरूरत से दोगुना खाद्य तेल उत्पादन कर देश को आत्मनिर्भर बनाने की राह दिखा रहा है।
HIGHLIGHTS
- राजस्थान अपनी जरूरत से दोगुना खाद्य तेल उत्पादन कर रहा है।
- भारत हर साल खाद्य तेल आयात पर 1.61 लाख करोड़ रुपये खर्च करता है।
- पिछले 5 वर्षों में राजस्थान में सरसों उत्पादन में 150% की वृद्धि हुई।
- राज्य में 11 लाख हेक्टेयर बंजर भूमि को तिलहन के लिए उपयोग करने का सुझाव।
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खाद्य तेल आयात और अर्थव्यवस्था पर बढ़ता बोझ
भारत वर्तमान में अपनी कुल खाद्य तेल जरूरतों का लगभग 60 प्रतिशत हिस्सा विदेशों से आयात करता है। यह देश की अर्थव्यवस्था के लिए एक बड़ी चुनौती बन गया है।
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने हाल ही में देशवासियों से तेल की खपत कम करने की अपील की है। पेट्रोल-डीजल के बाद खाद्य तेल आयात पर सबसे अधिक विदेशी मुद्रा खर्च होती है।
आंकड़ों के अनुसार, भारत को हर साल खाद्य तेल खरीदने के लिए लगभग 1.61 लाख करोड़ रुपये खर्च करने पड़ते हैं। यह राशि देश के विकास कार्यों में उपयोग की जा सकती थी।
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राजस्थान की शानदार उत्पादन क्षमता
राजस्थान वर्तमान में अपनी कुल जरूरत से दोगुना खाद्य तेल उत्पादित कर रहा है। राज्य में वार्षिक तेल उत्पादन 27 लाख टन है, जबकि यहाँ की खपत केवल 14 लाख टन है।
सरसों के उत्पादन में पिछले पांच वर्षों में अभूतपूर्व वृद्धि देखी गई है। वर्ष 2020-21 में उत्पादन 25 लाख टन था, जो अब बढ़कर 60 लाख टन तक पहुँच गया है।
विशेषज्ञों का मानना है कि राजस्थान में 100 लाख टन तक सरसों उत्पादन की क्षमता है। यदि इस क्षमता का पूर्ण उपयोग हो, तो भारत की आयात निर्भरता काफी कम हो जाएगी।
तिलहन क्रांति की सख्त आवश्यकता
जैसे हरित क्रांति ने भारत को खाद्यान्न में आत्मनिर्भर बनाया, वैसे ही अब 'तिलहन क्रांति' की जरूरत है। राजस्थान इस क्रांति का नेतृत्व करने के लिए पूरी तरह तैयार नजर आ रहा है।
मस्टर्ड ऑयल प्रोड्यूसर्स एसोसिएशन के दीपक डाटा ने कहा कि यदि किसानों को सही नीतियां और आधुनिक तकनीक मिले, तो राजस्थान पूरे देश के लिए एक आदर्श मॉडल बनेगा।
सरकार ने नेशनल मिशन ऑन एडिबल ऑयल की घोषणा की है। इस मिशन के तहत तिलहन उत्पादन बढ़ाने के लिए किसानों को प्रोत्साहित करने पर विशेष ध्यान दिया जा रहा है।
उत्पादन बढ़ाने के लिए महत्वपूर्ण सुझाव
राज्य में अभी भी 11 लाख हेक्टेयर भूमि बंजर पड़ी है। विशेषज्ञों का सुझाव है कि इस भूमि को तिलहन उत्पादन के लिए किसानों को आवंटित किया जाना चाहिए।
किसानों को आधुनिक खेती का प्रशिक्षण और उन्नत बीज उपलब्ध कराना अनिवार्य है। इसके अलावा, तिलहन पर लगने वाले मंडी टैक्स और आढ़त को समाप्त करना भी जरूरी है।
वर्तमान में तिलहन पर लगभग 3.75 प्रतिशत टैक्स लगता है। यदि इसे हटाया जाता है, तो किसानों का मुनाफा बढ़ेगा और वे अधिक उत्पादन के लिए उत्साहित होंगे।
भविष्य की राह और निष्कर्ष
राजस्थान की यह सफलता अन्य राज्यों के लिए एक प्रेरणादायक उदाहरण है। आयात पर निर्भरता कम होने से न केवल विदेशी मुद्रा की बचत होगी, बल्कि ग्रामीण अर्थव्यवस्था भी मजबूत होगी।
खाद्य तेल के मामले में आत्मनिर्भर होना भारत की सुरक्षा और सेहत दोनों के लिए आवश्यक है। राजस्थान का 'ऑयल कैपिटल' बनना इस दिशा में एक मील का पत्थर साबित होगा।
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