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भारत

जनजातीय उत्थान और आधुनिक विज्ञान: उपराष्ट्रपति ने जनजातीय जीवन में विज्ञान और तकनीक के उपयोग पर दिया जोर, कहा- 'विकास और विरासत' एक दूसरे के पूरक

मानवेन्द्र जैतावत

उपराष्ट्रपति सी.पी. राधाकृष्णन ने जनजातीय समुदायों के उत्थान के लिए आधुनिक विज्ञान और पारंपरिक ज्ञान के मेल पर बल दिया। उन्होंने 'विकास भी, विरासत भी' के मंत्र को रेखांकित किया।

HIGHLIGHTS

  • उपराष्ट्रपति ने नई दिल्ली के भारत मंडपम में जनजातीय सशक्तिकरण पर आधारित विशेष सम्मेलन का उद्घाटन किया।
  • सम्मेलन का विषय 'विज्ञान और प्रौद्योगिकी के माध्यम से जनजातीय जीवन में परिवर्तन' रखा गया है।
  • भारत के लगभग 1.4 लाख जनजातीय गांवों में देश की 9 प्रतिशत आबादी निवास करती है।
  • पीएम-जनमान कार्यक्रम के तहत जनजातीय क्षेत्रों में हजारों किलोमीटर सड़कों और पुलों का निर्माण किया जा रहा है।
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नई दिल्ली | उपराष्ट्रपति श्री सी.पी. राधाकृष्णन ने आज नई दिल्ली के प्रतिष्ठित भारत मंडपम में एक महत्वपूर्ण राष्ट्रीय सम्मेलन का उद्घाटन किया।

इस सम्मेलन का मुख्य विषय "विज्ञान और प्रौद्योगिकी उपायों के माध्यम से जनजातीय जीवन में परिवर्तन - भाषा, आस्था और संस्कृति का संरक्षण" रखा गया है।

इस आयोजन का नेतृत्व विज्ञान और प्रौद्योगिकी विभाग (DST) द्वारा उत्तर पूर्वी प्रौद्योगिकी अनुप्रयोग एवं प्रसार केंद्र (NECTAR) के सहयोग से किया गया।

इसके साथ ही आईटीआईटीआई दून संस्कृति स्कूल, देहरादून ने भी इस महत्वपूर्ण चर्चा में अपनी भागीदारी सुनिश्चित की।

विज्ञान और परंपरा का अद्भुत संगम

उपराष्ट्रपति ने अपने संबोधन में कहा कि यह सम्मेलन पारंपरिक ज्ञान और आधुनिक वैज्ञानिक सोच के सुंदर समन्वय को प्रदर्शित करता है।

उन्होंने जोर देकर कहा कि जब आधुनिक विज्ञान हमारी भाषा, आस्था और संस्कृति के साथ मिलकर काम करता है, तो वह सशक्तिकरण का माध्यम बनता है।

उपराष्ट्रपति के अनुसार, विकास की प्रक्रिया में परंपराओं को पीछे छोड़ना आवश्यक नहीं है, बल्कि दोनों साथ-साथ चल सकते हैं।

जनजातीय समुदायों का राष्ट्र निर्माण में योगदान

देश के जनसांख्यिकीय ढांचे पर चर्चा करते हुए उन्होंने बताया कि भारत में लगभग 1.4 लाख जनजातीय गांव हैं।

इन गांवों में देश की कुल आबादी का लगभग 9 प्रतिशत हिस्सा रहता है, जो हमारी सांस्कृतिक विविधता का आधार हैं।

उपराष्ट्रपति ने इन समुदायों को जैव विविधता और वन संसाधनों के सतत उपयोग का वास्तविक संरक्षक बताया।

उन्होंने कहा कि सदियों से इन समुदायों ने भारत की प्राचीन आस्था और सभ्यतागत विरासत को अटूट बनाए रखा है।

हरित आर्थिक विकास की अपार संभावनाएं

जनजातीय क्षेत्रों में आर्थिक प्रगति पर बात करते हुए उन्होंने हरित विकास की संभावनाओं को रेखांकित किया।

उन्होंने जनजातीय समुदायों के अद्वितीय डिजाइन कौशल, वस्त्र निर्माण और रंग संयोजन की जमकर सराहना की।

यह कौशल न केवल कलात्मक है, बल्कि पीढ़ियों से संरक्षित एक बहुमूल्य तकनीकी विरासत भी है।

उपराष्ट्रपति ने विश्वास जताया कि तकनीक के माध्यम से इन उत्पादों को वैश्विक पहचान दिलाई जा सकती है।

विकसित भारत @ 2047 का दृष्टिकोण

प्रधानमंत्री के विजन का उल्लेख करते हुए उन्होंने कहा कि विकसित भारत @ 2047 का मूल मंत्र "विकास भी, विरासत भी" है।

उन्होंने स्पष्ट किया कि आधुनिक प्रगति और सांस्कृतिक जड़ों का संरक्षण एक-दूसरे के विरोधी नहीं बल्कि पूरक तत्व हैं।

उपराष्ट्रपति ने अपने राजनीतिक कार्यकाल को याद करते हुए छत्तीसगढ़, उत्तराखंड और झारखंड के गठन में अपने समर्थन का जिक्र किया।

उन्होंने कहा कि इन राज्यों का निर्माण जनजातीय उत्थान की दिशा में एक ऐतिहासिक कदम साबित हुआ है।

ऐतिहासिक प्रतिबद्धता और सरकारी योजनाएं

पूर्व प्रधानमंत्री श्री अटल बिहारी वाजपेयी को श्रद्धांजलि देते हुए उन्होंने जनजातीय कार्य मंत्रालय की स्थापना को एक नैतिक प्रतिबद्धता बताया।

उन्होंने भगवान बिरसा मुंडा के जन्मस्थान उलिहातु की अपनी यात्राओं का स्मरण किया और उनके योगदान को राष्ट्रीय गौरव बताया।

उपराष्ट्रपति ने प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी के प्रयासों की सराहना की, जिन्होंने जनजातीय नायकों को राष्ट्रीय चेतना में मुख्य स्थान दिया।

सरकारी पहलों का जमीनी प्रभाव

संबोधन के दौरान उन्होंने 'प्रधानमंत्री-जनमान' कार्यक्रम की उपलब्धियों पर भी विस्तार से चर्चा की।

इस योजना के तहत 7,300 किलोमीटर से अधिक लंबी सड़कों और 160 से अधिक पुलों को मंजूरी दी गई है।

इसके अलावा 'धरती आभा – जनजातीय ग्राम उत्कर्ष अभियान' के माध्यम से 63,000 गांवों में बुनियादी सुविधाएं पहुंचाई जा रही हैं।

इन सुविधाओं में स्वच्छ जल, पक्का आवास, गुणवत्तापूर्ण शिक्षा और स्वास्थ्य सेवाएं प्रमुखता से शामिल हैं।

शिक्षा और समावेशी विकास

आईटीआईटीआई दून संस्कृति स्कूल की रजत जयंती पर उन्होंने संस्थान को बधाई दी और इसकी शैक्षणिक सेवाओं की सराहना की।

उन्होंने बताया कि इस स्कूल ने उत्तराखंड, पूर्वोत्तर और लद्दाख के 2,000 से अधिक जनजातीय बच्चों को निःशुल्क शिक्षा प्रदान की है।

सम्मेलन में दिल्ली के उपराज्यपाल श्री तरणजीत सिंह संधू और अरुणाचल प्रदेश के उपमुख्यमंत्री श्री चौना मीन भी उपस्थित रहे।

विज्ञान और प्रौद्योगिकी विभाग के सचिव प्रो. अभय करंदीकर ने भी जनजातीय विकास में तकनीकी नवाचारों के महत्व पर विचार रखे।

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