Jaipur:
Same Sex marriage: समलैंगिक विवाह संबंधों को कानूनी मान्यता वाली याचिका पर SC में सुनवाई, केंद्र ने कहा फैसला सिर्फ संसद ही ले सकती है, सुप्रीम कोर्ट नहीं
केंद्र सरकार का कहना है कि समलैंगिक शादियों पर फैसला सिर्फ संसद ही ले सकती है, सुप्रीम कोर्ट नहीं। केंद्र ने ये भी कहा कि समलैंगिक विवाह एक शहरी अवधारणा है जो देश के सामाजिक लोकाचार से बहुत दूर है। समलैंगिक विवाह को मान्यता देने से पहले शहरी, ग्रामीण और अर्ध ग्रामीण सभी पहलुओं पर विचार करना होगा।
HIGHLIGHTS
- समलैंगिक विवाह एक शहरी अवधारणा है जो देश के सामाजिक लोकाचार से बहुत दूर है. समलैंगिक विवाह को मान्यता देने से पहले शहरी, ग्रामीण और अर्ध ग्रामीण सभी पहलुओं पर विचार करना होगा।
- केंद्र सरकार ने समलैंगिक विवाह का विरोध करते हुए हलफनामा दायर कर सभी याचिकाओं को खारिज करने की मांग की है।
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क्या समान सेक्स के व्यकित के विवाह को कानूनी मान्यता दी जाए या नहीं। इस पर सुप्रीम कोर्ट की 5 जजों की संवेधानिक बेंच आज सुनवाई कर रही है।
इस दौरान याचिकाकर्ता के वकील मुकुल रोहतगी ने समलैंगिक विवाह को कानूनी मान्यता देने की मांग करते हुए सुप्रीम कोर्ट को सुझाव दिया है कि अड़चनों से बचने के लिए कानून में पति और पत्नि की जगह जीवनसाथी यानी स्पाउस शब्द का इस्तेमाल किया जा सकता है।
जिससे संविधान की प्रस्तावना साथ ही अनुच्छेद 14 के मुताबिक समानता के अधिकार की भी रक्षा होती रहेगी।
वहीं सरकार की तरफ से पेश हुए सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने याचिकाओं को खारिज करने की मांग की है। केंद्र ने ये भी कहा कि समलैंगिक विवाह एक शहरी अवधारणा है जो देश के सामाजिक लोकाचार से बहुत दूर है।
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समलैंगिक विवाह को मान्यता देने से पहले शहरी, ग्रामीण और अर्ध ग्रामीण सभी पहलुओं पर विचार करना होगा।

समाज ने समलैंगिक संबंधों को दी स्वीकृति - CJI चंद्रचूड़
मामले में सीजेआई चंद्रचूड़ ने कहा कि विश्वविद्यालयों से लेकर सरकारी नौकरियों में अब तक हमारे समाज को व्यापक स्वीकृति मिल चुकी है।
हमारे विश्वविद्यालयों में अब सिर्फ शहरी बच्चे ही नहीं हैं, वे सभी क्षेत्रों से आते हैं। समाज ने समलैंगिक संबंधों को स्वीकार कर लिया है। पिछले पांच सालों में चीजें बदली हैं।
आइए जानते है क्या है पूरा मामला ?
समलैंगिक विवाह को मान्यता देने की मांग को लेकर दिल्ली हाईकोर्ट समेत देश के अलग अलग अदालतों में याचिका दायर की गई थी। इस पर बीते साल 14 दिसंबर को सुप्रीम कोर्ट ने दिल्ली हाईकोर्ट में पेंडिंग दो याचिकाओं को ट्रांसफर करने की मांग पर केंद्र से जवाब मांगा था।
25 नवंबर, 2022: दो समलैंगिक जोड़ों ने विशेष विवाह अधिनियम के तहत समलैंगिक विवाह को मान्यता देने के लिए सुप्रीम कोर्ट का रुख किया। जिसके बाद अदालत ने याचिका पर नोटिस जारी किया।
14 दिसंबर, 2022: सुप्रीम कोर्ट ने समलैंगिक जोड़े द्वारा दायर एक अन्य याचिका पर नोटिस जारी किया। एक भारतीय नागरिक और एक अमेरिकी नागरिक सहित विवाहित जोड़े ने विदेशी विवाह अधिनियम, 1969 के तहत अपनी शादी को कानूनी मान्यता मांगी।
इस साल 6 जनवरी को सुप्रीम कोर्ट ने इन सभी याचिकाओं को एक कर अपने पास ट्रांसफर कर लिया था।
हालांकि, मामले में सुनवाई से पहले केंद्र सरकार ने समलैंगिक विवाह का विरोध करते हुए हलफनामा दायर कर सभी याचिकाओं को खारिज करने की मांग की है।

सरकार की दलील
केंद्र सरकार का कहना है कि समलैंगिक शादियों पर फैसला सिर्फ संसद ही ले सकती है, सुप्रीम कोर्ट नहीं। केंद्र ने ये भी कहा कि समलैंगिक विवाह एक शहरी अवधारणा है जो देश के सामाजिक लोकाचार से बहुत दूर है।
समलैंगिक विवाह को मान्यता देने से पहले शहरी, ग्रामीण और अर्ध ग्रामीण सभी पहलुओं पर विचार करना होगा।
केंद्र सरकार की दलील है कि समलैंगिक विवाहों को कानूनी मान्यता देने से गोद लेने, तलाक, भरण-पोषण, विरासत आदि से संबंधित मुद्दों में बहुत सारी जटिलताएं पैदा होगी। इन मामलों से संबंधित सभी वैधानिक प्रावधान पुरुष और महिला के बीच विवाह पर आधारित हैं।
- केंद्र सरकार समलैंगिक विवाह की अनुमति देने के खिलाफ है। इस मामले में केंद्र ने सुप्रीम कोर्ट में हलफनामा दायर सभी याचिकाओं को खारिज करने की मांग की थी।
केंद्र ने कहा था, भले ही सुप्रीम कोर्ट ने आईपीसी की धारा 377 को डिक्रिमिनलाइज कर दिया हो, लेकिन इसका मतलब ये नहीं याचिकाकर्ता समलैंगिक विवाह के लिए मौलिक अधिकार का दावा करें।

2- याचिकाओं में क्या है मांग?
इससे पहले सुप्रीम कोर्ट ने आईपीसी की धारा 377 को डिक्रिमिनलाइज कर दिया था। यानी भारत में अब समलैंगिक संबंध अपराध नहीं हैं। लेकिन अभी भारत में समलैंगिक विवाह की अनुमति नहीं मिली है।
ऐसे में इन याचिकाओं में स्पेशल मैरिज एक्ट, फॉरेन मैरिज एक्ट समेत विवाह से जुड़े कई कानूनी प्रावधानों को चुनौती देते हुए समलैंगिकों को विवाह की अनुमति देने की मांग की गई है।
- समलैंगिकों की मांग है कि अपनी पसंद के व्यक्ति से शादी करने का अधिकार LGBTQ (लेस्बियन, गे, बायसेक्सुअल, ट्रांसजेंडर और क्वीर) समुदाय को उनके मौलिक अधिकार के हिस्से के रूप में दिया जाए।
एक याचिका में स्पेशल मैरिज एक्ट 1954 को जेंडर न्यूट्रल बनाने की मांग की गई थी, ताकि किसी व्यक्ति के साथ उसके सेक्सुअल ओरिएंटेशन की वजह से भेदभाव न किया जाए.
इन देशों में समलैंगिक विवाह को है कानूनी मान्यता
अमेरिका,ब्रिटेन,कनाडा,आस्ट्रेलिया,ब्राजील, क्यूबा, अर्जेंटीना, डेनमार्क, फिनलैंड फ्रांस, जर्मनी, माल्टा, न्यूजीलैंड, दक्षिण अफ्रीका, स्वीडन इन सभी देशों में समलैंगिक विवाह को कानूनी मान्यता मिली हुई है यही नहीं इन देशों में समलैंगिक जोड़ों को बच्चे अडोप्ट करने के भी अधिकार प्राप्त हैं।
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