जोधपुर | राजस्थान के बहुचर्चित नाबालिग यौन उत्पीड़न मामले में एक बड़ा कानूनी घटनाक्रम सामने आया है। जोधपुर स्थित राजस्थान हाईकोर्ट की मुख्यपीठ में आसाराम द्वारा दायर अपील पर लंबी बहस के बाद सुनवाई पूरी हो गई है।
न्यायालय ने अब इस मामले में अपना फैसला सुरक्षित रख लिया है। यह अपील आसाराम को मिली उम्रकैद की सजा के खिलाफ दायर की गई थी। इस मामले पर पूरे देश की निगाहें टिकी हुई हैं।
आसाराम केस: हाईकोर्ट का फैसला सुरक्षित: आसाराम की उम्रकैद को चुनौती: राजस्थान हाईकोर्ट में सुनवाई पूरी, फैसला सुरक्षित; जानिए अब तक क्या-क्या हुआ
राजस्थान हाईकोर्ट की जोधपुर मुख्यपीठ ने आसाराम की उम्रकैद की सजा के खिलाफ दायर अपील पर सुनवाई पूरी कर ली है। जस्टिस अरुण मोंगा और जस्टिस योगेंद्र कुमार पुरोहित की खंडपीठ ने दोनों पक्षों की दलीलें सुनने के बाद अपना फैसला सुरक्षित रख लिया है।
HIGHLIGHTS
- जोधपुर हाईकोर्ट में आसाराम की उम्रकैद की सजा को चुनौती देने वाली याचिका पर सुनवाई पूरी हो गई है।
- जस्टिस अरुण मोंगा और जस्टिस योगेंद्र कुमार पुरोहित की खंडपीठ ने फैसला सुरक्षित रखा है।
- साल 2018 में निचली अदालत ने आसाराम को अंतिम सांस तक उम्रकैद की सजा सुनाई थी।
- आसाराम की मेडिकल जमानत बढ़ाने वाली अर्जी पर भी कोर्ट ने शीघ्र सुनवाई से इनकार किया है।
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हाईकोर्ट में अंतिम बहस का दौर
जस्टिस अरुण मोंगा और जस्टिस योगेंद्र कुमार पुरोहित की खंडपीठ ने इस मामले की सुनवाई की। 20 अप्रैल को दोनों पक्षों की ओर से अंतिम जिरह पूरी कर ली गई।
अदालत में पिछले कई दिनों से इस मामले पर गहन चर्चा हो रही थी। आसाराम के वकीलों ने सजा को रद्द करने के लिए कई तर्क पेश किए। वहीं, अभियोजन पक्ष ने सजा को बरकरार रखने पर जोर दिया।
दोनों पक्षों की दलीलें पूरी
आसाराम के वकीलों ने 17 अप्रैल को ही अपनी मुख्य दलीलें पूरी कर ली थीं। उन्होंने ट्रायल कोर्ट के फैसले में कई कमियां गिनाने की कोशिश की थी।
इसके बाद पीड़िता के वकील पी. सी. सोलंकी ने अपनी जिरह शुरू की। सोलंकी ने अदालत के सामने पीड़िता का पक्ष मजबूती से रखा। उन्होंने ट्रायल कोर्ट के साक्ष्यों को पुख्ता बताया।
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फैसला सुरक्षित रखने का अर्थ
जब कोर्ट किसी मामले में फैसला सुरक्षित रखता है, तो इसका मतलब है कि सुनवाई पूरी हो चुकी है। अब न्यायाधीश सभी तथ्यों का बारीकी से अध्ययन करेंगे।
इसके बाद एक निश्चित तारीख पर अंतिम निर्णय सुनाया जाएगा। आसाराम के समर्थकों और विरोधियों दोनों को ही अब इस फैसले का बेसब्री से इंतजार है।
2018 का वह ऐतिहासिक फैसला
उल्लेखनीय है कि आसाराम को साल 2018 में जोधपुर की एक विशेष अदालत ने दोषी ठहराया था। तत्कालीन पीठासीन अधिकारी मधुसूदन शर्मा ने यह फैसला सुनाया था।
अदालत ने आसाराम को 'अंतिम सांस तक' उम्रकैद की सजा सुनाई थी। यह फैसला पॉक्सो (POCSO) कानून के तहत सुनाया गया था। इस फैसले ने तब काफी सुर्खियां बटोरी थीं।
क्या था पूरा मामला?
यह मामला साल 2013 का है। एक नाबालिग लड़की ने आसाराम पर यौन उत्पीड़न का आरोप लगाया था। घटना जोधपुर के मणाई गांव स्थित आश्रम की बताई गई थी।
पीड़िता उत्तर प्रदेश के शाहजहांपुर की रहने वाली थी। उसने दिल्ली के कमला मार्केट थाने में जीरो एफआईआर दर्ज कराई थी। इसके बाद केस जोधपुर ट्रांसफर हुआ था।
आसाराम की गिरफ्तारी और जेल
आरोप लगने के बाद आसाराम को अगस्त 2013 में इंदौर से गिरफ्तार किया गया था। तब से वह जोधपुर की सेंट्रल जेल में बंद है।
आसाराम ने कई बार जमानत के लिए आवेदन किया, लेकिन हर बार उसे निराशा हाथ लगी। निचली अदालत से लेकर सुप्रीम कोर्ट तक उसकी याचिकाएं खारिज होती रहीं।
सह-आरोपियों की स्थिति
2018 के फैसले में केवल आसाराम ही दोषी नहीं पाया गया था। कोर्ट ने उसके दो सहयोगियों, शिवा और शिल्पी को भी सजा सुनाई थी।
शिवा और शिल्पी को 20-20 साल की कैद की सजा मिली थी। हालांकि, इसी मामले में शरद और प्रकाश नाम के दो अन्य आरोपियों को बरी कर दिया गया था।
मेडिकल जमानत पर विवाद
हाल ही में आसाराम ने स्वास्थ्य कारणों का हवाला देते हुए जमानत मांगी थी। उसने अपनी चिकित्सीय जमानत की अवधि बढ़ाने के लिए अर्जी लगाई थी।
आसाराम के वकीलों ने कोर्ट से इस पर जल्द सुनवाई की अपील की थी। उन्होंने कहा कि वर्तमान जमानत की अवधि जल्द ही समाप्त होने वाली है।
हाईकोर्ट का सख्त रुख
हालांकि, हाईकोर्ट ने मेडिकल बेल पर शीघ्र सुनवाई से इनकार कर दिया। कोर्ट ने पूछा कि अब तक मुख्य अपील पर सुनवाई पूरी क्यों नहीं हुई थी?
जस्टिस ने स्पष्ट किया कि जमानत अर्जी में कोई ऐसी जल्दबाजी नहीं है। इस पर रजिस्ट्री द्वारा तय की गई नियमित तारीख पर ही विचार किया जाएगा।
कानूनी विशेषज्ञों की राय
कानूनी विशेषज्ञों का मानना है कि हाईकोर्ट का फैसला काफी महत्वपूर्ण होगा। यदि हाईकोर्ट ट्रायल कोर्ट के फैसले को बरकरार रखता है, तो आसाराम को जेल में ही रहना होगा।
वहीं, यदि सजा में कोई बदलाव होता है, तो यह अभियोजन पक्ष के लिए बड़ा झटका होगा। फिलहाल, सभी की नजरें हाईकोर्ट के आदेश की प्रति पर हैं।
पीड़िता के परिवार का संघर्ष
पीड़िता का परिवार पिछले 11 वर्षों से न्याय की लड़ाई लड़ रहा है। उन्हें कई बार धमकियां भी मिलीं, लेकिन वे पीछे नहीं हटे।
पीड़िता के वकील पी. सी. सोलंकी ने हमेशा कहा है कि उनके पास पर्याप्त सबूत हैं। उन्हें उम्मीद है कि हाईकोर्ट भी निचली अदालत के फैसले को सही ठहराएगा।
आसाराम के समर्थकों की उम्मीदें
आसाराम के अनुयायी अभी भी उसकी बेगुनाही का दावा करते हैं। जोधपुर हाईकोर्ट के बाहर अक्सर उनके समर्थकों की भीड़ देखी जाती है।
समर्थकों को उम्मीद है कि हाईकोर्ट से उन्हें राहत मिलेगी। हालांकि, कानून विशेषज्ञों का कहना है कि पॉक्सो मामलों में राहत मिलना काफी कठिन होता है।
जोधपुर की सुरक्षा व्यवस्था
फैसला सुरक्षित होने के बाद जोधपुर में सुरक्षा व्यवस्था को लेकर भी चर्चा है। जब भी इस केस में कोई बड़ा मोड़ आता है, शहर में अलर्ट जारी किया जाता है।
प्रशासन किसी भी अप्रिय घटना को रोकने के लिए तैयार है। 2018 में सजा के वक्त भी जोधपुर को छावनी में बदल दिया गया था।
न्यायिक प्रक्रिया का लंबा सफर
यह केस भारतीय न्याय व्यवस्था में एक मिसाल बन गया है। एक रसूखदार व्यक्ति के खिलाफ नाबालिग की लड़ाई ने सबको प्रभावित किया है।
हाईकोर्ट में अपील पर सुनवाई पूरी होना इस लंबी कानूनी लड़ाई का एक पड़ाव है। अब अंतिम निर्णय ही तय करेगा कि आसाराम का भविष्य क्या होगा।
आगे क्या होगा?
अब हाईकोर्ट की खंडपीठ अपना लिखित फैसला तैयार करेगी। इसमें हफ्तों या महीनों का समय लग सकता है।
एक बार फैसला आने के बाद, हारने वाला पक्ष सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटा सकता है। यानी कानूनी लड़ाई अभी और लंबी खिंच सकती है।
आसाराम की उम्र और स्वास्थ्य
आसाराम की उम्र अब 80 वर्ष से अधिक हो चुकी है। वह लगातार विभिन्न बीमारियों का हवाला देकर जेल से बाहर आने की कोशिश कर रहा है।
जेल प्रशासन का कहना है कि उसे जेल के अंदर ही आवश्यक चिकित्सा सुविधाएं दी जा रही हैं। कोर्ट भी इस मामले में मेडिकल रिपोर्ट्स को ही आधार मानती है।
निष्कर्ष
आसाराम केस में राजस्थान हाईकोर्ट का फैसला सुरक्षित होना एक बड़ी खबर है। यह मामला न केवल कानूनी बल्कि सामाजिक दृष्टिकोण से भी अहम है।
समाज में संतों की भूमिका और कानून के शासन को लेकर यह केस हमेशा चर्चा में रहेगा। अब बस इंतजार है उस दिन का जब हाईकोर्ट अपना फैसला सुनाएगा।
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