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भूत बंगला: अक्षय-प्रियदर्शन की फ्लॉप वापसी?: Bhooth Bangla Movie Review: अक्षय कुमार और प्रियदर्शन की जोड़ी ने किया निराश, हॉरर और कॉमेडी दोनों मोर्चों पर फेल हुई फिल्म

मानवेन्द्र जैतावत

अक्षय कुमार और प्रियदर्शन की 15 साल बाद वापसी 'भूत बंगला' के साथ हुई, लेकिन कमजोर कहानी और पुराने ढर्रे के मजाक ने दर्शकों को काफी निराश किया है।

HIGHLIGHTS

  • अक्षय कुमार और प्रियदर्शन की जोड़ी 15 साल बाद बड़े पर्दे पर साथ नजर आई है।
  • फिल्म की लंबाई 175 मिनट है, जो आज के समय के हिसाब से काफी ज्यादा और उबाऊ है।
  • 49 साल के जिशू सेनगुप्ता को 58 साल के अक्षय कुमार के पिता के रूप में कास्ट किया गया है।
  • फिल्म में हॉरर और कॉमेडी का तालमेल पूरी तरह से बिगड़ा हुआ नजर आता है।
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मुंबई | बॉलीवुड में जब भी अक्षय कुमार और प्रियदर्शन की जोड़ी का नाम लिया जाता है, तो दिमाग में 'हेरा फेरी' और 'भूल भुलैया' जैसी कल्ट क्लासिक फिल्मों की यादें ताजा हो जाती हैं। करीब 15 साल के लंबे इंतजार के बाद जब यह घोषणा हुई कि यह जादुई जोड़ी 'भूत बंगला' के साथ वापसी कर रही है, तो प्रशंसकों की उम्मीदें सातवें आसमान पर पहुंच गई थीं। हर किसी को लगा था कि इस बार भी कुछ वैसा ही धमाका होगा, लेकिन सिनेमाघरों से निकलने के बाद केवल निराशा ही हाथ लगती है।

पुराने ढर्रे की कहानी और फीका हॉरर

फिल्म की सबसे बड़ी कमजोरी इसकी कहानी और उसका ट्रीटमेंट है। 'भूत बंगला' को देखकर ऐसा लगता है जैसे हम 90 के दशक की कोई पुरानी फिल्म देख रहे हों। फिल्म का टोन इतना पुराना है कि दर्शक खुद को इससे जोड़ नहीं पाते। एकता कपूर के सह-निर्माण वाली इस फिल्म में कई बार ऐसा महसूस होता है कि शायद अगले ही पल कोई नागिन पर्दे पर आ जाएगी। फिल्म में हॉरर के नाम पर जो कुछ परोसा गया है, वह डराने के बजाय बचकाना लगता है।

फिल्म के विलेन 'वधुसुर' की बात करें, तो वह एक इंसान के आकार का चमगादड़ है। उसका मेकअप और लुक देखकर अक्षय कुमार की फिल्म 'रोबोट 2' के पक्षीराज की याद आ जाती है। फिल्म के स्पेशल इफेक्ट्स और CGI इतने कमजोर हैं कि वे आज के दौर की फिल्मों के सामने टिक नहीं पाते। जब 'स्त्री' जैसी फिल्में हॉरर-कॉमेडी के स्तर को बहुत ऊंचा ले जा चुकी हैं, ऐसे में 'भूत बंगला' का यह स्तर दर्शकों को हजम नहीं होता।

मंगलपुर का डर और अर्जुन आचार्य की एंट्री

कहानी मंगलपुर नाम के एक गांव की है, जहाँ सालों से वधुसुर नाम का एक दानव दुल्हनों का अपहरण कर रहा है। इसी बीच अर्जुन आचार्य (अक्षय कुमार) लंदन से वापस आते हैं और उन्हें अपना पुश्तैनी बंगला विरासत में मिलता है। अर्जुन अपनी बहन की शादी इसी बंगले में करने की योजना बनाते हैं, लेकिन उन्हें इस बात का पता नहीं होता कि यहाँ भूतों का बसेरा है। फिल्म की शुरुआत काफी शोर-शराबे वाली कॉमेडी से होती है, जो धीरे-धीरे सिरदर्द बन जाती है।
फिल्म में परेश रावल, राजपाल यादव और असरानी जैसे मंझे हुए कलाकार भी हैं। लेकिन अफसोस कि स्क्रिप्ट ने इन सितारों के साथ न्याय नहीं किया। कॉमेडी के नाम पर कलाकारों को केवल चीखते-चिल्लाते और शारीरिक रूप से अजीब हरकतें करते दिखाया गया है। अक्षय कुमार को एक सीन में चप्पल से पिटते हुए दिखाया गया है, जबकि परेश रावल के किरदार के साथ होने वाले भद्दे मजाक हंसाने में पूरी तरह विफल रहते हैं।

175 मिनट का लंबा और थकाऊ सफर

'भूत बंगला' की एक और बड़ी समस्या इसकी लंबाई है। 175 मिनट की यह फिल्म आज के कम अटेंशन स्पैन वाले दौर में बहुत लंबी महसूस होती है। फिल्म में फ्लैशबैक के अंदर फ्लैशबैक की तकनीक का इस्तेमाल किया गया है, जिससे कहानी इतनी उलझ जाती है कि दर्शक बोर होने लगते हैं। फिल्म के कई दृश्य बेवजह खींचे गए हैं, जिन्हें आसानी से काटा जा सकता था। बॉलीवुड की हालिया फिल्मों में लंबाई बढ़ाने का जो नया चलन चला है, यह फिल्म उसका एक बुरा उदाहरण है।
लेखन की बात करें तो प्रियदर्शन के साथ आकाश कौशिक, रोहन शंकर और अभिलाष नायर ने मिलकर इस पर काम किया है। हालांकि, फिल्म में 'स्त्री' जैसा सामाजिक संदेश देने की कोशिश की गई है, लेकिन वह पूरी तरह से फ्लैट साबित होती है। वामिका गब्बी जैसी प्रतिभाशाली अभिनेत्री को बहुत ही छोटा और महत्वहीन रोल दिया गया है। उनके किरदार की गहराई पर काम करने के बजाय मेकर्स ने केवल सतही चीजों पर ध्यान दिया है।

कास्टिंग का अजीबोगरीब गणित

फिल्म की कास्टिंग देखकर कोई भी हैरान हो सकता है। 49 साल के जिशू सेनगुप्ता को 58 साल के अक्षय कुमार के पिता के रूप में दिखाया गया है। भले ही सिनेमा में उम्र का बंधन नहीं होता, लेकिन यहाँ यह तालमेल बिल्कुल भी नहीं बैठता। जिशू के बालों को सफेद रंग से रंगकर उन्हें बूढ़ा दिखाने की कोशिश की गई है, जो काफी नकली लगती है। वहीं अक्षय से 25 साल छोटी मिथिला पालकर को उनकी बहन बनाया गया है, जिनका काम केवल एक डरी हुई दुल्हन बने रहना है।
तब्बू जैसी दिग्गज अभिनेत्री भी एक छोटे से कैमियो में नजर आती हैं, लेकिन वह भी फिल्म की डूबती नैया को पार नहीं लगा पातीं। फिल्म के संवाद और कॉमेडी का स्तर इतना गिर गया है कि एक सीन में विग को मरा हुआ कौआ समझ लिया जाता है। इस तरह के 'लो-ब्रो' कॉमेडी सीन अक्षय कुमार जैसे सुपरस्टार के स्तर को शोभा नहीं देते। फिल्म का क्लाइमेक्स भी काफी कमजोर है और एक भद्दे यौन मजाक के साथ खत्म होता है।

निष्कर्ष: क्या यह फिल्म देखने लायक है?

'भूत बंगला' के साथ अक्षय कुमार की कॉमेडी का ग्राफ नीचे गिरता हुआ नजर आ रहा है। प्रियदर्शन के साथ उनकी वापसी वैसी नहीं रही जैसी उम्मीद की गई थी। फिल्म में न तो 'भूल भुलैया' जैसा सस्पेंस है और न ही 'हेरा फेरी' जैसी टाइमलेस कॉमेडी। यह फिल्म केवल पुरानी यादों के सहारे चलने की कोशिश करती है, लेकिन नयापन न होने के कारण धड़ाम से गिर जाती है।
अगर आप अक्षय कुमार के बहुत बड़े प्रशंसक हैं और दिमाग घर पर छोड़कर फिल्म देखना चाहते हैं, तो ही सिनेमाघर जाएं। वरना, यह फिल्म आपको 2007 की 'भूल भुलैया' को दोबारा देखने के लिए मजबूर कर देगी। अक्षय कुमार को अब अपनी स्क्रिप्ट चुनने के तरीके पर गंभीरता से विचार करना होगा, क्योंकि दर्शक अब केवल बड़े नामों से संतुष्ट नहीं होने वाले। 'भूत बंगला' एक ऐसा बंगला है जिसमें जाना आपके समय की बर्बादी हो सकता है।

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