बीकानेर | राजस्थान की धरती हमेशा से ही अपनी अनूठी कला और संस्कृति के लिए जानी जाती रही है। इसी परंपरा को आगे बढ़ाते हुए बीकानेर के कला प्रेमी कृष्णचंद पुरोहित ने एक ऐसा कारनामा कर दिखाया है, जिसने पूरी दुनिया को हैरान कर दिया है। उन्होंने सुई की नोक पर दुनिया की सबसे छोटी पगड़ी बांधकर वर्ल्ड रिकॉर्ड अपने नाम किया है।
सुई पर पगड़ी, वर्ल्ड रिकॉर्ड!: सुई पर सबसे छोटी पगड़ी, बीकानेर के कृष्ण पुरोहित का वर्ल्ड रिकॉर्ड
बीकानेर के कृष्ण पुरोहित ने 55 सेकंड में सुई पर सबसे छोटी पगड़ी बांधकर वर्ल्ड रिकॉर्ड बनाया। जयपुर में सम्मानित।
HIGHLIGHTS
- 55 सेकंड में सुई पर बांधी दुनिया की सबसे छोटी पगड़ी।
- पगड़ी की परिधि मात्र 0.65 सेंटीमीटर, 15 सेमी कपड़े का उपयोग।
- जयपुर में हिंदुस्तान बुक ऑफ वर्ल्ड रिकॉर्ड्स द्वारा सम्मानित।
- बीकानेर की 'चंदा' परंपरा के संरक्षण में भी अहम योगदान।
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55 सेकंड में रचा इतिहास
जयपुर में आयोजित हिंदुस्तान बुक ऑफ वर्ल्ड रिकॉर्ड समारोह में कृष्णचंद पुरोहित को इस असाधारण उपलब्धि के लिए सम्मानित किया गया। उन्होंने यह कारनामा मात्र 55 सेकंड में पूरा किया, जो उनकी कला की सटीकता और गति को दर्शाता है।
इस विश्व रिकॉर्ड वाली पगड़ी को बनाने में केवल 15 सेंटीमीटर कपड़े का इस्तेमाल हुआ। जिस सुई पर इसे बांधा गया, उसकी लंबाई 5 सेंटीमीटर थी। तैयार होने के बाद पगड़ी की परिधि मात्र 0.65 सेंटीमीटर मापी गई।
यह सूक्ष्म कलाकारी इतनी बारीक और अविश्वसनीय है कि इसे देखने वाले दंग रह गए। समारोह में मौजूद विशेषज्ञों ने इसे एक अद्वितीय उपलब्धि बताया और पुरोहित की कला की जमकर सराहना की।
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पेंसिल पर भी दिखाते हैं कमाल
सुई पर पगड़ी बांधने के अलावा, कृष्णचंद पुरोहित पेंसिल की नोक पर भी पगड़ी बांधने की कला में माहिर हैं। उनकी यह कला भी लोगों के बीच काफी लोकप्रिय है और आकर्षण का केंद्र बनती है।
उनकी कला सिर्फ एक रिकॉर्ड तक सीमित नहीं है, बल्कि यह राजस्थान की गौरवशाली पगड़ी परंपरा का एक जीवंत प्रदर्शन है। उन्होंने इस पारंपरिक कला को एक नया और आधुनिक रूप दिया है।
कला और परंपरा के संरक्षक
कृष्णचंद पुरोहित को सिर्फ उनकी सूक्ष्म कला के लिए ही नहीं, बल्कि बीकानेर की ऐतिहासिक सौहार्द परंपरा ‘चंदा’ के संरक्षण में उनके योगदान के लिए भी सम्मानित किया गया।
‘चंदा’ बीकानेर की लगभग 500 साल पुरानी एक अनूठी परंपरा है, जो सामाजिक समरसता का प्रतीक है। पुरोहित इस परंपरा को जीवित रखने के लिए लगातार प्रयास कर रहे हैं।
वक्ताओं ने कहा, "कृष्णचंद पुरोहित ने अपनी कला के माध्यम से बीकानेर की साफा-पगड़ी परंपरा को राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर नई पहचान दिलाई है। लोक परंपराओं को जीवित रखने के उनके प्रयास आने वाली पीढ़ियों के लिए प्रेरणास्रोत हैं।"
जब वह यह सम्मान लेकर बीकानेर लौटे, तो विभिन्न सामाजिक और सांस्कृतिक संस्थाओं ने उनका भव्य अभिनंदन किया। लोगों ने उनकी इस उपलब्धि को बीकानेर का गौरव बताया।
वैश्विक मंच पर राजस्थानी संस्कृति
कृष्णचंद पुरोहित की यह सफलता सिर्फ एक व्यक्तिगत उपलब्धि नहीं है, बल्कि यह राजस्थानी कला और संस्कृति के लिए भी एक गौरवपूर्ण क्षण है।
उनके इस रिकॉर्ड ने पारंपरिक राजस्थानी कला को वैश्विक मंच पर एक नई पहचान दिलाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। यह दिखाता है कि भारत की लोक कलाओं में कितनी गहराई और विविधता है।
यह उपलब्धि युवा कलाकारों को भी अपनी जड़ों से जुड़ने और पारंपरिक कलाओं को नए अंदाज में दुनिया के सामने पेश करने के लिए प्रेरित करेगी।
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