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राजस्थान

सरूप क्लब पर बड़ा खुलासा!: सरकारी जमीन पर सरूप क्लब? पट्टा, पंजीयन नदारद

गणपत सिंह मांडोली

सिरोही में सरूप क्लब के संचालन पर बड़ा खुलासा। क्लब के पास सरकारी जमीन का पट्टा, पंजीयन और आबकारी लाइसेंस नहीं होने का आरोप। प्रशासन से जांच की मांग।

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HIGHLIGHTS

  • सिरोही के सरूप क्लब पर सरकारी जमीन पर अवैध रूप से संचालित होने का आरोप।
  • क्लब के पास भूमि का पट्टा, पंजीयन और आबकारी लाइसेंस नहीं होने का खुलासा।
  • खसरा नंबर 416 की गैर-बिलानाम सरकारी भूमि पर निर्माण को लेकर उठे सवाल।
  • अधिवक्ता मुकेश रावल ने जिला कलेक्टर से जांच कर FIR दर्ज करने की मांग की है।
sirohi sarup club on government land without lease registration investigation demanded

सिरोही | सिरोही स्थित सरूप विला क्लब के संचालन को लेकर अब कई गंभीर सवाल उठ खड़े हुए हैं, जिससे पूरे प्रशासनिक महकमे में हलचल मच गई है।

एक क्लब सूचना ने ही वर्षों से चल रही व्यवस्था की पोल खोलकर रख दी है, जिसके बाद अब मामले की निष्पक्ष जांच की मांग जोर पकड़ रही है।

क्लब की सूचना ने ही खोली पोल

मामले का खुलासा क्लब की 11 अगस्त 2026 की एक सूचना से हुआ।

इस सूचना में कथित तौर पर यह स्पष्ट किया गया है कि क्लब के पास भूमि का कोई वैध पट्टा मौजूद नहीं है।

इतना ही नहीं, क्लब का सहकारिता विभाग में पंजीयन और आबकारी विभाग से क्लब-बार चलाने के लिए आवश्यक लाइसेंस या पंजीयन भी उपलब्ध नहीं है।

सबसे बड़ा सवाल: कैसे चलता रहा क्लब?

इस खुलासे के बाद सबसे बड़ा और सीधा सवाल यह है कि यदि भूमि पर क्लब का कोई वैध अधिकार नहीं था और न ही क्लब का कोई वैधानिक पंजीयन था, तो यह वर्षों से किस कानूनी अधिकार के तहत संचालित हो रहा था?

सरकारी भूमि पर निर्माण किसकी अनुमति से?

यह पूरा मामला खसरा नंबर 416 की गैर-बिलानाम सरकारी भूमि से जुड़ा बताया जा रहा है।

अब यह सवाल भी उठ रहा है कि अगर इस सरकारी भूमि पर निर्माण के लिए कोई वैध स्वीकृति या अनुमति नहीं थी, तो क्लब भवन का निर्माण किसकी अनुमति से किया गया?

साथ ही, बिना किसी कानूनी आधार के वर्षों तक वहां गतिविधियां कैसे संचालित होती रहीं?

जनहित में जांच की मांग

इस मामले के सामने आने के बाद अब जनहित में प्रशासन से पूरे प्रकरण की निष्पक्ष जांच की मांग की जा रही है।

मांगों में भूमि के स्वामित्व और राजस्व रिकॉर्ड की जांच, निर्माण की स्वीकृति का आधार, क्लब के पंजीयन की स्थिति, आबकारी विभाग की अनुमति, सदस्यता शुल्क का प्रबंधन और क्लब के सभी वित्तीय लेन-देन की जांच शामिल है।

जिला कलेक्टर से कार्रवाई की मांग

अधिवक्ता मुकेश रावल ने इस मामले में जिला कलेक्टर से हस्तक्षेप की मांग की है।

उन्होंने कहा कि सरकारी भूमि पर हुए इस कथित अवैध निर्माण को केवल नियमन या किसी औपचारिक प्रक्रिया के जरिए वैध करने का प्रयास नहीं किया जाना चाहिए।

उन्होंने मांग की कि पहले पूरे मामले की गहन कानूनी जांच हो।

FIR दर्ज करने की मांग

अधिवक्ता रावल ने यह भी मांग की है कि क्लब की वर्तमान कार्यकारिणी और अन्य जिम्मेदार व्यक्तियों की भूमिका की भी जांच की जाए।

उन्होंने कहा कि यदि जांच में प्रथम दृष्टया कोई अपराध बनता है, तो तुरंत FIR दर्ज कर कानून के अनुसार सख्त कार्रवाई की जानी चाहिए।

"सरकारी भूमि और कानून किसी संस्था या व्यक्ति की निजी संपत्ति नहीं हैं। वर्षों से कोई व्यवस्था चलती आ रही हो, मात्र इससे वह कानूनसम्मत साबित नहीं हो जाती। 11 अगस्त की क्लब सूचना से स्पष्ट है कि भूमि के पट्टे, क्लब पंजीयन और आबकारी अनुमति को लेकर गंभीर सवाल हैं। खसरा नंबर 416 की गैर-बिलानाम सरकारी भूमि पर निर्माण और वर्षों से क्लब संचालन किस अनुमति से हुआ, इसकी निष्पक्ष जांच होनी चाहिए। जिला प्रशासन भूमि, निर्माण, पंजीयन और वित्तीय गतिविधियों की जांच कर दोषी पाए जाने पर वर्तमान कार्यकारिणी एवं जिम्मेदार व्यक्तियों के विरुद्ध FIR दर्ज कर कार्रवाई करे। सरकारी भूमि पर अवैध कब्जे और बिना पंजीयन संचालन को केवल वर्षों पुरानी व्यवस्था के आधार पर वैध नहीं माना जा सकता।"

— मुकेश रावल, अधिवक्ता

प्रशासन के सामने चार बड़े सवाल

इस पूरे प्रकरण के बाद अब जिला प्रशासन के सामने चार मुख्य सवाल खड़े हो गए हैं, जिनका जवाब जनता जानना चाहती है:

  • खसरा नंबर 416 की भूमि पर क्लब भवन का निर्माण किस अधिकारी की अनुमति से हुआ?
  • यदि क्लब का कोई वैध पंजीयन ही नहीं था, तो यह वर्षों तक कैसे संचालित होता रहा?
  • क्लब-बार के संचालन के लिए आबकारी विभाग से आवश्यक लाइसेंस या अनुमति ली गई थी या नहीं?
  • सदस्यता शुल्क और अन्य आर्थिक गतिविधियों का लेखा-जोखा किस वैधानिक व्यवस्था के तहत रखा जा रहा था?

जनता पूछ रही है—कानून लागू होगा या व्यवस्था?

सरूप क्लब का यह प्रकरण अब केवल एक संस्था के संचालन तक सीमित नहीं रह गया है।

यह मामला अब सरकारी भूमि पर कब्जे, अवैध निर्माण, संस्थागत पंजीयन की अनदेखी और प्रशासनिक जवाबदेही से जुड़ा एक बड़ा जनहित का सवाल बन चुका है।

अब सभी की निगाहें जिला प्रशासन पर टिकी हैं कि वह इस पूरे मामले की निष्पक्ष जांच कर सच्चाई को जनता के सामने लाता है, या फिर वर्षों से चली आ रही इस 'व्यवस्था' को ही कानून का आधार मानकर मामले को रफा-दफा कर दिया जाएगा।

जनहित में सवाल सीधा और स्पष्ट है—जब सरकारी भूमि पर वैध अधिकार नहीं, पंजीयन नहीं और आवश्यक अनुमति भी नहीं, तो आखिर यह क्लब चला कैसे?

*Edit with Google AI Studio

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