बीकानेर | सूरतगढ़ की एक अदालत ने महिला से कथित दुराचार और अभद्रता के मामले में एक पूर्व थानाधिकारी के खिलाफ सख्त रुख अपनाया है। अतिरिक्त मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट (एसीजेएम) मनमोहन चंदेल ने सिटी थाने के तत्कालीन थानाधिकारी दिनेश सारण के खिलाफ 24 घंटे के भीतर प्राथमिकी (एफआईआर) दर्ज करने का आदेश जारी किया है।
महिला से अभद्रता, SHO पर FIR: पूर्व थानाधिकारी पर 24 घंटे में FIR के आदेश, महिला से दुराचार का आरोप
सूरतगढ़ कोर्ट का बड़ा फैसला, महिला से अभद्रता और दुराचार के मामले में पूर्व थानाधिकारी दिनेश सारण के खिलाफ 24 घंटे में FIR दर्ज करने का आदेश दिया।
HIGHLIGHTS
- सूरतगढ़ कोर्ट ने पूर्व थानाधिकारी दिनेश सारण के खिलाफ 24 घंटे में FIR दर्ज करने का आदेश दिया है।
- थानाधिकारी पर महिला से दुराचार, अभद्र व्यवहार और सार्वजनिक अपमान के गंभीर आरोप लगे हैं।
- मामले की जांच सूरतगढ़ वृत्त से बाहर के किसी अन्य आरपीएस अधिकारी को सौंपने के निर्देश दिए गए हैं।
- अदालत ने पीड़िता के बयानों पर हुए हस्ताक्षरों की FSL जांच का भी आदेश दिया है।
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न्यायालय का सख्त रुख, 24 घंटे में FIR के निर्देश
अदालत ने अपने आदेश में स्पष्ट किया है कि मामले की गंभीरता को देखते हुए तत्काल कार्रवाई आवश्यक है। न्यायालय ने न केवल एफआईआर दर्ज करने का आदेश दिया, बल्कि यह भी सुनिश्चित करने का निर्देश दिया कि जांच निष्पक्ष हो।
इसके तहत, मामले की जांच सूरतगढ़ वृत्त से बाहर के किसी अन्य आरपीएस अधिकारी से कराने के लिए कहा गया है। यह कदम जांच की निष्पक्षता सुनिश्चित करने के लिए उठाया गया है।
क्या है पूरा मामला?
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यह मामला 27 अक्टूबर 2025 की एक घटना से जुड़ा है। परिवाद के अनुसार, एक महिला संगठन की जिलाध्यक्ष ने अधिवक्ता विष्णु शर्मा के माध्यम से अदालत में शिकायत दर्ज कराई थी।
शिकायत में आरोप लगाया गया कि श्रीगंगानगर स्थापना दिवस के अवसर पर श्री हनुमानजी खेजड़ी मंदिर परिसर में एक सांस्कृतिक कार्यक्रम आयोजित किया गया था।
पीड़िता के अनुसार, जब वह कार्यक्रम स्थल पर पहुंचीं तो तत्कालीन थानाधिकारी दिनेश सारण ने उन्हें प्रवेश करने से रोका। आरोप है कि इस दौरान उनके साथ धक्का-मुक्की की गई और अभद्र भाषा का इस्तेमाल किया गया, जिससे वह सार्वजनिक रूप से अपमानित हुईं।
पुलिस जांच पर उठे गंभीर सवाल
परिवाद में यह भी बताया गया कि घटना के बाद शिकायत करने के बावजूद पुलिस ने एफआईआर दर्ज नहीं की। आरोप है कि मामले को दबाने का प्रयास किया गया, जिसके बाद पीड़िता को अदालत का दरवाजा खटखटाना पड़ा।
अदालत ने मामले में पुलिस द्वारा प्रस्तुत जांच रिपोर्ट को प्रथम दृष्टया असंतोषजनक पाया। पुलिस ने अपनी रिपोर्ट में महिला के बिना वीआईपी पास के कार्यक्रम में प्रवेश करने की कोशिश को आधार बनाया था।
हालांकि, सूचना के अधिकार (आरटीआई) के तहत पर्यटन विभाग से मिली जानकारी ने पुलिस के दावे को खारिज कर दिया। आरटीआई से पता चला कि उस कार्यक्रम के लिए कोई वीआईपी पास जारी ही नहीं किए गए थे। अदालत ने इसे एक गंभीर विरोधाभास माना और जांच की निष्पक्षता पर सवाल उठाए।
बयानों और हस्ताक्षर पर भी संदेह
मामले में महिला कांस्टेबलों के बयानों, आरोपी अधिकारी के स्पष्टीकरण और जांच रिपोर्ट में भी कई विसंगतियां पाई गईं।
पीड़िता ने एक और गंभीर आरोप लगाते हुए कहा कि जांच के दौरान उसके नाम से जो बयान दर्ज किए गए, उन पर किए गए हस्ताक्षर उसके नहीं हैं। इस पर संज्ञान लेते हुए अदालत ने हस्ताक्षरों की फोरेंसिक साइंस लेबोरेटरी (एफएसएल) जांच कराने के भी निर्देश दिए हैं।
अदालत की तीखी टिप्पणी
न्यायालय ने अपने आदेश में महिला सुरक्षा को लेकर पुलिस के रवैये पर तीखी टिप्पणी की। अदालत ने कहा कि उपलब्ध रिकॉर्ड से महिला संबंधी संज्ञेय अपराध के प्रथम दृष्टया आवश्यक तत्व सामने आते हैं और ऐसे मामलों में एफआईआर दर्ज करना पुलिस का कानूनी दायित्व है।
अदालत ने कहा, "यदि महिला अपराधों के मामलों में भी पुलिस एफआईआर दर्ज करने से इंकार या टालमटोल करती है तो महिला सुरक्षा केवल सरकारी पोस्टरों तक सीमित रह जाएगी।"
न्यायालय ने यह भी कहा कि पीड़िता को न्याय के लिए अदालत की शरण लेनी पड़े, यह कानून का नहीं बल्कि शासन की इच्छाशक्ति का संकट है।
जांच के लिए विशेष निर्देश
एसीजेएम ने जिला पुलिस अधीक्षक को निर्देश दिए हैं कि मामले की जांच किसी अन्य आरपीएस अधिकारी को सौंपी जाए।
साथ ही, संबंधित पुलिस अधिकारियों से यह भी पूछा जाए कि महिला संबंधी संज्ञेय अपराध में एफआईआर दर्ज नहीं करने पर उनके खिलाफ कार्रवाई क्यों नहीं की जानी चाहिए। अदालत ने पुलिस महानिदेशक के निर्देशों का पालन न होने पर भी गहरा खेद व्यक्त किया।
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