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राजस्थान

बहन-बेटियों ने रोपे 150 पौधे: कोलाडूंगरी में बाईसा-भुवासा स्नेह मिलन समारोह का भावुक समापन

बलजीत सिंह शेखावत
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emotional conclusion to the baisa bhuvasa get together in koladungri

मकराना । ग्राम कोलाडूंगरी में राजपूत समाज द्वारा आयोजित तीन दिवसीय बाइसा-भुवासा स्नेह मिलन समारोह का गुरुवार को भावुक वातावरण में समापन हुआ। समारोह ने सामाजिक एकता, पारिवारिक अपनत्व और पर्यावरण संरक्षण का अनूठा संदेश दिया। समापन दिवस पर वर्षों बाद मायके पहुंची बहन-बेटियों ने गांव की धरती पर 150 से अधिक पौधे लगाकर रिश्तों की यादों को हरियाली की सौगात दी।

राजस्थान साकार एवं राजस्थान पत्रिका के ‘हरियालो राजस्थान’ अभियान से प्रेरित होकर आयोजित पौधारोपण कार्यक्रम में बड़ी संख्या में महिलाओं ने भाग लिया। सरकारी विद्यालय के निकट आयोजित कार्यक्रम में बहन-बेटियों ने पौधे रोपने के साथ उनके संरक्षण का भी संकल्प लिया।

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‘बहन-बेटी वाटिका’ बनेगी भावनात्मक जुड़ाव का प्रतीक

आयोजन समिति के अनुसार जिस स्थान पर पौधारोपण किया गया है, उसे ‘बहन-बेटी वाटिका’ नाम दिया गया है। यह वाटिका आने वाले वर्षों में गांव और उसकी बेटियों के भावनात्मक जुड़ाव तथा पर्यावरण संरक्षण का प्रतीक बनेगी।

वन मंत्री ने की पहल की सराहना

राजस्थान के वन एवं पर्यावरण मंत्री Sanjay Sharma ने इस अभिनव पहल की सराहना की। उन्होंने अपने सोशल मीडिया अकाउंट पर कार्यक्रम की जानकारी साझा करते हुए ‘एक पौधा बहन-बेटी के नाम’ अभियान को समाज और पर्यावरण के लिए प्रेरणादायी बताया। मंत्री ने कहा कि ऐसी पहलें पर्यावरण संरक्षण में आमजन की भागीदारी बढ़ाने के साथ सामाजिक मूल्यों को भी मजबूत करती हैं।

भाइयों ने लिया पौधों की देखभाल का संकल्प

कार्यक्रम की सबसे विशेष बात यह रही कि पौधे बहन-बेटियों द्वारा लगाए गए, जबकि उनकी देखभाल की जिम्मेदारी गांव के भाइयों और भतीजों ने अपने ऊपर ली। उन्होंने संकल्प लिया कि इन पौधों को उसी स्नेह और जिम्मेदारी से संरक्षित करेंगे, जैसे परिवार के रिश्तों को संजोकर रखा जाता है।

नम आंखों के साथ हुई विदाई

समारोह के दौरान महिलाओं ने वर्षों बाद गांव में एकत्र होकर बिताए गए पलों को अविस्मरणीय बताया। उनका कहना था कि इन पौधों के माध्यम से बचपन की यादें और मायके से जुड़ाव हमेशा जीवित रहेगा। समापन अवसर पर एकादशी के उपलक्ष्य में पुष्कर, खुड़ सहित विभिन्न धार्मिक स्थलों की यात्राएं भी आयोजित की गईं, जिससे कार्यक्रम में आध्यात्मिक और पारिवारिक रंग भी जुड़ गया।

समारोह के अंत में कई महिलाओं की आंखें नम दिखाई दीं। उन्होंने भावुक होकर कहा कि ऐसा महसूस हुआ जैसे बचपन फिर लौट आया हो और वर्षों की दूरियां कुछ ही दिनों में मिट गई हों।

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