नई दिल्ली | जलवायु परिवर्तन वैश्विक कृषि परिदृश्य के लिए एक गंभीर चुनौती बनकर उभरा है। इससे निपटने और भारतीय किसानों की आय सुरक्षित रखने के लिए केंद्र सरकार ने एक व्यापक रणनीति तैयार की है।
भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद (आईसीएआर) के माध्यम से सरकार 'जलवायु परिवर्तन के अनुकूल कृषि में राष्ट्रीय नवाचार' (एनआईसीआरए) परियोजना को प्रभावी ढंग से लागू कर रही है। इस परियोजना का मुख्य उद्देश्य खेती पर जलवायु परिवर्तन के प्रभावों का बारीकी से अध्ययन करना है।
जलवायु परिवर्तन से किसानों का बचाव: जलवायु परिवर्तन से किसानों को बचाने के लिए सरकार का मास्टर प्लान: 310 जिले संवेदनशील घोषित, 2900 नई फसल किस्में जारी
भारत सरकार जलवायु परिवर्तन की चुनौतियों से निपटने के लिए एनआईसीआरए परियोजना के तहत 651 जिलों का आकलन कर रही है, जिसमें 310 जिलों को संवेदनशील माना गया है। किसानों को आर्थिक सुरक्षा देने के लिए अब तक 1.92 लाख करोड़ रुपये का फसल बीमा भुगतान किया गया है।
HIGHLIGHTS
- एनआईसीआरए परियोजना के तहत 651 जिलों में से 310 को जलवायु परिवर्तन के प्रति संवेदनशील घोषित किया गया है।
- भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद (ICAR) ने 2014-2024 के बीच 2,900 नई फसल किस्में विकसित की हैं।
- प्रधानमंत्री फसल बीमा योजना के तहत अब तक किसानों को 1.92 लाख करोड़ रुपये के दावों का भुगतान हुआ है।
- देश के 151 जिलों में 448 मॉडल जलवायु-सहनशील गांवों का विकास किया जा रहा है।
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जिलों की संवेदनशीलता का आकलन
एनआईसीआरए के तहत आईपीसीसी के प्रोटोकॉल का पालन करते हुए देश के 651 कृषि जिलों का गहन मूल्यांकन किया गया है। इस अध्ययन में पाया गया कि 310 जिले जलवायु परिवर्तन के प्रति अत्यधिक संवेदनशील हैं।
इनमें से 109 जिलों को 'अत्यंत उच्च' और 201 जिलों को 'उच्च' संवेदनशीलता की श्रेणी में रखा गया है। इन सभी जिलों के लिए 'जिला कृषि आकस्मिक योजनाएं' (डीएसीपी) विकसित की गई हैं, जो प्रतिकूल मौसम में किसानों का मार्गदर्शन करती हैं।
मॉडल जलवायु-सहनशील गांव
किसानों की अनुकूलन क्षमता बढ़ाने के लिए 151 संवेदनशील जिलों में 448 मॉडल जलवायु-सहनशील गांव स्थापित किए गए हैं। इन गांवों में कृषि विज्ञान केंद्रों (केवीके) के माध्यम से स्थान-विशिष्ट तकनीकों का प्रदर्शन किया जा रहा है।
इन गांवों में धान की सघनता प्रणाली, वायुजनित धान की खेती और सीधी बुवाई जैसी आधुनिक पद्धतियों को बढ़ावा दिया जा रहा है। इससे सूखा और अत्यधिक गर्मी जैसी विषम परिस्थितियों में भी फसल उत्पादन सुनिश्चित हो पाता है।
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नई फसल किस्मों का विकास
आईसीएआर ने पिछले एक दशक (2014-2024) में कृषि क्षेत्र में क्रांतिकारी कदम उठाते हुए 2,900 फसल किस्में जारी की हैं। इनमें से 2,661 किस्में विशेष रूप से जैविक और अजैविक दबावों को सहने के लिए विकसित की गई हैं।
इन किस्मों में सूखा, बाढ़ और कीटों के प्रति सहनशीलता अधिक है। एनआईसीआरए गांवों में गेहूं, सोयाबीन, सरसों, चना, ज्वार और बाजरा की ऐसी किस्मों का सफल प्रदर्शन किया गया है, जो बदलती जलवायु में भी बेहतर उपज देती हैं।
सिंचाई और मृदा स्वास्थ्य पर जोर
कृषि मंत्रालय 'प्रति बूंद अधिक फसल' योजना के माध्यम से सूक्ष्म सिंचाई को बढ़ावा दे रहा है। ड्रिप और स्प्रिंकलर सिंचाई प्रणालियों के उपयोग से पानी की बर्बादी कम हो रही है और जल उपयोग दक्षता में सुधार हुआ है।
मृदा स्वास्थ्य एवं उर्वरता योजना के तहत किसानों को उर्वरकों के संतुलित उपयोग के लिए प्रेरित किया जा रहा है। इसके साथ ही प्राकृतिक और जैविक खेती के लिए 'परंपरागत कृषि विकास योजना' और 'राष्ट्रीय प्राकृतिक कृषि मिशन' जैसे कार्यक्रम चलाए जा रहे हैं।
फसल बीमा से आर्थिक सुरक्षा
प्रधानमंत्री फसल बीमा योजना (पीएमएफबीवाई) किसानों के लिए एक बड़े सुरक्षा कवच के रूप में उभरी है। यह योजना प्राकृतिक आपदाओं के कारण फसल खराब होने पर किसानों को वित्तीय सहायता प्रदान करती है।
वर्ष 2016 से दिसंबर 2025 तक इस योजना के तहत किसानों को कुल 1.92 लाख करोड़ रुपये के दावों का भुगतान किया जा चुका है। यह राशि सीधे किसानों के खातों में पहुंचाई गई है, जिससे उन्हें आर्थिक स्थिरता मिली है।
प्रशिक्षण और क्षमता निर्माण
ग्रामीण स्तर पर बीज बैंक और सामुदायिक नर्सरी की स्थापना की जा रही है ताकि किसानों को समय पर उन्नत बीज मिल सकें। कृषि प्रौद्योगिकी प्रबंधन एजेंसी (एटीएमए) के माध्यम से किसानों को लगातार आधुनिक कृषि पद्धतियों का प्रशिक्षण दिया जा रहा है।
लघु और सीमांत किसानों को विशेष रूप से तकनीकी सहायता प्रदान की जा रही है। राज्यसभा में एक लिखित प्रश्न के उत्तर में कृषि राज्य मंत्री श्री रामनाथ ठाकुर ने बताया कि सरकार का लक्ष्य हर किसान को जलवायु परिवर्तन के प्रति सक्षम बनाना है।
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