कच्छ | भारत के वन्यजीव संरक्षण प्रयासों में एक ऐतिहासिक अध्याय जुड़ गया है। गुजरात के कच्छ जिले में एक दशक के लंबे अंतराल के बाद लुप्तप्राय ग्रेट इंडियन बस्टर्ड (गोडावन) के चूजे का सफल जन्म हुआ है। केंद्रीय पर्यावरण, वन और जलवायु परिवर्तन मंत्री श्री भूपेंद्र यादव ने इस गौरवपूर्ण उपलब्धि की घोषणा की।
गुजरात में गोडावन का नया सवेरा: गुजरात के कच्छ में एक दशक बाद गूँजी गोडावन की किलकारी, राजस्थान से लाए गए अंडे से हुआ सफल जन्म
गुजरात के कच्छ में एक दशक के लंबे इंतजार के बाद ग्रेट इंडियन बस्टर्ड (गोडावन) के चूजे का जन्म हुआ है। यह सफलता राजस्थान और गुजरात के बीच एक ऐतिहासिक अंतर-राज्यीय संरक्षण पहल और 'जंपस्टार्ट अप्रोच' के कारण संभव हुई है।
HIGHLIGHTS
- गुजरात के कच्छ में एक दशक बाद लुप्तप्राय ग्रेट इंडियन बस्टर्ड (गोडावन) के चूजे का सफल जन्म हुआ।
- राजस्थान के जैसलमेर से गुजरात के कच्छ तक 770 किलोमीटर का सफर तय कर सुरक्षित लाया गया था अंडा।
- देश में जीआईबी संरक्षण के लिए यह अपनी तरह की पहली सफल अंतर-राज्यीय पहल (Jumpstart Approach) है।
- वर्तमान में राजस्थान के संरक्षण प्रजनन केंद्रों में गोडावन पक्षियों की कुल संख्या बढ़कर 73 हो गई है।
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770 किलोमीटर का साहसिक मिशन
यह सफलता 'जंपस्टार्ट अप्रोच' नामक एक अभिनव संरक्षण तकनीक के माध्यम से संभव हुई है। इस योजना का समन्वय पर्यावरण मंत्रालय (MoEFCC), राजस्थान और गुजरात के वन विभागों तथा भारतीय वन्यजीव संस्थान (WII) द्वारा संयुक्त रूप से किया गया। इस चूजे के जन्म के पीछे वैज्ञानिकों और वन अधिकारियों की कड़ी मेहनत और एक लंबी यात्रा की कहानी छिपी है। राजस्थान के जैसलमेर से गुजरात के कच्छ (नालिया) तक एक अंडे को सुरक्षित पहुँचाने के लिए 770 किलोमीटर का सफर तय किया गया। यह यात्रा किसी चुनौती से कम नहीं थी। एक पोर्टेबल इनक्यूबेटर में रखे गए अंडे को सड़क मार्ग से लाया गया। अंडे की गुणवत्ता और तापमान बनाए रखने के लिए 19 घंटे तक बिना रुके एक विशेष ग्रीन कॉरिडोर बनाकर वाहन चलाया गया।
कच्छ में गोडावन का अस्तित्व संकट
गुजरात का कच्छ क्षेत्र कभी गोडावन का प्रमुख आवास हुआ करता था। लेकिन समय के साथ यहाँ इनकी संख्या घटती गई। वर्तमान में कच्छ के घास के मैदानों में केवल तीन मादा गोडावन ही शेष बची हैं। सबसे बड़ी समस्या यह थी कि यहाँ काफी समय से कोई नर गोडावन नहीं देखा गया था। नर पक्षी न होने के कारण मादाओं द्वारा दिए गए अंडे बांझ (Infertile) रह जाते थे, जिससे नई पीढ़ी का जन्म असंभव हो गया था। अगस्त 2025 में एक टैग की गई मादा गोडावन ने कच्छ में एक बांझ अंडा दिया। इसी समय विशेषज्ञों ने 'जंपस्टार्ट अप्रोच' अपनाने का फैसला किया। इसके तहत राजस्थान के प्रजनन केंद्र से एक उपजाऊ अंडा लाने की योजना बनी।
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प्रकृति और विज्ञान का अद्भुत मिलन
22 मार्च को राजस्थान के बंदी-प्रजनित कार्यक्रम से प्राप्त एक उपजाऊ अंडे को कच्छ लाया गया। इस अंडे को सावधानीपूर्वक उसी घोंसले में रखा गया जहाँ मादा ने अपना बांझ अंडा दिया था। मादा गोडावन ने उस नए अंडे को तुरंत स्वीकार कर लिया। उसने एक 'पालक माँ' की भूमिका निभाते हुए अंडे को सेने की प्रक्रिया शुरू की। वैज्ञानिकों की टीम दूर से इस पूरी प्रक्रिया पर नजर रख रही थी। 26 मार्च को वह सुखद पल आया जब अंडे से चूजा बाहर निकला। क्षेत्रीय निगरानी दल ने पुष्टि की है कि चूजा पूरी तरह स्वस्थ है और मादा पक्षी उसका प्राकृतिक रूप से पालन-पोषण कर रही है।
प्रोजेक्ट जीआईबी: भविष्य की राह
मंत्री भूपेंद्र यादव ने बताया कि प्रोजेक्ट जीआईबी का सपना प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने 2011 में देखा था। इसे औपचारिक रूप से 2016 में शुरू किया गया था। तब से यह प्रजाति के पुनरुद्धार के लिए काम कर रहा है। राजस्थान के सैम और रामदेवरा स्थित संरक्षण प्रजनन केंद्रों में अब पक्षियों की कुल संख्या 73 तक पहुँच गई है। इस साल के प्रजनन सत्र में ही पाँच नए चूजों का जन्म हुआ है, जो एक बड़ी उपलब्धि है। भारत सरकार अब इन पक्षियों को उनके प्राकृतिक आवासों में वापस छोड़ने की दिशा में तेजी से काम कर रही है। दीर्घकालिक योजना के तहत जंगली आबादी को मजबूत करने के लिए और भी चूजों को जंगल में छोड़ा जाएगा। भूपेंद्र यादव ने इस मिशन में शामिल सभी वैज्ञानिकों और अधिकारियों को बधाई दी। उन्होंने कहा कि यह प्रयास वन्यजीव संरक्षण के प्रति भारत की दृढ़ इच्छाशक्ति और तकनीकी क्षमता को प्रदर्शित करता है। ग्रेट इंडियन बस्टर्ड घास के मैदानों के पारिस्थितिकी तंत्र का एक महत्वपूर्ण हिस्सा हैं। इनका अस्तित्व स्वस्थ पर्यावरण का प्रतीक माना जाता है। सरकार लुप्तप्राय प्रजातियों की रक्षा के लिए हर संभव कदम उठाने को तैयार है। आने वाले वर्षों में कच्छ और राजस्थान के अन्य क्षेत्रों में गोडावन की संख्या में भारी वृद्धि की उम्मीद की जा रही है। यह सफलता साबित करती है कि अगर सही नीति और तकनीक का उपयोग किया जाए, तो विलुप्ति की कगार पर खड़ी प्रजातियों को भी बचाया जा सकता है।
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