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भारत

टेक्सटाइल रीसाइक्लिंग पर भारत का जवाब: भारत का टेक्सटाइल रीसाइक्लिंग मॉडल: वैश्विक रिपोर्टों पर करारा जवाब

मानवेन्द्र जैतावत

भारत ने अंतरराष्ट्रीय मीडिया की भ्रामक रिपोर्टों को खारिज करते हुए अपनी सशक्त रीसाइक्लिंग क्षमता दिखाई।

HIGHLIGHTS

  • भारत में सालाना लगभग 7,073 किलो टन कपड़ा कचरा उत्पन्न होता है, जिसमें से प्री-कंज्यूमर वेस्ट का 97% हिस्सा रीसायकल किया जाता है।
  • भारतीय रीसाइक्लिंग उद्योग मुख्य रूप से घरेलू कचरे (90% से अधिक) पर निर्भर है, जबकि आयातित कचरा कुल मात्रा का केवल 7% है।
  • आईआईटी दिल्ली के अध्ययन के अनुसार, भारत की रीसाइक्लिंग गतिविधियां ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जन को 30-40% तक कम करने में मदद करती हैं।
  • भारत का टेक्सटाइल रीसाइक्लिंग इकोसिस्टम सालाना 22,000 करोड़ रुपये का आर्थिक मूल्य पैदा करता है और लाखों लोगों को रोजगार देता है।
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नई दिल्ली | भारत सरकार के कपड़ा मंत्रालय ने हाल ही में अंतरराष्ट्रीय मीडिया में भारतीय टेक्सटाइल रीसाइक्लिंग उद्योग को लेकर प्रकाशित भ्रामक और नकारात्मक रिपोर्टों का कड़ा खंडन किया है।

मंत्रालय ने स्पष्ट किया कि भारत का रीसाइक्लिंग तंत्र विश्व के सबसे बड़े और सबसे व्यवस्थित नेटवर्क में से एक है, जो दशकों से सर्कुलर इकोनॉमी को बढ़ावा दे रहा है।

भ्रामक अंतरराष्ट्रीय नैरेटिव का खंडन

हालिया अंतरराष्ट्रीय मीडिया रिपोर्टों में पानीपत जैसे कपड़ा केंद्रों में रीसाइक्लिंग गतिविधियों को लेकर पर्यावरण और श्रमिक सुरक्षा संबंधी चिंताएं उठाई गई थीं। सरकार ने इन्हें चयनात्मक और पक्षपाती करार दिया है।

मंत्रालय के अनुसार, किसी भी बड़े औद्योगिक पारिस्थितिकी तंत्र में अनुपालन न करने की छिटपुट घटनाएं हो सकती हैं, लेकिन पूरे क्षेत्र को लापरवाह बताना पूरी तरह गलत है।

भारत में कपड़ा रिकवरी और रीसाइक्लिंग का एक लंबा इतिहास रहा है, जिसे मरम्मत और पुन: उपयोग की पारंपरिक संस्कृति का मजबूत समर्थन प्राप्त है।

डेटा से स्पष्ट होती भारत की स्थिति

मंत्रालय द्वारा जारी 'मैपिंग ऑफ टेक्सटाइल वेस्ट वैल्यू चेन इन इंडिया' 2026 की रिपोर्ट के अनुसार, देश सालाना 7,073 किलो टन कपड़ा कचरा उत्पन्न करता है।

इस कचरे में औद्योगिक और घरेलू दोनों धाराएं शामिल हैं। सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि विनिर्माण के दौरान निकलने वाले प्री-कंज्यूमर कचरे का 97% हिस्सा रीसायकल हो जाता है।

डंपिंग ग्राउंड के दावों की सच्चाई

विदेशी मीडिया अक्सर भारत को पश्चिमी देशों के कचरे का 'डंपिंग ग्राउंड' बताता है। हालांकि, सरकारी आंकड़े इस दावे की हवा निकाल देते हैं।

भारत में प्रबंधित होने वाले कुल कपड़ा कचरे का 90% से अधिक हिस्सा घरेलू स्रोतों से आता है। इसमें कारखानों का स्क्रैप और पुराने घरेलू कपड़े शामिल हैं।

आयातित कचरा कुल मात्रा का केवल 7% है। इसे 'खतरनाक और अन्य अपशिष्ट नियम 2016' के तहत बहुत ही सख्त तरीके से विनियमित किया जाता है।

आर्थिक प्रभाव और मूल्य सृजन

फिक्की (FICCI) की रिपोर्ट के अनुसार, भारत का कपड़ा कचरा इकोसिस्टम सालाना लगभग 22,000 करोड़ रुपये का आर्थिक मूल्य पैदा कर रहा है।

यह क्षेत्र न केवल कचरा प्रबंधन करता है, बल्कि लाखों लोगों की आजीविका का मुख्य आधार भी है। यहाँ कचरे को मूल्यवान कच्चे माल में बदला जाता है।

पर्यावरणीय लाभ: आईआईटी दिल्ली का शोध

आईआईटी दिल्ली के शोधकर्ताओं द्वारा पानीपत क्लस्टर में किए गए लाइफ साइकल असेसमेंट (LCA) अध्ययन ने इस उद्योग के पर्यावरणीय लाभों को वैज्ञानिक रूप से सिद्ध किया है।

"टेक्सटाइल रीसाइक्लिंग से ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जन और एसिड रेन की संभावना में 30-40% की कमी आती है, जो वर्जिन फाइबर उत्पादन के मुकाबले बहुत बेहतर है।"

यह शोध 'जर्नल ऑफ क्लीनर प्रोडक्शन' में प्रकाशित हुआ है। यह स्पष्ट करता है कि भारत की रीसाइक्लिंग इकाइयां वास्तव में ग्लोबल वार्मिंग को कम करने में मदद कर रही हैं।

प्रमुख औद्योगिक क्लस्टर्स की भूमिका

भारत में रीसाइक्लिंग केवल बिखरी हुई इकाइयां नहीं हैं, बल्कि पानीपत, तिरुपुर, लुधियाना और सूरत जैसे शहरों में विकसित पूर्ण औद्योगिक तंत्र हैं।

पानीपत को अक्सर 'दुनिया की कास्ट-ऑफ राजधानी' कहा जाता है। यह शहर ऊनी और मिश्रित कपड़ों के कचरे को प्रोसेस करने में वैश्विक नेतृत्व प्रदान करता है।

तिरुपुर का अनुकरणीय मॉडल

तमिलनाडु का तिरुपुर क्लस्टर अपने 'जीरो लिक्विड डिस्चार्ज' (ZLD) सिस्टम के लिए पूरी दुनिया में प्रसिद्ध है। यहाँ रंगाई इकाइयों में पानी का शत-प्रतिशत पुनर्चक्रण होता है।

यह मॉडल साबित करता है कि भारत बड़े पैमाने पर उच्च पर्यावरणीय मानकों को लागू करने में सक्षम है। यहाँ की इकाइयां सौर ऊर्जा का भी व्यापक उपयोग कर रही हैं।

नियामक ढांचा और श्रमिक कल्याण

भारत में रीसाइक्लिंग इकाइयां जल अधिनियम 1974 और वायु अधिनियम 1981 के तहत कड़ाई से विनियमित हैं। राज्य प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड इनकी निरंतर निगरानी करते हैं।

नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल (NGT) की सक्रियता सुनिश्चित करती है कि नियमों का उल्लंघन करने वाली इकाइयों पर सख्त कार्रवाई की जाए। यह भारत के सक्रिय संस्थागत ढांचे को दर्शाता है।

नए श्रम कोड और सुरक्षा मानक

श्रमिकों की सुरक्षा के लिए 'ऑक्यूपेशनल सेफ्टी, हेल्थ एंड वर्किंग कंडीशंस कोड 2020' लागू किया गया है। यह कार्यस्थल पर स्वास्थ्य और सुरक्षा मानकों को अनिवार्य बनाता है।

सामाजिक सुरक्षा कोड 2020 और वेतन कोड 2019 के माध्यम से श्रमिकों के हितों की रक्षा की जा रही है। सरकार असंगठित क्षेत्र को औपचारिक बनाने के लिए प्रतिबद्ध है।

तकनीकी नवाचार और भविष्य

भारत अब पारंपरिक मैकेनिकल रीसाइक्लिंग से आगे बढ़कर अत्याधुनिक केमिकल रीसाइक्लिंग की ओर कदम बढ़ा रहा है। यह तकनीक फाइबर को आणविक स्तर पर रिकवर करती है।

कई निर्यात-उन्मुख इकाइयों ने धूल निष्कर्षण प्रणाली और उन्नत कचरा उपचार संयंत्रों में निवेश किया है। इससे न केवल गुणवत्ता सुधरी है, बल्कि कार्य वातावरण भी बेहतर हुआ है।

तकनीकी वस्त्रों की रीसाइक्लिंग में नेतृत्व

भारत अब रक्षा और एयरोस्पेस क्षेत्र में उपयोग होने वाले उच्च-मूल्य वाले तकनीकी वस्त्रों की रीसाइक्लिंग में भी अपनी क्षमता बढ़ा रहा है।

आईआईटी दिल्ली द्वारा पानीपत में स्थापित 'अटल सेंटर ऑफ टेक्सटाइल रीसाइक्लिंग' (ACTRS) ने अरामिड फाइबर को रीसायकल करने की दुनिया की पहली तकनीक विकसित की है।

राष्ट्रीय तकनीकी वस्त्र मिशन (NTTM) के तहत कंपोजिट और जियोसिंथेटिक्स जैसे जटिल सामग्रियों की रीसाइक्लिंग पर शोध कार्य तेजी से चल रहा है।

निष्कर्ष: सतत विकास का भारतीय संकल्प

निष्कर्षतः, भारत का कपड़ा रीसाइक्लिंग क्षेत्र वैश्विक स्थिरता लक्ष्यों को प्राप्त करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहा है। मीडिया की नकारात्मक रिपोर्टें वास्तविकता से कोसों दूर हैं।

सरकार इस क्षेत्र को और अधिक आधुनिक, पारदर्शी और पर्यावरण के अनुकूल बनाने के लिए लगातार काम कर रही है। भारत वैश्विक circular economy में एक रोल मॉडल बनने की राह पर है।

*Edit with Google AI Studio

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