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भारत

भारत की मौसम निगरानी शक्ति: जलवायु परिवर्तन और आपदा प्रबंधन: भारत की मौसम निगरानी प्रणालियों और अंतरराष्ट्रीय सहयोग पर डॉ. जितेंद्र सिंह ने लोकसभा में दी जानकारी

मानवेन्द्र जैतावत

पृथ्वी विज्ञान मंत्रालय ने लोकसभा में भारत की उन्नत मौसम पूर्वानुमान प्रणालियों, सुपरकंप्यूटर 'अर्का' और 'अरुनिका' तथा अंतरराष्ट्रीय सहयोगों के बारे में विस्तृत जानकारी साझा की है।

HIGHLIGHTS

  • भारत ने मौसम पूर्वानुमान के लिए 'अर्का' और 'अरुनिका' जैसे शक्तिशाली सुपरकंप्यूटर स्थापित किए हैं।
  • IMD अब 150 शहरों के लिए विशेष शहरी मौसम विज्ञान सेवाएं और रियल-टाइम तापमान निगरानी प्रदान कर रहा है।
  • 23 राज्यों में लू से निपटने के लिए 'हीट एक्शन प्लान' (HAP) को सफलतापूर्वक लागू किया गया है।
  • भारत का पहला अर्थ सिस्टम मॉडल (IITM-ESM) भविष्य के जलवायु जोखिमों का सटीक आकलन कर रहा है।
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नई दिल्ली | पृथ्वी विज्ञान और विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी राज्य मंत्री (स्वतंत्र प्रभार) डॉ. जितेंद्र सिंह ने 1 अप्रैल 2026 को लोकसभा में भारत की बढ़ती मौसम निगरानी क्षमताओं पर एक विस्तृत रिपोर्ट पेश की।

मौसम निगरानी और जिलावार विश्लेषण

भारत मौसम विज्ञान विभाग (IMD) ने देश भर में वर्षा की परिवर्तनशीलता और रुझानों का जिलावार विश्लेषण किया है। यह डेटा सूखा और बाढ़ के जोखिम का आकलन करने के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण साबित हो रहा है।

IMD चक्रवात, लू, शीत लहर और भारी वर्षा जैसी प्रतिकूल घटनाओं के लिए प्रभाव-आधारित पूर्वानुमान जारी करता है। इससे स्थानीय प्रशासन को त्वरित निकासी और राहत कार्य करने में बड़ी मदद मिलती है।

विभाग ने मानसून की परिवर्तनशीलता और अत्यधिक वर्षा की घटनाओं के विश्लेषण में महत्वपूर्ण योगदान दिया है। यह जानकारी राष्ट्रीय और राज्य आपदा प्रतिक्रिया एजेंसियों को समय पर उपलब्ध कराई जाती है।

सुपरकंप्यूटिंग और तकनीकी शक्ति

मंत्रालय ने पुणे में 'अर्का' और नोएडा में 'अरुनिका' नामक अत्याधुनिक हाई-परफॉर्मेंस कंप्यूटिंग (HPC) सिस्टम स्थापित किए हैं। ये सुपरकंप्यूटर उच्च-रिज़ॉल्यूशन जलवायु मॉडलिंग में सहायक हैं।

इन प्रणालियों की मदद से मौसम का दीर्घकालिक पूर्वानुमान अधिक सटीक हो गया है। 'अर्का' और 'अरुनिका' भारत की भविष्य की मौसम संबंधी चुनौतियों से निपटने की तैयारी का आधार हैं।

IMD अब बहु-मॉडल समूह तकनीकों का उपयोग करके मौसमी और मासिक पूर्वानुमान प्रदान करता है। इसमें मानसून मिशन युग्मित पूर्वानुमान प्रणाली (MMCFS) जैसे उन्नत मॉडल शामिल हैं।

अंतरराष्ट्रीय सहयोग और वैश्विक भूमिका

भारत विश्व मौसम विज्ञान संगठन (WMO) का एक सक्रिय सदस्य है। नई दिल्ली स्थित क्षेत्रीय विशिष्ट मौसम विज्ञान केंद्र (RSMC) पूरे उत्तरी हिंद महासागर क्षेत्र को चक्रवात परामर्श प्रदान करता है।

IMD को अब WMO द्वारा दीर्घकालिक पूर्वानुमानों के लिए वैश्विक उत्पादक केंद्र (GPC) का दर्जा प्राप्त हुआ है। यह वैश्विक मौसम विज्ञान के क्षेत्र में भारत की बढ़ती साख को दर्शाता है।

दक्षिण एशियाई जलवायु आउटलुक फोरम (SASCOF) के माध्यम से भारत अपने पड़ोसी देशों की जलवायु संबंधी आवश्यकताओं को पूरा कर रहा है। इसमें हिमालयी क्षेत्र के लिए 'तीसरा ध्रुव जलवायु पूर्वानुमान मंच' भी शामिल है।

भारत ब्रिटेन के UKMO, अमेरिका के कोलोराडो विश्वविद्यालय और कोलंबिया विश्वविद्यालय जैसे संस्थानों के साथ मिलकर काम कर रहा है। ये सहयोग मौसम संबंधी आंकड़ों और उपग्रह प्रेक्षणों के आदान-प्रदान में मदद करते हैं।

शहरी मौसम विज्ञान और लू प्रबंधन

महानगरों में 'अर्बन हीट आइलैंड' प्रभाव की निगरानी के लिए विशेष प्रणालियां लगाई गई हैं। वर्तमान में 150 शहरों के लिए विशेष मौसम सेवाएं और 47 शहरों के लिए वायु गुणवत्ता पूर्वानुमान उपलब्ध हैं।

देश के 23 राज्यों में 'हीट एक्शन प्लान' (HAP) लागू किए गए हैं। इनमें वृक्षारोपण और कूल रूफिंग जैसी तकनीकों के उपयोग पर जोर दिया गया है ताकि शहरों के बढ़ते तापमान को कम किया जा सके।

IMD अब जिला स्तर पर लू की चेतावनी और प्रभाव-आधारित पूर्वानुमान जारी करता है। इसमें स्वास्थ्य और कृषि क्षेत्रों के लिए विशेष बुलेटिन शामिल हैं, जो ऑनलाइन और ऑफलाइन दोनों माध्यमों से उपलब्ध हैं।

भविष्य की योजनाएं: मिशन मौसम

'मिशन मौसम' और राष्ट्रीय जलवायु सेवा ढांचा (NFCS) के तहत AI और मशीन लर्निंग (ML) का उपयोग बढ़ाया जा रहा है। यह तकनीक अत्यधिक वर्षा और समुद्र के स्तर में वृद्धि के सटीक आकलन में मदद करेगी।

भारत का पहला अर्थ सिस्टम मॉडल (IITM-ESM) भविष्य के जलवायु मार्गों के लिए अनुमान प्रदान कर रहा है। यह मॉडल भारत को जलवायु अनुकूलन और आपदा तैयारियों में विश्व स्तर पर अग्रणी बनाने में सहायक होगा।

सरकार के ये प्रयास विश्व मौसम विज्ञान संगठन की 'सभी के लिए प्रारंभिक चेतावनी' पहल के अनुरूप हैं। इससे न केवल भारत बल्कि पूरे दक्षिण एशियाई क्षेत्र में आपदा प्रबंधन की क्षमताएं मजबूत होंगी।

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