रेवदर | अर्बुदारण्य की पावन धरा पर स्थित श्री गोधाम महातीर्थ पथमेड़ा की ओर से नंदगांव में आयोजित ‘श्री सुरभि हरिहर चातुर्मास आराधना महोत्सव’ इन दिनों श्रद्धा, भक्ति और आध्यात्मिक ऊर्जा का केंद्र बना हुआ है।
ओंकार और आत्मतत्त्व का ज्ञान: ओंकार और आत्मतत्त्व का ज्ञान ही वेदान्त का परम संदेश: जगद्गुरु
नंदगांव में आयोजित चातुर्मास महोत्सव में जगद्गुरु सदानन्द सरस्वती ने माण्डूक्योपनिषद् पर प्रवचन देते हुए ओंकार और आत्मतत्त्व के ज्ञान को वेदान्त का परम संदेश बताया।
HIGHLIGHTS
- नंदगांव में चातुर्मास महोत्सव के दौरान जगद्गुरु सदानन्द सरस्वती का माण्डूक्योपनिषद् पर प्रवचन।
- ओंकार और आत्मतत्त्व के ज्ञान को वेदान्त का परम संदेश बताया गया।
- आत्मा को जाग्रत, स्वप्न और सुषुप्ति, तीनों अवस्थाओं का साक्षी बताया।
- मनुष्य देह का उपयोग आत्मस्वरूप के ज्ञान और ब्रह्मज्ञान की प्राप्ति के लिए करने का संदेश दिया।
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परम श्रद्धेय गोऋषि स्वामी श्री दत्तशरणानंदजी महाराजश्री की पावन प्रेरणा से आयोजित इस महोत्सव के अंतर्गत प्रतिदिन धर्माचार्य मण्डपम् स्थित सत्संग मण्डप में धर्मसभा का आयोजन किया जा रहा है।
माण्डूक्योपनिषद् पर गहन विवेचन
धर्मसभा को संबोधित करते हुए परमपूज्य जगद्गुरु शंकराचार्य स्वामी श्री सदानन्द सरस्वती जी महाराज ने माण्डूक्योपनिषद् एवं गौड़पादाचार्य की कारिकाओं का गहन विवेचन किया।
उन्होंने अपने प्रवचन में ओंकार, महावाक्य और आत्मस्वरूप की एकता को विस्तार से समझाया।
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ओंकार और महावाक्य एक ही सत्य की ओर ले जाते हैं
जगद्गुरु ने कहा कि महाप्रलय के समय सम्पूर्ण नाम-रूपात्मक जगत का लय हो जाता है, लेकिन सृष्टि का बीजरूप प्रणव ‘ॐ’ नित्य और अविनाशी रहता है।
उन्होंने बताया कि इसी प्रणव के आधार पर पुनः सृष्टि का प्रादुर्भाव होता है। वेदान्त के महावाक्यों के माध्यम से जीव और ब्रह्म के वास्तविक स्वरूप का ज्ञान कराया जाता है।
पूज्याचार्य ने वाच्यार्थ एवं लक्ष्यार्थ को सरल भाषा में समझाते हुए कहा कि उपाधियों से जुड़े वाच्यार्थ का त्याग कर उपाधिरहित शुद्ध चैतन्यरूप लक्ष्यार्थ को समझना ही आत्मज्ञान का वास्तविक मार्ग है।
उन्होंने कहा कि ओंकार की अकार, उकार और मकार मात्राओं के माध्यम से भी उसी परम चैतन्य का बोध कराया गया है।
इसी प्रकार ‘तत्त्वमसि’, ‘अहं ब्रह्मास्मि’, ‘प्रज्ञानं ब्रह्म’ और ‘अयमात्मा ब्रह्म’ जैसे महावाक्य भी एक ही अद्वितीय ब्रह्मतत्त्व का प्रतिपादन करते हैं।
जगद्गुरु ने स्पष्ट किया कि ओंकार और महावाक्य अलग नहीं, बल्कि एक ही परम सत्य को समझाने के दो माध्यम हैं।
तीनों अवस्थाओं का साक्षी है आत्मा
जाग्रत, स्वप्न और सुषुप्ति अवस्थाओं का विवेचन करते हुए जगद्गुरु ने कहा कि अवस्थाएं बदलती रहती हैं, लेकिन इन सभी के पीछे रहने वाला आत्मा सदैव एक, शुद्ध, असंग और अविकार रहता है।
उन्होंने महामत्स्य दृष्टान्त के माध्यम से समझाया कि जिस प्रकार बलवान मत्स्य नदी के दोनों तटों के बीच स्वतंत्र रूप से विचरण करता है, उसी प्रकार आत्मा जाग्रत, स्वप्न और सुषुप्ति तीनों अवस्थाओं का साक्षी होकर भी उनसे पूर्णतः असंग रहता है।
तुरीय आत्मस्वरूप ही वेदान्त का परम लक्ष्य
प्रवचन में बताया गया कि माण्डूक्योपनिषद् के प्रथम तीन पाद क्रमशः विश्व, तेजस और प्राज्ञ का निरूपण करते हैं।
वहीं, चतुर्थ पाद उपाधिरहित, शुद्ध और अद्वैत आत्मस्वरूप का प्रतिपादन करता है। यही तुरीय आत्मस्वरूप वेदान्त का परम लक्ष्य है।
गौड़पादाचार्य की कारिकाओं में इसी गूढ़ तत्त्व का विस्तारपूर्वक विवेचन किया गया है।
मानव जीवन की महत्ता
जगद्गुरु ने मानव जीवन की महत्ता बताते हुए कहा कि चौरासी लाख योनियों में मानव शरीर अत्यंत दुर्लभ है।
एक ही परम चैतन्य नाम और रूप के भेद से अनेक जीवों के रूप में दिखाई देता है, लेकिन वास्तविकता में वह एकमेव अद्वितीय ब्रह्म ही है।
इसलिए मनुष्य को इस दुर्लभ मानव देह का उपयोग आत्मस्वरूप के ज्ञान और ब्रह्मज्ञान की प्राप्ति के लिए करना चाहिए।
प्रवचन के अंत में जगद्गुरु श्रीचरणों ने श्रद्धालुओं को वेदान्त-विचार, गुरु एवं शास्त्र के आश्रय तथा आत्मचिन्तन के माध्यम से परोक्ष ज्ञान को अपरोक्षानुभूति में परिणत करने का संदेश दिया।
हजारों गोभक्त रहे उपस्थित
इस धर्मसभा में ऋषिचैतन्यजी महाराज, कथा मनोरथी घेवरचंदजी, सुरेशजी सुपुत्र बगदारामजी राजपुरोहित बिलड, रघुनाथसिंह राजपुरोहित, धनराज चौधरी, अन्नपूर्णा मनोरथी धुखसिंह केसरसिंह राजपुरोहित सांकरणा, कृष्णकांत सेवदा, बलवंतराज अणखोल, सीईओ आलोक सिंहल, गजेंद्र राजपुरोहित, बिहारीलाल बसंत, जबराराम वाटेरा, श्रीराम हिंडवाडा, देवाराम डिगारी सहित बड़ी संख्या में संत-महात्मा एवं हजारों गोभक्त उपस्थित रहे।
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