thinQ360
thinQ360
🏠 टॉप 🔥 राजनीति 📍 राज्य 📰 लाइफ स्टाइल 🏏 खेल 🎬 मनोरंजन 📰 जालोर 👤 शख्सियत 💻 तकनीक ✍️ Blog ⭐ सफलता की कहानी 🚨 क्राइम 📰 मनचाही ▶️ YouTube
राज्य

जयपुर: 250 साल पुरानी नृसिंह लीला में 140 किलो के स्वरूप

बलजीत सिंह शेखावत

जयपुर में 250 साल पुरानी नृसिंह लीला का मंचन, 140 किलो वजन उठाकर कलाकारों ने दिखाई भक्ति।

HIGHLIGHTS

  • जयपुर के ताड़केश्वर मंदिर में 250 वर्षों से नृसिंह लीला का आयोजन हो रहा है।
  • नृसिंह और वराह स्वरूपों का कुल वजन लगभग 140 किलो तक होता है।
  • भीषण गर्मी के बीच व्यास परिवार के सदस्य इन भारी मुखौटों के साथ नृत्य करते हैं।
  • मान्यता है कि नृसिंह अवतार की जटा बच्चों को बुरी नजर से बचाती है।
jaipur narsingh leela tradition 140kg masks vaishakh chaturdashi

जयपुर | राजस्थान की राजधानी जयपुर में आस्था और साहस का एक अनूठा संगम देखने को मिला है। ताड़केश्वर महादेव मंदिर के सामने सदियों पुरानी नृसिंह और वराह लीला का भव्य मंचन किया गया।

यह आयोजन न केवल धार्मिक आस्था का प्रतीक है, बल्कि इसमें शामिल होने वाले कलाकारों के शारीरिक बल और सहनशक्ति का भी कड़ा इम्तिहान होता है, जो इसे विशेष बनाता है।

250 वर्षों की गौरवशाली परंपरा

वैशाख शुक्ल चतुर्दशी के अवसर पर आयोजित होने वाली यह लीला जयपुर की सांस्कृतिक विरासत का अभिन्न हिस्सा है। पिछले 250 सालों से यह परंपरा बिना रुके लगातार चली आ रही है।

इस विशेष दिन पर मंदिर के गर्भगृह से नृसिंह और वराह भगवान के प्राचीन मुखौटे बाहर निकाले जाते हैं। साल भर इन्हें सुरक्षित रखा जाता है और केवल इसी दिन दर्शन होते हैं।

अद्भुत मंचन और दैवीय स्वरूप

लीला का सबसे रोमांचक क्षण वह होता है जब नृसिंह भगवान खंभे को फाड़कर प्रकट होते हैं। वहीं वराह भगवान धरती को चीरते हुए दर्शकों के सामने अवतरित होते हैं।

इन स्वरूपों को व्यास परिवार के सदस्य ही धारण करते हैं। विधि-विधान से पूजा के बाद इन भारी भरकम स्वरूपों को पहनकर शहर के प्रमुख मार्गों पर शोभायात्रा निकाली जाती है।

40 डिग्री तापमान और 140 किलो का भार

जयपुर की भीषण गर्मी में जब पारा 40 डिग्री के पार होता है, तब इन भारी स्वरूपों को पहनना किसी कठिन तपस्या से कम नहीं है। यह एक शारीरिक चुनौती है।

नृसिंह स्वरूप का वजन लगभग 51 किलो होता है, जबकि वराह स्वरूप का वजन 90 किलो तक पहुंच जाता है। कुल मिलाकर कलाकार पर 140 किलो से अधिक का भार होता है।

चुनौतियों के बीच अटूट भक्ति

इतने वजन के साथ लगातार दो घंटे तक नृत्य करना और गलियों में घूमना साहस का काम है। मुखौटों के भीतर से देखना भी बेहद कठिन और सीमित होता है।

सहयोग के लिए एक व्यक्ति टॉर्च लेकर आगे चलता है, जबकि दूसरा कलाकार को गर्मी से राहत देने के लिए पंखे से हवा करता रहता है ताकि वे सुरक्षित रहें।

"मान्यता है कि जो भी व्यक्ति इन पवित्र स्वरूपों को धारण करता है, उसमें स्वयं भगवान का भाव समाहित हो जाता है और उन्हें असीम शक्ति प्राप्त होती है।"

भक्तों की अगाध श्रद्धा और मान्यताएं

लीला के दौरान त्रिपोलिया गेट और प्रमुख बाजारों में हजारों की भीड़ उमड़ती है। लोग अपने घरों की छतों से भगवान के इन दिव्य स्वरूपों के दर्शन पाने को आतुर रहते हैं।

भक्त नृसिंह अवतार की जटा के बाल को प्रसाद के रूप में प्राप्त करने का प्रयास करते हैं। माना जाता है कि इसे ताबीज बनाकर पहनने से बच्चों की रक्षा होती है।

आतिशबाजी और भव्य शोभायात्रा

लीला के समापन पर भव्य आतिशबाजी की जाती है, जो पूरे आसमान को रोशन कर देती है। यह आयोजन जयपुर की पहचान और यहां की जीवंत संस्कृति का एक उत्कृष्ट उदाहरण है।

यह परंपरा आज की युवा पीढ़ी को अपने इतिहास और जड़ों से जोड़ने का काम कर रही है। साहस, भक्ति और कला का यह मेल विश्वभर में प्रसिद्ध हो रहा है।

अंत में, जयपुर की यह नृसिंह लीला केवल एक धार्मिक अनुष्ठान नहीं है, बल्कि यह राजस्थान के शौर्य और अटूट विश्वास की एक जीवित गाथा है जो पीढ़ी दर पीढ़ी चलती रहेगी।

*Edit with Google AI Studio

शेयर करें: