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राजस्थान

जालोर: फर्जी साइन से राज्य सम्मान: जालोर: कलेक्टर के फर्जी साइन कर खुद को दिलवाया राज्य सम्मान

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जालोर नर्सिंग कॉलेज प्रिंसिपल पर फर्जीवाड़े का आरोप, कलेक्टर ने नकारा हस्ताक्षर।

HIGHLIGHTS

  • नर्सिंग कॉलेज प्रिंसिपल डॉ. पवन ओझा पर फर्जी अनुशंसा पत्र तैयार करने का गंभीर आरोप लगा है।
  • कलेक्टर डॉ. प्रदीप के गवांडे ने दस्तावेजों पर अपने हस्ताक्षर को पूरी तरह फर्जी बताया है।
  • खुद ही चयन समिति बनाई और रोटरी क्लब के कार्यों को अपने नाम से कागजों में दर्शाया।
  • सीएमएचओ ने माना कि 6 पेज के पत्र में से केवल 2 पेज पर ही उनके असली साइन हैं।
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जालोर | राजस्थान के जालोर जिले से एक सरकारी अधिकारी द्वारा खुद को सम्मानित करवाने के लिए कलेक्टर के फर्जी हस्ताक्षर करने का सनसनीखेज मामला सामने आया है। नर्सिंग कॉलेज के प्रिंसिपल ने यह सब राज्य स्तरीय सम्मान पाने के लिए किया।

जालोर नर्सिंग कॉलेज प्रिंसिपल पर फर्जीवाड़े का आरोप

जालोर के नर्सिंग कॉलेज प्रिंसिपल डॉ. पवन ओझा पर आरोप है कि उन्होंने राज्य स्तरीय नर्सेज दिवस सम्मान हासिल करने के लिए फर्जी अनुशंसा पत्र तैयार किया। उन्होंने कलेक्टर की अध्यक्षता में खुद ही एक समिति बना ली।

हैरानी की बात यह है कि इस पूरी प्रक्रिया में जिला कलेक्टर को शामिल दिखाया गया, जबकि उन्हें इस बारे में कोई जानकारी ही नहीं थी। कागजों में बैठक होना दर्शाया गया और फर्जी हस्ताक्षर कर दिए गए।

इसी फर्जी अनुशंसा के आधार पर 12 मई 2026 को उन्हें प्रतिष्ठित राज्य स्तरीय नाइटेंगल फ्लोरेंस अवार्ड से नवाजा गया। अब इस मामले के खुलासे के बाद जालोर के स्वास्थ्य विभाग और प्रशासनिक गलियारों में हड़कंप मचा हुआ है।

यह मामला तब प्रकाश में आया जब विभागीय स्तर पर दस्तावेजों की जांच की गई। जांच के दौरान पाया गया कि अनुशंसा पत्र में कई विसंगतियां हैं और हस्ताक्षर मेल नहीं खा रहे हैं।

कलेक्टर की अध्यक्षता वाली फर्जी चयन समिति

इस सम्मान के लिए जो जिला स्तरीय चयन समिति बनाई गई थी, उसमें कुल 6 सदस्यों के नाम शामिल थे। इसमें अध्यक्ष के तौर पर जिले के कलेक्टर का नाम सबसे ऊपर रखा गया था।

समिति के अन्य सदस्यों में सीएमएचओ, पीएमओ, नर्सिंग अधीक्षक, नर्सिंग कॉलेज प्रिंसिपल और जीएनएम ट्रेनिंग सेंटर प्रिंसिपल को शामिल किया गया था। यह पूरी चयन प्रक्रिया केवल कागजों पर ही पूरी कर ली गई थी।

दिलचस्प बात यह है कि इन 6 पदों में से 2 पद खुद डॉ. पवन ओझा के पास ही थे। उन्होंने खुद ही दोनों पदों के प्रतिनिधि के रूप में अपने नाम की सिफारिश कर विभाग को भेज दी।

इस तरह की धोखाधड़ी से न केवल सरकारी नियमों का उल्लंघन हुआ है, बल्कि एक प्रतिष्ठित पुरस्कार की गरिमा को भी ठेस पहुंची है। मामले की गंभीरता को देखते हुए अब उच्च स्तरीय जांच की मांग हो रही है।

कागजों में दिखाई गई फर्जी बैठक

अनुशंसा पत्र में यह दावा किया गया कि चयन समिति की एक औपचारिक बैठक आयोजित की गई थी। इस बैठक में सर्वसम्मति से डॉ. पवन ओझा के नाम की सिफारिश करने का निर्णय लिया गया।

इसके बाद 29 अप्रैल 2026 को यह प्रस्ताव जयपुर स्थित चिकित्सा एवं स्वास्थ्य सेवाएं विभाग के निदेशक को भेज दिया गया। प्रस्ताव के साथ भेजे गए दस्तावेजों में कई स्तरों पर हेराफेरी की गई थी।

कुल 6 पेज के इस अनुशंसा पत्र में सीएमएचओ के हस्ताक्षर सिर्फ 2 पेजों पर ही मौजूद हैं। बाकी के 4 पेजों पर फर्जी स्टाम्प लगाकर हस्ताक्षर किए जाने का दावा किया जा रहा है।

रोटरी क्लब के कार्यों को बताया अपना योगदान

डॉ. ओझा ने अपनी उपलब्धियां गिनाने के लिए रोटरी क्लब द्वारा किए गए कार्यों का सहारा लिया। उन्होंने अनुशंसा पत्र में लिखा कि उन्होंने अस्पताल में मरीजों के बैठने के लिए टीन शेड और बेंच लगवाए।

जबकि सच्चाई यह है कि अस्पताल परिसर में लगे टीन शेड पर स्पष्ट रूप से रोटरी क्लब की पट्टिका लगी हुई है। वहां रखी 8 बेंचों में से केवल एक पर ही उनका नाम दर्ज है।

बाकी की सभी बेंचें अस्पताल के अन्य डॉक्टरों द्वारा भेंट की गई थीं। इस तरह उन्होंने दूसरों के सामाजिक कार्यों को अपना व्यक्तिगत खर्च बताकर विभाग को गुमराह करने की कोशिश की और पुरस्कार जीता।

इस खुलासे के बाद स्थानीय सामाजिक संगठनों में भी रोष व्याप्त है। लोग पूछ रहे हैं कि क्या विभाग ने इन दावों की पुष्टि करने की जहमत नहीं उठाई थी?

जिम्मेदार अधिकारियों के बड़े खुलासे

मामला सामने आने के बाद जिला कलेक्टर डॉ. प्रदीप के गवांडे ने इस पूरे प्रकरण पर कड़ी प्रतिक्रिया दी है। उन्होंने स्पष्ट किया कि उनकी अध्यक्षता में ऐसी किसी भी समिति की कोई बैठक नहीं हुई।

कलेक्टर डॉ. प्रदीप के गवांडे ने कहा, "मुझे ऐसी किसी समिति या बैठक की कोई जानकारी नहीं है। दस्तावेजों पर किए गए मेरे हस्ताक्षर पूरी तरह से फर्जी हैं और यह गंभीर मामला है।"

जालोर के सीएमएचओ डॉ. भैराराम जाणी ने भी स्वीकार किया कि उन्होंने केवल 2 पेजों पर साइन किए थे। उन्होंने कहा कि बाकी पेजों पर उनके नाम से किए गए हस्ताक्षर उनके नहीं हैं।

पीएमओ डॉ. वीपी मीणा ने बताया कि डॉ. ओझा उनके संस्थान में कार्यरत हैं, इसलिए उनकी अनुशंसा की गई थी। लेकिन फर्जी हस्ताक्षर की सच्चाई के बारे में उन्हें कोई ठोस जानकारी नहीं है।

प्रिंसिपल डॉ. पवन ओझा की सफाई

जब इस मामले में आरोपी डॉ. पवन ओझा से सवाल किए गए, तो उन्होंने अजीब तर्क दिए। उन्होंने कहा कि चयन समिति की सूची ऊपर से ही बनकर आती है और कलेक्टर को शायद याद नहीं होगा।

उन्होंने सीएमएचओ के हस्ताक्षरों पर उठ रहे सवालों पर कहा कि पत्र को किसी ने एडिट किया हो सकता है। हालांकि, विभाग अब इस पूरे मामले की गहराई से जांच करने की तैयारी कर रहा है।

इतने बड़े फर्जीवाड़े के बावजूद अभी तक किसी भी पुलिस थाने में प्राथमिकी दर्ज नहीं करवाई गई है। यह स्वास्थ्य विभाग की कार्यप्रणाली पर भी कई सवालिया निशान खड़े करता है।

जालोर की जनता अब इस मामले में कड़ी कार्रवाई की उम्मीद कर रही है। फर्जीवाड़े के जरिए सम्मान पाना न केवल अनैतिक है, बल्कि एक गंभीर प्रशासनिक अपराध की श्रेणी में आता है।

यह घटना न केवल एक व्यक्ति के भ्रष्टाचार को उजागर करती है, बल्कि पूरी चयन प्रक्रिया की खामियों को भी दर्शाती है। अब देखना यह होगा कि राज्य सरकार इस पर क्या कदम उठाती है।

*Edit with Google AI Studio

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