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राजस्थान

नीली नगरी का गौरव: जोधपुर स्थापना दिवस मेहरानगढ़ और ब्लू सिटी का अनोखा इतिहास

बलजीत सिंह शेखावत

12 मई 1459 को राव जोधा ने रखी थी नींव, आज विश्व का हेरिटेज हब है जोधपुर।

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HIGHLIGHTS

  • 12 मई 1459 को राव जोधा ने मेहरानगढ़ किले के साथ जोधपुर की नींव रखी थी।
  • दीमकों से बचाव और ठंडक के लिए घरों को नीला रंग देने से यह 'ब्लू सिटी' बना।
  • उम्मेद भवन पैलेस दुनिया के सबसे बड़े निजी निवासों में से एक, इंटरलॉकिंग से बना।
  • पर्यावरण संरक्षण के लिए खेजड़ली में 363 लोगों ने पेड़ों के लिए बलिदान दिया था।
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जोधपुर | मारवाड़ की शान और राजस्थान की 'नीली नगरी' जोधपुर आज अपना 565वां स्थापना दिवस मना रहा है। 12 मई 1459 को राव जोधा द्वारा बसाया गया यह शहर आज अपनी अनूठी संस्कृति और गौरवशाली इतिहास के लिए प्रसिद्ध है।

मेहरानगढ़: परियों द्वारा निर्मित किला

जमीन से 410 फीट ऊंची पहाड़ी पर स्थित मेहरानगढ़ किला जोधपुर की पहचान है। इसकी अजेय दीवारों पर आज भी युद्ध के गोलों के निशान देखे जा सकते हैं। यह किला वास्तुकला का अद्भुत नमूना है।

प्रसिद्ध लेखक रुडयार्ड किपलिंग ने इस भव्य किले को देखकर मंत्रमुग्ध होकर कहा था:

"यह इंसानों ने नहीं, बल्कि परियों और फरिश्तों ने बनाया है।"

इतिहास के अनुसार, किले की नींव में राजा राम मेघवाल ने स्वेच्छा से अपना बलिदान दिया था। राज्य की खुशहाली के लिए उन्होंने जीवित दफन होना स्वीकार किया, जिसकी याद में वहां स्मारक बना है।

नीला रंग और 'सन सिटी' का रहस्य

जोधपुर को दुनिया 'ब्लू सिटी' के नाम से जानती है। पुराने समय में यहां के लोग घरों को दीमकों से बचाने और गर्मी में ठंडा रखने के लिए चूने में कॉपर सल्फेट मिलाते थे।

इसी मिश्रण के कारण शहर का रंग नीला हो गया। इसके अलावा, साल भर खिली रहने वाली तेज धूप के कारण इसे 'सूर्य नगरी' या 'सन सिटी' भी कहा जाता है। यहां की धूप सैलानियों को भाती है।

उम्मेद भवन और स्थापत्य कला

जोधपुर में स्थित उम्मेद भवन पैलेस दुनिया के सबसे बड़े निजी आवासों में से एक है। इसके निर्माण में किसी सीमेंट का उपयोग नहीं हुआ है। इसे 'इंटरलॉकिंग' पत्थरों की तकनीक से बनाया गया है।

वर्तमान में इसके एक हिस्से में राजपरिवार रहता है, जबकि अन्य हिस्से होटल और संग्रहालय हैं। वहीं ओसियां के मंदिर अपनी बारीक नक्काशी के लिए 'राजस्थान के खजुराहो' के रूप में पूरी दुनिया में विख्यात हैं।

पर्यावरण प्रेम और बिश्नोई समाज

जोधपुर का इतिहास केवल युद्धों का नहीं, बल्कि पर्यावरण संरक्षण का भी है। खेजड़ली गांव में 363 लोगों ने पेड़ों को बचाने के लिए अपने प्राणों की आहुति दे दी थी। यह बलिदान अद्वितीय है।

आज भी बिश्नोई समाज वन्यजीवों और प्रकृति की रक्षा के लिए समर्पित है। यहां काले हिरण और चिंकारा को परिवार के सदस्य की तरह पाला जाता है। यह प्रेम पूरी दुनिया के लिए एक मिसाल है।

स्वाद और ग्लोबल फैशन का केंद्र

जोधपुर के मिर्ची वड़ा और मावा कचोरी का स्वाद सात समंदर पार तक मशहूर है। यहां का खान-पान सैलानियों की पहली पसंद रहता है। इसके बिना जोधपुर की यात्रा हमेशा अधूरी मानी जाती है।

पहनावे की बात करें तो 'जोधपुरी कोट' और 'साफा' वैश्विक स्तर पर सम्मान का प्रतीक हैं। हॉलीवुड से लेकर बॉलीवुड तक जोधपुरी ब्रीचेस और सूट का क्रेज आज भी बड़े स्तर पर बरकरार है।

मारवाड़ी घोड़े और पोलो का रोमांच

दुनियाभर में मशहूर 'मारवाड़ी नस्ल' के घोड़े जोधपुर की शान हैं। अपने मुड़े हुए कानों के लिए प्रसिद्ध ये घोड़े युद्ध कौशल में माहिर थे। जोधपुर को आज भी 'पोलो का मक्का' कहा जाता है।

जोधपुर आज अपनी परंपराओं को आधुनिकता के साथ जोड़कर विश्व पटल पर चमक रहा है। इसकी विरासत और लोगों का अपनत्व इसे हर सैलानी के दिल में एक खास जगह दिलाता है। जय मारवाड़।

*Edit with Google AI Studio

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