नई दिल्ली | AIMIM प्रमुख असदुद्दीन ओवैसी ने केंद्रीय मंत्री किरेन रिजिजू के हालिया बयानों पर तीखा प्रहार किया है। ओवैसी ने आरोप लगाया कि मंत्री भारतीय मुसलमानों के मौलिक अधिकारों को व्यवस्थित रूप से छीनने का प्रयास कर रहे हैं। सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म 'X' पर अपनी प्रतिक्रिया देते हुए ओवैसी ने रिजिजू को 'अल्पसंख्यकों के खिलाफ मंत्री' करार दिया। उन्होंने मंत्री की जनसांख्यिकीय समझ पर भी गंभीर सवाल खड़े किए हैं। ओवैसी ने भारतीय संविधान के अनुच्छेद 30 का हवाला देते हुए कहा कि हिंदू-बहुल देश में हर गैर-हिंदू समूह कानूनी रूप से अल्पसंख्यक है। यह अधिकार उन्हें शैक्षणिक संस्थान चलाने की अनुमति देता है।
अल्पसंख्यक विवाद: ओवैसी का रिजिजू पर पलटवार, अल्पसंख्यक अधिकारों पर छिड़ी रार
असदुद्दीन ओवैसी ने किरेन रिजिजू के बयानों को अल्पसंख्यकों के खिलाफ दुष्प्रचार करार दिया है।
HIGHLIGHTS
- ओवैसी ने रिजिजू को 'अल्पसंख्यकों के खिलाफ मंत्री' कहा।
- अनुच्छेद 30 के तहत गैर-हिंदू समूहों के अधिकारों का जिक्र किया।
- जनसंख्या के गणित (79.8% बनाम 14%) पर सवाल उठाए।
- भाषाई अल्पसंख्यकों का उदाहरण देकर रिजिजू के तर्क को चुनौती दी।
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संवैधानिक अधिकारों और गणित की चुनौती
ओवैसी ने रिजिजू से गणित का एक सीधा सवाल पूछा। उन्होंने पूछा कि क्या 79.8% की तुलना में 14% को बहुसंख्यक माना जा सकता है? उन्होंने इसे सरकार का दुष्प्रचार बताया। ओवैसी के अनुसार, यदि हिंदू समुदाय बहुसंख्यक है, तो स्वाभाविक रूप से अन्य सभी समुदाय अल्पसंख्यक की श्रेणी में आएंगे। उन्होंने मंत्री पर तथ्यों को तोड़ने-मरोड़ने का आरोप लगाया।
"किरेन रिजिजू के लिए गणित का एक सीधा सा सवाल: 79.8% बड़ा है या 14%? यदि हिंदू बहुसंख्यक समुदाय हैं, तो हर गैर-हिंदू समूह अल्पसंख्यक ही है।"
ओवैसी ने आगे कहा कि मंत्री महोदय मुसलमानों को उनके मौलिक अधिकारों से वंचित करने के लिए गलत सूचनाएं फैला रहे हैं। इससे देश के लोकतांत्रिक ढांचे पर बुरा असर पड़ता है। उन्होंने जोर देकर कहा कि संविधान सभी को समान अधिकार देता है।
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भाषाई अल्पसंख्यकों का तर्क
ओवैसी ने क्षेत्रीय भाषाओं का उदाहरण देते हुए अपने तर्क को और मजबूती दी। उन्होंने कहा कि जनसंख्या का आकार ही अल्पसंख्यक दर्जे का एकमात्र पैमाना नहीं हो सकता। उन्होंने स्पष्ट किया कि गैर-हिंदी भाषी राज्यों में रहने वाले हिंदी भाषी लोग भी भाषाई अल्पसंख्यक कहलाते हैं। उनकी संख्या कई विकसित देशों की कुल आबादी से भी अधिक है। ओवैसी ने तर्क दिया कि यदि रिजिजू का पैमाना मान लिया जाए, तो इन हिंदी भाषियों का अल्पसंख्यक दर्जा भी खतरे में पड़ जाएगा। यह तर्क पूरी तरह अतार्किक और विभाजनकारी है। उन्होंने कहा कि भारत की विविधता ही इसकी असली पहचान है।
विवाद की जड़: किरेन रिजिजू का बयान
यह पूरा विवाद तब शुरू हुआ जब केंद्रीय अल्पसंख्यक मामलों के मंत्री किरेन रिजिजू ने राष्ट्रीय अल्पसंख्यक आयोग के एक सम्मेलन को संबोधित किया। वहां उन्होंने कुछ तुलनाएं पेश की थीं। रिजिजू ने भारत की मुस्लिम आबादी की तुलना पारसी समुदाय से की थी। उन्होंने कहा था कि भारत में मुस्लिमों की संख्या इतनी अधिक है कि वे दुनिया का छठा सबसे बड़ा देश बना सकते हैं। इसके विपरीत, उन्होंने बताया कि देश में पारसियों की संख्या केवल 53,000 के आसपास है। रिजिजू का इशारा संभवतः अल्पसंख्यक दर्जे की परिभाषा और उसके लाभों के वितरण को लेकर था।
राजनीतिक प्रभाव और भविष्य की राह
इस बयानबाजी ने देश में एक नई राजनीतिक बहस को जन्म दे दिया है। विपक्ष इसे अल्पसंख्यकों की सुरक्षा और अधिकारों पर सीधा हमला मान रहा है। ओवैसी का यह हमला आगामी चुनावों और अल्पसंख्यक राजनीति के लिहाज से काफी महत्वपूर्ण माना जा रहा है। संविधान विशेषज्ञों की नजर भी इस विवाद पर टिकी है। अंततः, यह विवाद अल्पसंख्यक अधिकारों की व्याख्या और संवैधानिक सुरक्षा के इर्द-गिर्द घूमता है। आने वाले दिनों में इस मुद्दे पर संसद और बाहर और अधिक तीखी बहस होने की संभावना है।
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