जयपुर | राजस्थान की राजधानी जयपुर के झोटवाड़ा स्थित संघ शक्ति सभागार में भारतीय सेना के सर्वोच्च सम्मान परमवीर चक्र से सम्मानित शहीद पीरू सिंह शेखावत की 108वीं जयंती श्रद्धापूर्वक और गरिमामय समारोह के साथ मनाई गई।
परमवीर पीरू सिंह की 108वीं जयंती: जयपुर में परमवीर पीरू सिंह शेखावत की जयंती समारोहपूर्वक मनाई
जयपुर के झोटवाड़ा में शहीद पीरू सिंह शेखावत की 108वीं जयंती पर दी गई भावभीनी श्रद्धांजलि।
HIGHLIGHTS
- जयपुर के झोटवाड़ा स्थित संघ शक्ति सभागार में शहीद पीरू सिंह शेखावत की 108वीं जयंती मनाई गई।
- लेफ्टिनेंट जनरल विश्वम्भर सिंह ने पीरू सिंह को असाधारण प्रतिभा का धनी और अदम्य साहसी बताया।
- मेजर जनरल विजय सिंह ने 1948 के कश्मीर युद्ध में उनकी वीरता और दुर्गम जीत पर प्रकाश डाला।
- पीरू सिंह शेखावत को उनके सर्वोच्च बलिदान के लिए मरणोपरांत परमवीर चक्र से सम्मानित किया गया था।
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शहीद पीरू सिंह शेखावत को पुष्पांजलि अर्पित
महापुरुष सम्मान समारोह समिति के तत्वाधान में आयोजित इस गौरवमयी जयंती समारोह का शुभारंभ शहीद पीरू सिंह शेखावत की प्रतिमा पर पुष्पांजलि अर्पित कर किया गया। इस दौरान पूरा वातावरण देशभक्ति के नारों से गूंज उठा।
समारोह में सेना के वरिष्ठ अधिकारियों, पूर्व सैनिकों और गणमान्य नागरिकों ने बड़ी संख्या में भाग लिया। सभी ने पीरू सिंह के अदम्य साहस और देश के प्रति उनके सर्वोच्च बलिदान को याद किया।
उपस्थित जनसमूह ने शहीद पीरू सिंह के चित्र पर पुष्प अर्पित कर उन्हें नमन किया। वक्ताओं ने उनके जीवन से जुड़े प्रेरक प्रसंगों को साझा किया, जिससे वहां मौजूद युवाओं में जोश भर गया।
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असाधारण प्रतिभा के धनी थे पीरू सिंह: लेफ्टिनेंट जनरल विश्वम्भर सिंह
समारोह के मुख्य अतिथि लेफ्टिनेंट जनरल विश्वम्भर सिंह ने अपने संबोधन में कहा कि शहीद पीरू सिंह शेखावत एक साधारण परिवार में जन्मे असाधारण प्रतिभा के धनी योद्धा थे। उनका जीवन प्रेरणा का पुंज है।
उन्होंने बताया कि पीरू सिंह एक सिपाही के रूप में सेना में भर्ती हुए थे। अपनी अटूट मेहनत और नेतृत्व क्षमता के कारण वे शीघ्र ही कंपनी हवलदार मेजर के महत्वपूर्ण पद तक पहुंच गए थे।
1947-48 के युद्ध में कबायली हमलों के दौरान पीरू सिंह के अदम्य साहस के कारण ही भारतीय सेना देश की महत्वपूर्ण चौकियों पर विजय प्राप्त करने में सफल हो सकी थी।
लेफ्टिनेंट जनरल ने आगे कहा कि पीरू सिंह न केवल एक महान योद्धा थे, बल्कि वे सैनिकों को प्रशिक्षण देने के कार्य में भी निपुण थे। उनकी रणनीति ने कई मोर्चों पर जीत दिलाई।
विपरीत परिस्थितियों में भी नहीं मानी हार
मेजर जनरल विजय सिंह ने समारोह को संबोधित करते हुए बताया कि आजाद भारत के शुरुआती संघर्षों में पीरू सिंह ने विकट पर्वतीय क्षेत्रों और बेहद सीमित संसाधनों के बावजूद अभूतपूर्व वीरता दिखाई थी।
उन्होंने उन दुर्गम चौकियों पर विजय प्राप्त की, जिन पर जीत हासिल करना लगभग असंभव माना जा रहा था। उनकी यह वीरता भारतीय सैन्य इतिहास के सुनहरे पन्नों में हमेशा के लिए दर्ज हो गई।
समारोह में रत्ना कुमारी शाहपुरा, अभिमन्यु सिंह राजवी और राजेंद्र सिंह शेखावत (IAS) ने भी अपने विचार व्यक्त किए। उन्होंने नई पीढ़ी को पीरू सिंह के आदर्शों को अपनाने का संदेश दिया।
झुन्झुनू के लाल की वीरगाथा और बलिदान
कैप्टन विरेन्द्र सिंह ने शहीद पीरू सिंह के जीवन परिचय पर विस्तार से प्रकाश डाला। उन्होंने बताया कि पीरू सिंह का जन्म 20 मई 1918 को झुन्झुनू जिले के रामपुरा बेरी गांव में हुआ था।
उनके पिता लाल सिंह एक साधारण किसान थे। पीरू सिंह मात्र 18 वर्ष की आयु में भारतीय सेना में भर्ती हुए थे। उन्होंने देश की सीमाओं की रक्षा के लिए अपना सर्वस्व न्योछावर कर दिया।
18 जुलाई 1948 को कश्मीर के तिथवाल सेक्टर में लड़ते हुए उन्होंने शत्रु सेना की महत्वपूर्ण चौकियों पर कब्जा किया। इसी भीषण संघर्ष के दौरान वे वीरगति को प्राप्त होकर अमर हो गए।
मरणोपरांत परमवीर चक्र से सम्मान
देश के प्रति उनके अद्वितीय बलिदान के लिए भारत सरकार ने उन्हें मरणोपरांत सर्वोच्च सैन्य सम्मान 'परमवीर चक्र' से नवाजा। उनकी वीरता आज भी हर भारतीय सेना के जवान के लिए प्रेरणा है।
समारोह के अंत में मेजर घनश्याम सिंह ने सभी अतिथियों और आगंतुकों का आभार व्यक्त किया। इस अवसर पर आनंद सिंह जालसू, मुकेश सिंह बोबासर और महेंद्र सिंह दौलतपुरा सहित सैकड़ों लोग उपस्थित रहे।
शहीद पीरू सिंह शेखावत की जयंती केवल एक औपचारिक आयोजन नहीं, बल्कि उनके शौर्य और राष्ट्रवाद को नमन करने का पर्व है। उनकी शहादत आने वाली पीढ़ियों को सदैव राष्ट्र सेवा के लिए प्रेरित करती रहेगी।
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