नई दिल्ली | लोकसभा में इन दिनों वामपंथी उग्रवाद और आदिवासियों के अधिकारों को लेकर गरमागरम बहस देखने को मिल रही है। हाल ही में नियम 193 के तहत हुई चर्चा के दौरान बांसवाड़ा-डूंगरपुर के सांसद राज कुमार रोत ने आदिवासियों की आवाज बुलंद की। उन्होंने नक्सलवाद के इतिहास से लेकर वर्तमान में आदिवासियों के विस्थापन तक कई गंभीर मुद्दों पर सरकार को घेरा।
राज कुमार रोत का लोकसभा में कड़ा रुख: 'आदिवासियों पर नक्सली का ठप्पा क्यों?': लोकसभा में सांसद राज कुमार रोत ने उठाए तीखे सवाल, गृह मंत्री से मांगा जवाब
लोकसभा में नियम 193 के तहत चर्चा के दौरान सांसद राज कुमार रोत ने आदिवासियों के विस्थापन और उन्हें नक्सली बताए जाने पर तीखे सवाल किए। उन्होंने गृह मंत्री से पूछा कि आखिर गरीब आदिवासियों तक आधुनिक हथियार कहाँ से पहुँच रहे हैं।
HIGHLIGHTS
- राज कुमार रोत ने आदिवासियों को 'नक्सली' का ठप्पा लगाए जाने पर कड़ा विरोध जताया।
- उन्होंने पूछा कि आखिर बिना चप्पल वाले आदिवासियों के पास आधुनिक हथियार कहाँ से आ रहे हैं।
- रोत के अनुसार, 2014 से 2026 के बीच करीब 10 लाख आदिवासी विस्थापित हुए हैं।
- उन्होंने आदिवासियों से हथियारों के बजाय 'कलम और कागज' के जरिए संघर्ष करने का आह्वान किया।
संबंधित खबरें
नक्सलवाद और प्रतिनिधित्व का सवाल
राज कुमार रोत ने अपने भाषण की शुरुआत नक्सलवाद की ऐतिहासिक पृष्ठभूमि से की। उन्होंने बताया कि यह 1967 में पश्चिम बंगाल के नक्सलबाड़ी से शुरू हुआ था। उन्होंने गृह मंत्री अमित शाह के उस दावे का स्वागत किया जिसमें उन्होंने 31 मार्च 2026 तक देश को नक्सल मुक्त बनाने की बात कही है। हालांकि, रोत ने संसद में आदिवासियों के प्रतिनिधित्व पर एक बड़ा सवाल खड़ा किया। उन्होंने कहा कि सदन में 47 आदिवासी सांसद हैं, लेकिन सत्ता पक्ष की ओर से आदिवासी सांसदों को इस गंभीर मुद्दे पर बोलने का पर्याप्त अवसर नहीं दिया गया। यह मुद्दा सीधे तौर पर छत्तीसगढ़, झारखंड, ओडिशा और तेलंगाना जैसे आदिवासी बहुल क्षेत्रों को प्रभावित करता है।
'नक्सली' ठप्पे पर तीखा विरोध
सांसद रोत ने कहा कि जब भी कोई आदिवासी अपने हक, यानी 'जल, जंगल और जमीन' के लिए आवाज उठाता है, तो उसे नक्सली कह दिया जाता है। उन्होंने तर्क दिया कि आदिवासियों का संघर्ष उनके मौलिक अधिकारों की रक्षा के लिए है, न कि देश के विरोध में। रोत ने एक बहुत ही तार्किक सवाल पूछा कि जो आदिवासी शहर जाकर एक चप्पल तक नहीं खरीद सकता, उसके पास आधुनिक हथियार कहाँ से आते हैं? उन्होंने सरकार से मांग की कि हथियारों के असली सप्लायर्स को पकड़ा जाए और उनकी गिरफ्तारी की जाए, न कि मासूम आदिवासियों को निशाना बनाया जाए।
संबंधित खबरें
विस्थापन का दर्दनाक आंकड़ा
विस्थापन के मुद्दे पर रोत ने चौंकाने वाले आंकड़े पेश किए। उन्होंने बताया कि आजादी के बाद से अब तक 22 लाख आदिवासी विस्थापित हुए हैं। उन्होंने दावा किया कि अकेले 2014 से 2026 के बीच वर्तमान सरकार के कार्यकाल में 10 लाख आदिवासियों को विस्थापित किया गया है। विकास परियोजनाओं के नाम पर होने वाला यह विस्थापन आदिवासियों की संस्कृति और उनकी जड़ों को पूरी तरह खत्म कर रहा है।
हथियार नहीं, कलम है असली ताकत
सांसद ने आदिवासी समुदाय के युवाओं से एक भावुक अपील भी की। उन्होंने कहा कि जिन बच्चों को कलम पकड़नी चाहिए, वे आज हथियार उठा रहे हैं। उन्होंने आदिवासियों से आह्वान किया कि आज के दौर में सरकार समर्थित उद्योगपतियों से लड़ने के लिए 'कलम और कागज' का सहारा लें। रोत ने कहा कि जैसे पूर्वजों ने अंग्रेजों और जमींदारों से लड़ाई लड़ी थी, वैसे ही अब कानूनी और संवैधानिक तरीके से अपनी जमीन बचानी होगी।
न्याय ही एकमात्र समाधान
अंत में, उन्होंने गृह मंत्री को संबोधित करते हुए स्पष्ट किया कि उग्रवाद को केवल बंदूक के दम पर खत्म नहीं किया जा सकता। विचारधारा की लड़ाई को जीतने के लिए आदिवासी समाज के साथ वास्तविक न्याय करना होगा। उन्होंने कहा कि जब तक आदिवासियों को उनका हक नहीं मिलेगा, तब तक इस समस्या का कोई स्थायी समाधान नहीं निकल सकता। केवल बल प्रयोग से शांति स्थापित नहीं की जा सकती।
ताज़ा खबरें
असम चुनाव: चाय बागान में पीएम मोदी का देसी अंदाज, महिला श्रमिकों के साथ सेल्फी और संवाद ने जीता दिल
जयपुर में अवैध गैस रिफिलिंग और कालाबाजारी पर बड़ा एक्शन: 118 सिलेंडर जब्त, 3 टीमों की संयुक्त कार्रवाई
संसद में वित्त विधेयक 2026 पर बोले राव राजेंद्र सिंह: आर्थिक प्रगति और शेयर बाजार के खतरों पर सरकार को दी बड़ी चेतावनी
Rajasthan IAS Transfer List: संदेश नायक बने जयपुर के नए कलक्टर, जानें उनके सामने मौजूद 5 बड़ी चुनौतियां