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राजनीति

पंचायत चुनाव पर हाईकोर्ट का कड़ा रुख, बारिश और गर्मी जैसे बहाने छोड़िए, चुनाव कराओ सरकार: राजस्थान हाईकोर्ट का आदेश: 31 जुलाई तक कराएं निकाय चुनाव

प्रदीप बीदावत

राजस्थान हाईकोर्ट ने सरकार को फटकारा, 31 जुलाई तक चुनाव कराने के कड़े निर्देश दिए।

HIGHLIGHTS

  • राजस्थान हाईकोर्ट ने 31 जुलाई 2026 तक सभी स्थानीय चुनाव कराने का अल्टीमेटम दिया है।
  • अदालत ने गर्मी, मानसून और ओबीसी रिपोर्ट के बहानों को पूरी तरह खारिज कर दिया।
  • शहरी निकायों के परिसीमन और मतदाता सूची के लिए 20 जून की समय-सीमा तय की गई।
  • सुप्रीम कोर्ट के निर्देशों के तहत ट्रिपल-टेस्ट न होने पर सामान्य सीटों पर चुनाव होंगे।
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जयपुर | राजस्थान उच्च न्यायालय ने राज्य में लंबे समय से लंबित ग्रामीण और शहरी स्थानीय निकाय चुनावों को लेकर कड़ा रुख अपनाया है। अदालत ने सरकार और चुनाव आयोग को स्पष्ट चेतावनी दी है।

संवैधानिक दायित्वों पर हाईकोर्ट की टिप्पणी

माननीय कार्यवाहक मुख्य न्यायाधीश श्री संजीव प्रकाश शर्मा और न्यायमूर्ति श्री संजीत पुरोहित की खंडपीठ ने शुक्रवार को एक ऐतिहासिक फैसला सुनाया। अदालत ने कहा कि चुनाव टालना असंवैधानिक है।

अदालत ने स्पष्ट किया कि राज्य सरकार गर्मी, बारिश या ओबीसी आरक्षण रिपोर्ट का बहाना बनाकर अपनी जिम्मेदारियों से नहीं बच सकती। यह आदेश लोकतांत्रिक व्यवस्था को मजबूत करने वाला है।

न्यायालय ने सभी ग्राम पंचायतों और नगर पालिकाओं के चुनाव हर हाल में 31 जुलाई 2026 तक संपन्न कराने का सख्त अल्टीमेटम जारी किया है। इससे प्रशासनिक हलकों में हलचल मच गई है।

सरकार की दलीलों को किया गया खारिज

राज्य सरकार की ओर से महाधिवक्ता (AG) राजेंद्र प्रसाद ने चुनाव टालने के लिए कई तर्क पेश किए थे। सरकार ने संसाधनों की कमी का हवाला दिया था।

सरकार का तर्क था कि 397 शहरी और बड़ी संख्या में ग्रामीण निकायों के चुनाव के लिए लगभग 3.75 लाख कर्मचारियों की आवश्यकता होगी। यह एक बड़ी चुनौती है।

इसके अतिरिक्त, भीषण गर्मी और आगामी मानसून का हवाला देते हुए चुनावों को नवंबर तक टालने की मांग की गई थी। हालांकि, अदालत इन तर्कों से बिल्कुल भी सहमत नहीं दिखी।

खंडपीठ ने अपनी टिप्पणी में कहा कि राजस्थान में मौसम की ऐसी कोई चरम स्थिति नहीं है जिसे नागरिक सहन न कर सकें। मौसम के कारण सरकारी कामकाज नहीं रुकना चाहिए।

ओबीसी आरक्षण और सुप्रीम कोर्ट का हवाला

ओबीसी आरक्षण तय करने के लिए बनाए गए आयोग की रिपोर्ट में हो रही देरी पर भी कोर्ट ने गहरी नाराजगी जताई। आयोग का कार्यकाल सितंबर तक बढ़ाया गया था।

अदालत ने 'राहुल रमेश वाघ' और 'सुरेश महाजन' मामलों में सुप्रीम कोर्ट के ऐतिहासिक फैसलों का विस्तार से संदर्भ दिया। कोर्ट ने कहा कि चुनाव प्रक्रिया अनिश्चितकाल तक नहीं रुक सकती।

राजस्थान में बारिश और गर्म मौसम जैसे बहानों का कोई स्थान नहीं है। मौसम के कारण सरकार या अधिकारियों का कामकाज नहीं रुकता।

अदालत ने स्पष्ट किया कि यदि ट्रिपल-टेस्ट की औपचारिकताएं समय पर पूरी नहीं होती हैं, तो सीटों को सामान्य मानकर चुनाव कराए जाने चाहिए। चुनाव रोकना किसी भी स्थिति में विकल्प नहीं है।

प्रशासनिक उदासीनता पर प्रहार

अदालत ने कहा कि मई 2025 में ओबीसी आयोग का गठन किया गया था, लेकिन एक साल बीत जाने के बाद भी रिपोर्ट नहीं आई है। यह प्रशासनिक उदासीनता का परिचायक है।

सुनवाई के दौरान यह तथ्य सामने आया कि ग्राम पंचायतों के परिसीमन का कार्य 31 दिसंबर 2025 तक पूरा हो चुका है। मतदाता सूचियों का प्रकाशन भी फरवरी में हुआ था।

ग्रामीण स्तर पर तकनीकी बाधाएं अब मौजूद नहीं हैं। इसलिए वहां चुनाव कराने में कोई देरी नहीं होनी चाहिए। अदालत ने अधिकारियों को अपनी कार्यप्रणाली में सुधार करने को कहा है।

शहरी निकायों के लिए सख्त समय-सीमा

शहरी स्थानीय निकायों (ULBs) के परिसीमन में कानूनी उलझनें थीं, जो अब सुलझ चुकी हैं। अदालत ने अब इसके लिए 20 जून 2026 की समय-सीमा निर्धारित की है।

20 जून तक शहरी निकायों के वार्डों के परिसीमन और मतदाता सूची के संशोधन का कार्य हर हाल में पूरा करना होगा। इसमें किसी भी प्रकार की कोताही बर्दाश्त नहीं होगी।

राज्य चुनाव आयोग को निर्देश दिया गया है कि वह 31 जुलाई 2026 तक पूरी चुनाव प्रक्रिया को संपन्न कराए। यह आदेश सभी नगर पालिकाओं और पंचायतों पर लागू होगा।

जवाबदेही तय करने का निर्देश

कोर्ट ने अपने आदेश में अधिकारियों की जवाबदेही भी तय की है। यदि मतदाता सूची के संशोधन या चुनाव प्रक्रिया में अब देरी होती है, तो संबंधित अधिकारी जिम्मेदार होंगे।

अदालत ने चेतावनी दी है कि संवैधानिक समय-सीमा का उल्लंघन करने वाले अधिकारियों के खिलाफ सख्त कार्रवाई की जा सकती है। यह निर्णय लोकतांत्रिक मूल्यों की रक्षा के लिए महत्वपूर्ण है।

विपक्षी दलों ने भी इस फैसले का स्वागत किया है। उनका कहना है कि स्थानीय शासन के अभाव में विकास कार्य ठप पड़े थे। अब इनमें तेजी आने की उम्मीद है।

निष्कर्ष: लोकतंत्र की जीत

यह निर्णय पंचायती राज और स्थानीय स्वशासन व्यवस्था के लिए एक मील का पत्थर साबित होगा। अदालत ने यह सुनिश्चित किया है कि प्रशासनिक सुस्ती लोकतंत्र को बंधक नहीं बना सकती।

अब राज्य सरकार और चुनाव आयोग को युद्ध स्तर पर तैयारी करनी होगी। 31 जुलाई की समय-सीमा राजस्थान की राजनीति के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण होने वाली है।

*Edit with Google AI Studio

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