जयपुर | राजस्थान हाईकोर्ट ने पूर्व उपमुख्यमंत्री सचिन पायलट और उनके समर्थक विधायकों को अयोग्य ठहराने के नोटिस से जुड़ी पुनर्विचार याचिका को खारिज कर दिया है। अदालत ने अपने पुराने आदेश को बरकरार रखते हुए स्पष्ट किया कि अब इस कानूनी लड़ाई का कोई व्यावहारिक आधार नहीं बचा है।
पायलट अयोग्यता केस: हाईकोर्ट का फैसला: पायलट और समर्थक विधायकों की अयोग्यता याचिका हाईकोर्ट ने की खारिज
हाईकोर्ट ने कहा कि 2020 का अयोग्यता मामला अब सारहीन हो चुका है, नए सिरे से सुनवाई संभव नहीं।
HIGHLIGHTS
- राजस्थान हाईकोर्ट ने सचिन पायलट और उनके समर्थक विधायकों की अयोग्यता से जुड़ी रिव्यू याचिका खारिज की।
- अदालत ने कहा कि 16वीं विधानसभा के गठन के बाद अब यह पूरा मामला कानूनी रूप से सारहीन हो चुका है।
- यह विवाद 2020 के मानेसर कांड से शुरू हुआ था, जब तत्कालीन स्पीकर ने दल-बदल के नोटिस दिए थे।
- कोर्ट ने स्पष्ट किया कि रिव्यू याचिका के जरिए किसी भी मामले की नए सिरे से सुनवाई नहीं की जा सकती।
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हाईकोर्ट का कड़ा रुख: मामला अब 'सारहीन'
एक्टिंग चीफ जस्टिस संजीव प्रकाश शर्मा और जस्टिस शुभा मेहता की खंडपीठ ने मोहनलाल नामा की रिव्यू याचिका पर सुनवाई की। अदालत ने कहा कि 19 दिसंबर 2023 को दिए गए आदेश में यह साफ कर दिया गया था कि अब यह मामला पूरी तरह से सारहीन हो चुका है।
कोर्ट ने फैसले में टिप्पणी की कि पुनर्विचार याचिका का दायरा कानूनी रूप से बहुत सीमित होता है। किसी भी याचिकाकर्ता को रिव्यू की आड़ में पूरे मामले को फिर से नए सिरे से सुनने या बहस करने की अनुमति नहीं दी जा सकती।
क्या था 2020 का सियासी संकट?
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यह पूरा मामला जुलाई 2020 का है, जब राजस्थान की राजनीति में भारी उथल-पुथल मची थी। सचिन पायलट और उनके साथी विधायक अपनी ही सरकार के खिलाफ बगावत कर मानेसर चले गए थे। इसके बाद सियासी गलियारों में हड़कंप मच गया था।
तत्कालीन विधानसभा अध्यक्ष सीपी जोशी ने पार्टी व्हिप का उल्लंघन करने के आधार पर इन विधायकों को अयोग्यता के नोटिस जारी किए थे। पायलट गुट ने इन नोटिसों को चुनौती देते हुए हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाया था, जहां से उन्हें राहत मिली थी।
सुप्रीम कोर्ट में लंबित है मुख्य मामला
हाईकोर्ट ने उस समय विधायकों के खिलाफ किसी भी कार्रवाई पर यथास्थिति बनाए रखने का आदेश दिया था। स्पीकर सीपी जोशी ने इस फैसले को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी थी। दिलचस्प बात यह है कि वह मामला देश की सर्वोच्च अदालत में अब भी लंबित है।
दिसंबर 2023 में हुई सुनवाई के दौरान विधायकों की ओर से तर्क दिया गया था कि राजस्थान में अब 16वीं विधानसभा का गठन हो चुका है। ऐसे में पुरानी विधानसभा के नोटिसों का अब कोई मतलब नहीं रह जाता है, जिसे कोर्ट ने स्वीकार किया था।
याचिकाकर्ता की दलीलें और संवैधानिक बिंदु
पुनर्विचार याचिका दायर करने वाले मोहनलाल नामा का तर्क था कि उन्हें अपनी बात रखने का पर्याप्त अवसर नहीं मिला। उन्होंने कहा कि कोर्ट ने पहले इस मामले में विचार के लिए 13 महत्वपूर्ण कानूनी बिंदु तय किए थे, जिन पर फैसला होना बाकी था।
याचिकाकर्ता के अनुसार, यह मामला संविधान की 10वीं अनुसूची और दल-बदल विरोधी कानून की व्याख्या से जुड़ा है। उन्होंने दलील दी थी कि राजस्थान की जनता इस मामले से सीधे तौर पर प्रभावित है, इसलिए मेरिट के आधार पर सुनवाई जरूरी है।
"19 दिसंबर 2023 के आदेश से यह स्पष्ट है कि मामला अब सारहीन हो चुका है। पुनर्विचार याचिका के माध्यम से नए सिरे से सुनवाई की मांग करना कानूनन सही नहीं है।" - हाईकोर्ट की बेंच
हाईकोर्ट के इस ताजा फैसले ने सचिन पायलट और उनके समर्थकों के लिए कानूनी राहत के रास्ते को और पुख्ता कर दिया है। हालांकि, दल-बदल कानून से जुड़े संवैधानिक सवालों पर भविष्य में सुप्रीम कोर्ट का रुख क्या रहता है, यह देखना काफी महत्वपूर्ण होगा।
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