कॉकरोच जनता पार्टी (CJP) के नेताओं सौरव दास और आशुतोष रांका की हिरासत बढ़ने के बाद विशेष कार्यकारी मजिस्ट्रेट यानी SEM की शक्तियों पर एक बार फिर बहस छिड़ गई है। एहतियाती कार्रवाई के नाम पर हिरासत और बंधपत्र भरवाने पर अदालतें पहले भी सवाल उठा चुकी हैं।
SEM की शक्तियों पर फिर उठे सवाल: CJP नेताओं की हिरासत से चर्चा में SEM की शक्तियां
कॉकरोच जनता पार्टी के नेताओं सौरव दास और आशुतोष रांका की हिरासत बढ़ने के बाद विशेष कार्यकारी मजिस्ट्रेट (SEM) की शक्तियों और अदालतों की पुरानी चिंताओं पर चर्चा तेज हो गई है।
HIGHLIGHTS
- CJP नेता सौरव दास और आशुतोष रांका की हिरासत सात दिन के लिए बढ़ाई गई।
- दिल्ली पुलिस के एसीपी रैंक के अधिकारी और SEM ऋतुराज ने जारी किया आदेश।
- AISA अध्यक्ष नेहा बोरा को भी शांति बनाए रखने के लिए बंधपत्र भरने का नोटिस मिला।
- अदालतों ने समय-समय पर एहतियाती गिरफ्तारी और SEM के अधिकारों पर सवाल उठाए हैं।
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जंतर-मंतर पर प्रदर्शन और हिरासत की वजह
हाल ही में CJP नेता आशुतोष रांका और सौरव दास को सुरक्षा व्यवस्था का उल्लंघन करने और जंतर-मंतर पर प्रदर्शन के दौरान प्रवेश करने के आरोप में गिरफ्तार किया गया था।
दिल्ली पुलिस के एसीपी रैंक के अधिकारी और SEM ऋतुराज ने आदेश में कहा कि इन नेताओं के आचरण से कानून के प्रति सम्मान नजर नहीं आता। इसी आधार पर हिरासत सात दिन बढ़ाई गई।
हिरासत के दौरान नेताओं ने इस पूरी प्रक्रिया और SEM की भूमिका पर कड़ा विरोध दर्ज कराया। वहीं AISA अध्यक्ष नेहा बोरा को भी शांति बनाए रखने के लिए बंधपत्र भरने का नोटिस भेजा गया है।
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क्या होते हैं विशेष कार्यकारी मजिस्ट्रेट (SEM)?
आम तौर पर लोग मजिस्ट्रेट को न्यायपालिका से जोड़कर देखते हैं, लेकिन कार्यकारी मजिस्ट्रेट सरकार और पुलिस के अधीन काम करते हैं।
दिल्ली पुलिस अधिनियम के तहत केंद्र सरकार पुलिस कमिश्नर और एसीपी रैंक या उससे ऊपर के अधिकारियों को मजिस्ट्रेट की शक्तियां देती है।
न्यायिक मजिस्ट्रेट से कैसे हैं अलग?
- SEM का मुख्य काम सार्वजनिक व्यवस्था बनाए रखना और एहतियाती कदम उठाना है।
- SEM अदालतों की तरह किसी भी मुकदमे की सुनवाई नहीं कर सकते।
- न्यायिक मजिस्ट्रेट पूरी तरह न्यायपालिका यानी हाईकोर्ट के नियंत्रण में होते हैं और मुकदमों की सुनवाई करते हैं।
कानून का इतिहास और अदालतों की चिंताएं
एहतियाती गिरफ्तारी के इन प्रावधानों का इतिहास साल 1361 के इंग्लैंड के 'जस्टिस ऑफ पीस एक्ट' से जुड़ा है। वहां 'शांति के न्यायाधीशों' को उपद्रवियों से बंधपत्र लेने का अधिकार मिला था।
ब्रिटिश काल से होते हुए यह व्यवस्था भारत की आपराधिक प्रक्रिया और अब नए कानून भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (BNSS) का हिस्सा बनी हुई है।
साल 1984 में तिहाड़ जेल से जुड़े एक मामले में दिल्ली हाईकोर्ट ने कहा था कि पुलिस बिना उचित कारण लोगों को गिरफ्तार करती है और छपे-छपाये प्रोफॉर्मा का इस्तेमाल होता है।
साल 2018 में भी अदालत ने पाया कि आज भी वही प्रोफॉर्मा इस्तेमाल हो रहा है और अधिकारियों को 'मजिस्ट्रेट' की बजाय 'विशेष कार्यकारी अधिकारी' कहने का सुझाव दिया।
इसके अलावा मध्य प्रदेश हाईकोर्ट ने 'नर्मदा बचाओ आंदोलन' के दौरान मेधा पाटकर और अन्य प्रदर्शनकारियों की गिरफ्तारी को अनुचित ठहराते हुए मुआवजे का निर्देश दिया था।
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