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राजनीति

सिंगूर: भाजपा की बड़ी बढ़त, क्या ढहेगा ममता का किला?

बलजीत सिंह शेखावत

सिंगूर सीट पर भाजपा के अरूप कुमार दास टीएमसी के बेचराम मन्ना से काफी आगे चल रहे हैं।

HIGHLIGHTS

  • भाजपा के अरूप कुमार दास सिंगूर सीट पर 13,000 से अधिक वोटों से आगे चल रहे हैं।
  • टीएमसी के सिटिंग विधायक और मंत्री बेचराम मन्ना फिलहाल दूसरे स्थान पर पिछड़ गए हैं।
  • सिंगूर कभी ममता बनर्जी के सत्ता में आने का मुख्य केंद्र और आंदोलन का प्रतीक था।
  • स्थानीय मतदाताओं में रोजगार की कमी और औद्योगिक विकास न होने को लेकर भारी नाराजगी है।
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सिंगूर | पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव 2026 के मतगणना रुझानों ने सबको चौंका दिया है। सिंगूर सीट, जिसे तृणमूल कांग्रेस का अभेद्य किला माना जाता था, वहां अब भाजपा ने बड़ी बढ़त बना ली है। भाजपा उम्मीदवार अरूप कुमार दास फिलहाल सिटिंग विधायक और ममता सरकार के मंत्री बेचराम मन्ना से आगे चल रहे हैं। यह ममता बनर्जी के लिए एक बड़ा राजनीतिक झटका माना जा रहा है।

सिंगूर में मतगणना के ताजा आंकड़े

नौवें राउंड की गिनती पूरी होने के बाद भाजपा के अरूप कुमार दास को 49,753 वोट मिले हैं। वहीं, तृणमूल कांग्रेस के बेचराम मन्ना 36,345 वोटों के साथ दूसरे स्थान पर चल रहे हैं। वर्तमान में भाजपा उम्मीदवार लगभग 13,408 वोटों के अंतर से आगे हैं। हालांकि, अभी भी 12 राउंड की मतगणना बाकी है, जिससे परिणामों में बदलाव की संभावना बनी हुई है। मतगणना केंद्र के बाहर सुरक्षा के कड़े इंतजाम किए गए हैं। शुरुआती राउंड में दोनों दलों के बीच कड़ी टक्कर देखी गई थी, लेकिन धीरे-धीरे भाजपा ने अपनी पकड़ मजबूत कर ली। भाजपा कार्यकर्ताओं में भारी उत्साह देखा जा रहा है, जबकि टीएमसी कैंप में सन्नाटा पसरा है। मतगणना केंद्र के बाहर भाजपा समर्थकों ने जय श्री राम के नारे लगाने शुरू कर दिए हैं।

ममता बनर्जी और सिंगूर का ऐतिहासिक नाता

सिंगूर वही स्थान है जिसने 2006-08 के किसान आंदोलन के जरिए ममता बनर्जी को सत्ता की राह दिखाई थी। टाटा नैनो प्रोजेक्ट के खिलाफ उनके आंदोलन ने बंगाल की राजनीति बदल दी थी। साल 2011 में वाम मोर्चा की 34 साल पुरानी सरकार का अंत हुआ और ममता बनर्जी मुख्यमंत्री बनीं। सिंगूर तब से टीएमसी के लिए एक गौरवशाली प्रतीक बना हुआ था। बेचराम मन्ना, जो स्वयं उस ऐतिहासिक आंदोलन का मुख्य चेहरा रहे हैं, आज अपनी ही सीट बचाने के लिए संघर्ष कर रहे हैं। यह क्षेत्र में बदलती राजनीतिक हवा का संकेत है। सिंगूर का यह इलाका कभी ममता बनर्जी की ताकत का केंद्र हुआ करता था। लेकिन आज यही इलाका उनके राजनीतिक भविष्य के लिए एक बड़ी चुनौती बनकर उभरा है।

जनता की नाराजगी और विकास का मुद्दा

स्थानीय लोगों का कहना है कि आंदोलन के बाद जमीन तो वापस मिल गई, लेकिन उद्योग नहीं आए। सिंगूर के युवाओं के पास रोजगार के अवसर बेहद सीमित हो गए हैं। एक स्थानीय मतदाता ने मीडिया से बात करते हुए कहा कि, हमें जमीन मिली लेकिन भविष्य नहीं। खाली पड़ी फैक्ट्रियों की जमीन पर अब सिर्फ जंगली घास उग रही है और राजनीति हो रही है। मध्यम वर्ग और युवा मतदाता अब औद्योगिक विकास और नौकरियों की मांग कर रहे हैं। यही कारण है कि इस बार सिंगूर का मूड पूरी तरह से बदला हुआ नजर आ रहा है। पुराने किसान आज भी आंदोलन की यादों में जी रहे हैं, लेकिन नई पीढ़ी को केवल रोजगार चाहिए। वे अब किसी भी राजनीतिक वादे के झांसे में आने को तैयार नहीं हैं।

भाजपा का आक्रामक प्रचार और मोदी का प्रभाव

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने हुगली जिले और विशेष रूप से सिंगूर पर अपना ध्यान केंद्रित किया था। उन्होंने अपनी रैलियों में यहां 'महाजंगल राज' खत्म करने का वादा किया था। भाजपा ने सिंगूर को विकास बनाम विनाश की लड़ाई के रूप में पेश किया। उन्होंने वादा किया कि सत्ता में आने पर यहां बड़े उद्योग और भारी निवेश लाए जाएंगे। 2021 के चुनावों में बेचराम मन्ना ने अच्छी जीत दर्ज की थी। लेकिन पांच साल में राजनीतिक समीकरण पूरी तरह बदल गए हैं और भाजपा का जनाधार यहां काफी बढ़ा है। भाजपा के शीर्ष नेतृत्व ने सिंगूर को अपनी प्रतिष्ठा का प्रश्न बना लिया था। उन्होंने घर-घर जाकर लोगों को यह समझाने की कोशिश की कि टीएमसी ने उन्हें केवल धोखा दिया है।

निष्कर्ष और भविष्य की राह

यदि वर्तमान रुझान अंतिम परिणाम में बदलते हैं, तो यह बंगाल की राजनीति में एक नए युग की शुरुआत होगी। सिंगूर का पतन टीएमसी के लिए आत्ममंथन का विषय होगा। बंगाल की जनता अब केवल भावनात्मक मुद्दों पर नहीं, बल्कि विकास और रोजगार के नाम पर वोट दे रही है। सिंगूर का यह परिणाम पूरे राज्य के लिए एक बड़ा संदेश है। आने वाले कुछ घंटों में स्थिति और भी स्पष्ट हो जाएगी, लेकिन अभी तक के रुझान भाजपा के पक्ष में जाते दिख रहे हैं। सिंगूर का यह बदलाव ऐतिहासिक साबित हो सकता है।

*Edit with Google AI Studio

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