नई दिल्ली | कांग्रेस की दिग्गज नेता और संसदीय दल की प्रमुख सोनिया गांधी ने महिला आरक्षण के मुद्दे पर केंद्र सरकार को घेरा है। उन्होंने एक प्रमुख समाचार पत्र में लेख लिखकर सरकार की मंशा पर गंभीर सवाल खड़े किए हैं।
सोनिया गांधी का कहना है कि महिला आरक्षण बिल का असली मुद्दा आरक्षण नहीं, बल्कि परिसीमन है। उन्होंने सरकार द्वारा बुलाए गए संसद के विशेष सत्र की आवश्यकता पर भी कड़ा प्रश्नचिन्ह लगाया है।
उनका मानना है कि जब तमिलनाडु और पश्चिम बंगाल जैसे राज्यों में चुनाव प्रचार अपने चरम पर है, तब इस तरह का सत्र बुलाना केवल राजनीतिक लाभ लेने की कोशिश है। सरकार विपक्षी दलों से उन बिलों का समर्थन मांग रही है जिन्हें वह जबरदस्ती पास कराना चाहती है।
सोनिया गांधी का महिला आरक्षण पर हमला: महिला आरक्षण पर सोनिया गांधी का बड़ा दावा: कहा- परिसीमन असली मुद्दा, चुनाव के बीच विशेष सत्र क्यों?
सोनिया गांधी ने महिला आरक्षण बिल के समय और परिसीमन की शर्त पर सवाल उठाए हैं। उन्होंने सरकार पर राजनीतिक लाभ के लिए विशेष सत्र बुलाने का आरोप लगाया है।
HIGHLIGHTS
- सोनिया गांधी ने महिला आरक्षण के बजाय परिसीमन को असली मुद्दा बताया।
- कांग्रेस, भाजपा और जेडीयू ने अपने सांसदों के लिए 16-18 अप्रैल का व्हिप जारी किया है।
- विपक्ष ने महिला आरक्षण को 2024 के लोकसभा चुनाव से ही लागू करने की मांग की।
- सरकार परिसीमन कानून में संशोधन के लिए संविधान संशोधन के साथ अलग बिल ला सकती है।
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परिसीमन और जनगणना का पेंच
सोनिया गांधी ने लिखा कि 'नारी शक्ति वंदन अधिनियम' को 2023 में ही पारित कर दिया गया था। लेकिन सरकार ने इसे लागू करने के लिए अगली जनगणना और परिसीमन की शर्त रख दी है।
उनके अनुसार, यह शर्त इस कानून के क्रियान्वयन में अनावश्यक देरी करने का एक तरीका मात्र है। उन्होंने पूछा कि आखिर इस कानून को लागू करने के लिए जनगणना का इंतजार क्यों किया जा रहा है?
विपक्ष का तर्क है कि यदि सरकार वास्तव में गंभीर होती, तो इसे 2024 के लोकसभा चुनावों से ही प्रभावी बनाया जा सकता था। लेकिन सरकार ने अनुच्छेद 334-A में बदलाव कर इसे 2029 तक टालने की योजना बनाई है।
विशेष सत्र और तीन पार्टियों का व्हिप
संसद का यह विशेष सत्र 16 से 18 अप्रैल तक चलना प्रस्तावित है। इस सत्र की गंभीरता को देखते हुए देश की तीन बड़ी राजनीतिक पार्टियों ने अपने सांसदों के लिए व्हिप जारी कर दिया है।
भारतीय जनता पार्टी, कांग्रेस और जनता दल यूनाइटेड (JDU) ने अपने-अपने सांसदों को सदन में अनिवार्य रूप से उपस्थित रहने का निर्देश दिया है। भाजपा ने रविवार को ही तीन लाइन का व्हिप जारी किया था।
इसके बाद सोमवार को कांग्रेस और जेडीयू ने भी अपने सांसदों को सत्र के दौरान दिल्ली में मौजूद रहने को कहा। यह दिखाता है कि आगामी सत्र में महिला आरक्षण और परिसीमन पर तीखी बहस होने वाली है।
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मल्लिकार्जुन खड़गे की प्रधानमंत्री को चिट्ठी
कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे ने भी इस मामले में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को पत्र लिखा है। उन्होंने चुनाव के बीच सत्र बुलाने को अनुचित बताया और सरकार की हड़बड़ी पर सवाल उठाए।
खड़गे ने मांग की है कि इस संवेदनशील मुद्दे पर पहले एक सर्वदलीय बैठक बुलाई जानी चाहिए। उन्होंने परिसीमन से जुड़ी पेचीदगियों पर विस्तार से चर्चा करने की आवश्यकता जताई है ताकि महिलाओं को उनका हक तुरंत मिल सके।
विपक्ष का कहना है कि आरक्षण को भविष्य की तारीखों पर टालना महिलाओं के साथ अन्याय है। प्रधानमंत्री को यू-टर्न लेने में 30 महीने क्यों लगे, इसका जवाब जनता जानना चाहती है।
क्या है सरकार की नई योजना?
खबरों के मुताबिक, सरकार राज्यों की विधानसभाओं में भी इसी अनुपात में सीटों के आरक्षण का प्रावधान करने वाली है। इसके लिए एक नया संशोधन बिल जल्द ही सदन के पटल पर रखा जा सकता है।
दिलचस्प बात यह है कि नई सीटों का निर्धारण 2027 की जनगणना के बजाय 2011 के आंकड़ों के आधार पर करने पर भी विचार हो रहा है। इससे प्रक्रिया में तेजी आने की संभावना जताई जा रही है।
यह कानून न केवल राज्यों की विधानसभाओं, बल्कि दिल्ली, जम्मू-कश्मीर और पुडुचेरी जैसे केंद्र शासित प्रदेशों में भी लागू किया जाएगा। इसके लिए सरकार परिसीमन कानून में बदलाव के लिए एक साधारण बिल भी पेश करेगी।
सोनिया गांधी ने सवाल किया कि पांच राज्यों के चुनाव परिणाम आने तक का इंतजार क्यों नहीं किया गया? इतनी हड़बड़ी दिखाना सरकार की राजनीतिक घबराहट को दर्शाता है। अब देखना यह है कि विशेष सत्र में इस पर क्या नतीजा निकलता है।
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