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राज्य

माउंट आबू: नियमों के विरुद्ध अवैध रूप से बने बड़े कॉटेज बंग्लोज पर चल पाएगा पीला पंजा

गणपत सिंह मांडोली

क्या कभी इन रसूखदारों की बड़ी-बड़ी अट्टालिकाओं और आलीशान बंगलों पर भी कार्रवाई होगी? क्या भविष्य में यह तय हो पाएगा कि कानून सबके लिए बराबर है? फिलहाल जनता के इन ज्वलंत सवालों का जवाब प्रशासन के पास नहीं है और यह पूरी तरह से निरुत्तर है।

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HIGHLIGHTS

  • माउंट आबू में अवैध निर्माण पर कार्रवाई में प्रशासन की 'पिक एंड चूज' (चयनित) नीति। गुरु शिखर रोड पर जवाई गांव के सामने इको-सेंसेटिव जोन के नियमों की उड़ी धज्जियां। 20 डिग्री ढलान के नियम को तोड़कर 150 फीट की ऊंचाई पर बना धनाढ्य का आलीशान बंगला। आम आदमी के छप्पर पर तुरंत पहुंचता है प्रशासन, बड़े रसूखदारों के आगे अफसर नतमस्तक।
the yellow claw demolition machinery will be used against large cottage bungalows built illegally in violation of regulations

माउंट आबू | लंबे समय से माउंट आबू का इतिहास इस बात का गवाह रहा है कि यहां अवैध निर्माण और अतिक्रमण के खिलाफ होने वाली कार्रवाई केवल छोटे-मोटे व्यवसायियों, दुकानदारों या सामान्य नागरिकों तक ही सीमित रह जाती है। जब बात किसी ताकतवर नेता, उनके रिश्तेदारों या किसी बड़े धनाढ्य व्यक्तित्व की आती है, तो प्रशासन के अफसर पूरी तरह से नतमस्तक नजर आते हैं। धनबल और उपहारों की चमक के आगे यहां सब कुछ जायज सिद्ध कर दिया जाता है।

गुरु शिखर रोड पर नियमों की खुली अनदेखी

गुरु शिखर रोड पर जवाई गांव के ठीक सामने बना एक आलीशान बंगला इस प्रशासनिक लापरवाही का जीता-जागता उदाहरण है। यह निर्माण केवल नियमों के विपरीत ही नहीं है, बल्कि 'इको-सेंसेटिव जोन' (Eco-Sensitive Zone) के दिशा-निर्देशों की भी घोर अवहेलना करते हुए बनाया गया है।

नियमों के अनुसार, इस ग्रामीण क्षेत्र में नए निर्माण की अनुमति कभी नहीं थी। वर्ष 2025 का मास्टर प्लान लागू होने के बावजूद, करीब 150 फीट की ऊंचाई पर बना यह बंगला किसी बड़े 'सेठ' का बताया जा रहा है। विडंबना यह है कि प्रशासन के 'पीले पंजे' (बुलडोजर) का यहां पहुंचना तो दूर, इस पर विचार करना भी प्रशासन के एजेंडे में शामिल नहीं दिखता। प्रशासन को सारी समस्याएं केवल जन-सामान्य के छोटे निर्माणों से ही नजर आती हैं।

इको-सेंसेटिव जोन के नियमों की उड़ती धज्जियां

माउंट आबू में ऐसे अवैध और नियमों के पार जाकर बने निर्माणों की एक लंबी श्रृंखला है, जिन्हें गिनाने में ही महीनों लग जाएंगे। इको-सेंसेटिव जोन का स्पष्ट नियम यह कहता है कि 20 डिग्री से अधिक ढलान वाली चट्टानों पर कोई भी निर्माण कार्य नहीं किया जा सकता।

लेकिन, रसूखदारों की ये बड़ी-बड़ी अट्टालिकाएं चट्टानों पर इस कदर बनी हैं कि यदि नापा जाए, तो ढलान का यह आंकड़ा 150 डिग्री को भी पार कर सकता है। रसूख और धनबल का प्रभाव देखिए कि प्रशासन की नजरें इन पर इनायत तक नहीं होतीं, इन्हें तोड़ना तो बहुत दूर की बात है।

प्रशासन की 'पिक एंड चूज' नीति और जनता में रोष

प्रशासन लगातार "पिक एंड चूज" (Pick and Choose) की नीति अपना रहा है। अर्थात्, केवल चयनित कमजोर व्यक्तियों को ही निशाना बनाकर प्रशासन अपना शक्ति प्रदर्शन करता आया है, और वर्तमान में भी यही सिलसिला जारी है।

पूरे शहर में इस बात की गहरी चर्चा है कि आम आदमी का घर कभी भी तोड़ दिया जाता है। वह जब भी कोई छोटा-मोटा निर्माण करना चाहता है, तो प्रशासन के कारिंदे तुरंत वहां पहुंच जाते हैं और निर्माण को ध्वस्त कर दिया जाता है।

सबसे बड़ा सवाल: क्या कभी इन रसूखदारों की बड़ी-बड़ी अट्टालिकाओं और आलीशान बंगलों पर भी कार्रवाई होगी? क्या भविष्य में यह तय हो पाएगा कि कानून सबके लिए बराबर है? फिलहाल जनता के इन ज्वलंत सवालों का जवाब प्रशासन के पास नहीं है और यह पूरी तरह से निरुत्तर है।

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