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राजनीति

सियासत में परिवारवाद: आबूरोड चुनाव: टिकट नहीं, रिश्ते बंटे

गणपत सिंह मांडोली

आबूरोड नगर पालिका चुनाव में टिकट वितरण में परिवारवाद हावी है। कांग्रेस ने दो पति-पत्नी जोड़ों को मैदान में उतारा है, जबकि भाजपा ने भी पूर्व अध्यक्ष और पदाधिकारियों के परिजनों पर भरोसा जताया है।

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HIGHLIGHTS

  • आबूरोड चुनाव में कांग्रेस ने दो पति-पत्नी जोड़ों को टिकट देकर मैदान में उतारा है।
  • भाजपा ने भी पूर्व पालिका अध्यक्ष और पदाधिकारियों के रिश्तेदारों पर बड़ा दांव लगाया है।
  • अनुभवी नेता अर्जुन सिंह सातवीं बार और गणेश आचार्य पांचवीं बार पार्षद का चुनाव लड़ रहे हैं।
  • चुनाव में परिवार की विरासत और प्रत्याशी की व्यक्तिगत छवि के बीच कड़ा मुकाबला देखने को मिलेगा।
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आबूरोड | नगर पालिका चुनाव में टिकटों की तस्वीर साफ होते ही आबूरोड की सियासत में पार्टी से ज्यादा परिवार और संगठन से ज्यादा राजनीतिक रिश्ते चर्चा में आ गए हैं। 40 वार्डों के इस चुनावी रण में भाजपा और कांग्रेस दोनों ने ऐसे चेहरों पर भरोसा जताया है, जिनके पीछे कहीं परिवार की राजनीतिक पहचान है तो कहीं संगठन में सक्रिय रिश्तेदारों का प्रभाव।

कांग्रेस का 'दो वार्ड, एक परिवार' का दांव

कांग्रेस के टिकट वितरण ने तो इस तस्वीर को और भी दिलचस्प बना दिया है। यहां पार्टी ने एक अनूठी रणनीति अपनाते हुए परिवार की राजनीतिक ताकत को दोगुना करने की कोशिश की है।

पति-पत्नी की दो जोड़ियां मैदान में

कांग्रेस ने दो वार्डों में पति-पत्नी की दो जोड़ियों को एक साथ चुनावी मैदान में उतारा है। सुमित जोशी और उनकी पत्नी शोभा जोशी अलग-अलग वार्डों से कांग्रेस के टिकट पर अपनी किस्मत आजमा रहे हैं।

इसी तरह, कांतिलाल और उनकी पत्नी वीणा भी पार्टी के आधिकारिक प्रत्याशी हैं। इसका मतलब है कि कांग्रेस के दो परिवारों की चार राजनीतिक किस्मतें अब अलग-अलग वार्डों में मतदाताओं के फैसले का इंतजार कर रही हैं।

पारिवारिक पकड़ की होगी परीक्षा

पति-पत्नी दोनों के मैदान में होने से इन वार्डों में मुकाबला केवल पार्टी के सिंबल का नहीं रह गया है। अब परिवार की व्यक्तिगत पकड़, वर्षों का जनसंपर्क और स्थानीय पहचान भी चुनावी समीकरण का एक महत्वपूर्ण हिस्सा बन गई है। यह देखना दिलचस्प होगा कि एक परिवार की राजनीतिक सक्रियता दो वार्डों में कांग्रेस को कितना फायदा पहुंचाती है।

भाजपा ने भी 'अपनों' पर जताया भरोसा

विपक्षी दल भाजपा का टिकट वितरण भी परिवार और संगठन के समीकरणों से अछूता नहीं रहा है। पार्टी ने भी संगठन के पुराने और मौजूदा चेहरों की राजनीतिक पूंजी को उनके परिवारों के जरिए चुनावी मैदान में उतारा है।

संगठन के चेहरों के परिजन बने प्रत्याशी

भाजपा की सूची में कई प्रमुख नाम शामिल हैं जो पार्टी पदाधिकारियों के रिश्तेदार हैं:

  • पूर्व पालिका अध्यक्ष मगनदान चारण की पत्नी पुष्पा चारण वार्ड 6 से मैदान में हैं।
  • भाजपा मंडल अध्यक्ष मनीष सिंघल की पत्नी मेनका सिंघल वार्ड 18 से चुनाव लड़ रही हैं।
  • उपाध्यक्ष विक्रम सिंह की पत्नी पायल कंवर को वार्ड 7 से टिकट मिला है।
  • आईटी सेल संयोजक अजय ढाका की माता भावना वार्ड 27 से प्रत्याशी हैं।
  • भाजपा महामंत्री भवानी सिंह की बेटी चारुल कंवर वार्ड 15 से अपनी दावेदारी पेश कर रही हैं।

संगठन की ताकत और परिवार की पहचान

भाजपा के लिए अब सबसे बड़ी चुनौती यही है कि संगठन की जमीनी ताकत और इन परिवारों की स्थानीय पहचान को वोटों में कितनी मजबूती से बदला जा सकता है। पार्टी को उम्मीद है कि इन चेहरों के जरिए वह मतदाताओं तक आसानी से पहुंच सकेगी।

अनुभवी खिलाड़ी भी मैदान में

परिवार और संगठन के चेहरों के बीच कुछ अनुभवी खिलाड़ियों की मौजूदगी भी इस मुकाबले को और रोचक बना रही है। ये वो चेहरे हैं जो दशकों से आबूरोड की राजनीति में सक्रिय हैं और कई चुनाव देख चुके हैं।

सातवीं बार अर्जुन, पांचवीं बार गणेश

इन अनुभवी नेताओं में अर्जुन सिंह का नाम प्रमुख है, जो सातवीं बार पार्षद का चुनाव लड़ रहे हैं। वहीं, गणेश आचार्य भी पांचवीं बार चुनावी मैदान में अपनी किस्मत आजमाने उतरे हैं।

इन प्रत्याशियों के लिए इस बार सिर्फ पार्टी का चुनाव चिन्ह ही काफी नहीं होगा। उनके पुराने जनसंपर्क, व्यक्तिगत पकड़ और वर्षों की राजनीतिक पहचान की असली परीक्षा अब मतपेटी में होगी।

विरासत जीतेगी या वार्ड की पसंद?

आबूरोड का यह चुनाव एक तरह से परिवार, संगठन और व्यक्तिगत जनाधार की त्रिकोणीय परीक्षा बनता दिखाई दे रहा है। एक तरफ राजनीतिक परिवारों की अगली पीढ़ी और रिश्तेदार मैदान में हैं, तो दूसरी तरफ मतदाताओं के सामने यह फैसला करने की चुनौती है कि वे नाम और नेटवर्क को तवज्जो देंगे या वार्ड के काम और प्रत्याशी की व्यक्तिगत छवि को।

मतदाताओं के हाथ में अंतिम फैसला

पार्टियों ने अपने हिसाब से समीकरण साध लिए हैं, प्रत्याशी मैदान में उतर चुके हैं और जीत के दावे भी शुरू हो गए हैं। लेकिन चुनावी मैदान में पार्टी का टिकट भले ही ऊपर से मिलता है, लेकिन वोट वार्ड की जनता ही देती है।

अंतिम फैसला टिकट देने वाले नेताओं का नहीं होगा। फैसला उस मतदाता का होगा, जिसके हाथ में न परिवार की विरासत है, न संगठन का पद—सिर्फ एक वोट है।

*Edit with Google AI Studio

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