Mount abu अवैध निर्माण पर सवाल: एसडीएम कार्यालय के ठीक सामने खड़ी हुई चार मंजिला इमारत
माउंट आबू | राजस्थान के एकमात्र पर्वतीय पर्यटन स्थल माउंट आबू में इन दिनों प्रशासन की कार्यप्रणाली और निर्माण संबंधी नियमों की निष्पक्षता को लेकर गंभीर सवाल खड़े हो रहे हैं। मामला एसडीएम कार्यालय और पटवार गृह के ठीक सामने बनी एक चार मंजिला इमारत से जुड़ा है, जिसने स्थानीय प्रशासन के दावों और जमीनी हकीकत के बीच के अंतर को उजागर कर दिया है।
स्थानीय सूत्रों और प्राप्त जानकारी के अनुसार, इस स्थल पर निर्माण की अनुमति केवल 'रिपेयरिंग' (मरम्मत) के नाम पर ली गई थी। नियमानुसार, रिपेयरिंग का अर्थ भवन के मौजूदा स्वरूप को बरकरार रखते हुए उसकी मरम्मत करना होता है। यदि वहां पूर्व में दो मंजिला भवन था, तो उसे उसी ऊंचाई तक सीमित रहना चाहिए था। लेकिन वास्तविकता यह है कि वहां अब एक भव्य चार मंजिला इमारत खड़ी हो चुकी है। सवाल यह उठता है कि क्या प्रशासन ने इस अतिरिक्त निर्माण की अनुमति वैध रूप से दी है या यह पूरी तरह से नियमों का उल्लंघन है?
वर्तमान एसडीएम और ईएसजेड (ESZ) नोडल प्रभारी डॉ. अंशु प्रिया की भूमिका पर भी उंगलियां उठ रही हैं। चर्चा है कि क्या उनके कार्यालय के ठीक सामने हो रहे इस बड़े निर्माण की जानकारी उन्हें नहीं है? स्थानीय लोगों का आरोप है कि प्रशासन अक्सर आम आदमी के छोटे-मोटे मरम्मत कार्यों पर तो कड़ी कार्रवाई करता है और उनकी फाइलें महीनों तक अटकाए रखता है, लेकिन प्रभावशाली और धनाढ्य वर्ग के लिए नियम लचीले हो जाते हैं। आम जनता का कहना है कि प्रशासन अपनी एसीआर (ACR) चमकाने के लिए केवल गरीबों के घरों पर कार्रवाई करने तक सीमित रहता है, जबकि रसूखदारों के अवैध निर्माणों से मुंह मोड़ लिया जाता है।
यह मामला इसलिए भी गंभीर है क्योंकि माउंट आबू में निर्माण कार्यों को लेकर माननीय सर्वोच्च न्यायालय, एनजीटी और राजस्थान उच्च न्यायालय के सख्त निर्देश प्रभावी हैं। पंचायत भवन के रूप में जानी जाने वाली इस इमारत का निर्माण उन आदेशों की धज्जियां उड़ाता प्रतीत होता है। वर्ष 2022 की स्थिति, जब यहां एसडीएम राहुल जैन तैनात थे, और आज की स्थिति में जमीन-आसमान का अंतर है। यदि मूल फाइल की जांच की जाए, तो स्पष्ट हो जाएगा कि जर्जर इमारत के नाम पर यहां क्या खेल खेला गया है।
माउंट आबू की जनता में इस बात को लेकर भारी रोष है कि प्रभावशाली लोग रातों-रात चट्टानें काटकर, पेड़ गिराकर और मिट्टी हटाकर बहुमंजिला इमारतें खड़ी कर लेते हैं, जबकि एक स्थानीय निवासी को अपने घर में एक कमरा बनवाने के लिए भी प्रशासन के सैकड़ों चक्कर काटने पड़ते हैं। प्रशासन का यह दोहरा चरित्र न केवल कानून व्यवस्था पर सवाल खड़ा करता है, बल्कि अवैध निर्माण की प्रवृत्ति को भी बढ़ावा देता है। अब देखना यह है कि क्या उच्चाधिकारी इस मामले में कोई निष्पक्ष जांच करेंगे या रसूखदारों के आगे मौन ही रहेंगे।