नई दिल्ली | द्रविड़ मुनेत्र कड़गम (DMK) ने भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के साथ अपना दशकों पुराना गठबंधन आधिकारिक तौर पर समाप्त कर दिया है। यह राजनीतिक घटनाक्रम भारतीय राजनीति की दिशा बदल सकता है।
DMK-कांग्रेस गठबंधन का अंत: DMK ने तोड़ा कांग्रेस से नाता, लोकसभा में अलग बैठने की मांग
द्रविड़ मुनेत्र कड़गम ने लोकसभा अध्यक्ष को पत्र लिखकर कांग्रेस से गठबंधन खत्म होने की पुष्टि की।
HIGHLIGHTS
- DMK सांसद कनिमोझी ने लोकसभा अध्यक्ष को पत्र लिखकर गठबंधन खत्म होने की जानकारी दी।
- पार्टी ने लोकसभा में कांग्रेस के सदस्यों से अलग बैठने के लिए नई सीटों की मांग की है।
- मई 2026 में हुए इस राजनीतिक अलगाव से विपक्षी एकता को बड़ा झटका लगा है।
- DMK अब संसद में एक स्वतंत्र क्षेत्रीय शक्ति के रूप में अपनी भूमिका निभाएगी।
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लोकसभा में बड़े फेरबदल की तैयारी
DMK ने संसद के निचले सदन में अपनी स्थिति स्पष्ट कर दी है। पार्टी ने लोकसभा अध्यक्ष से बैठने की व्यवस्था बदलने का अनुरोध किया है।
थूथुकुडी से सांसद और DMK संसदीय दल की नेता कनिमोझी करुणानिधि ने इस संबंध में एक औपचारिक पत्र लिखा है। यह पत्र 7 मई, 2026 को जारी किया गया।
इस पत्र में कनिमोझी ने स्पष्ट किया कि कांग्रेस के साथ DMK का गठबंधन अब पूरी तरह समाप्त हो चुका है। इसलिए अब साथ बैठना उचित नहीं है। द्रविड़ मुन्नेत्र कड़गम (DMK) भारत में एक प्रमुख राजनीतिक शक्ति है, जिसके पास मई 2026 तक लोकसभा में 22 सीटें और राज्यसभा में 10 सीटें हैं।
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कनिमोझी का पत्र और राजनीतिक संदेश
कनिमोझी के पत्र ने राजनीतिक हलकों में हलचल पैदा कर दी है। पत्र में कहा गया है कि बदली हुई परिस्थितियों में गठबंधन का बने रहना संभव नहीं है।
पार्टी ने मांग की है कि DMK सदस्यों को कांग्रेस के ब्लॉक से दूर अलग सीटें आवंटित की जाएं। यह मांग पार्टी की स्वायत्तता को दर्शाती है।
DMK का मानना है कि अलग बैठने से उनके सदस्य सदन की कार्यवाही में अधिक प्रभावी ढंग से भाग ले सकेंगे। यह कदम प्रतीकात्मक रूप से भी बहुत महत्वपूर्ण है।

गठबंधन का औपचारिक अंत
यह अलगाव केवल चुनावी नहीं, बल्कि विधायी भी है। संसद के रिकॉर्ड में अब DMK और कांग्रेस को अलग-अलग समूहों के रूप में देखा जाएगा।
DMK और कांग्रेस का साथ काफी लंबा रहा है। दोनों दलों ने कई वर्षों तक केंद्र और राज्य स्तर पर मिलकर चुनाव लड़े हैं।
हालांकि, पिछले कुछ समय से दोनों दलों के बीच वैचारिक और रणनीतिक मतभेद उभर रहे थे। इन मतभेदों ने अब एक औपचारिक अलगाव का रूप ले लिया है।
विपक्षी एकता को लगा गहरा झटका
राष्ट्रीय स्तर पर विपक्षी गठबंधन के लिए यह एक बहुत बड़ी क्षति है। DMK विपक्षी खेमे का एक मजबूत स्तंभ मानी जाती थी।
दक्षिण भारत में DMK की पकड़ बहुत मजबूत है। उनके पास लोकसभा में सांसदों की एक बड़ी संख्या है, जो विपक्ष को मजबूती प्रदान करती थी।
इस अलगाव के बाद कांग्रेस को राष्ट्रीय स्तर पर अपनी रणनीति पर फिर से विचार करना होगा। विपक्ष की सामूहिक शक्ति अब कमजोर पड़ती दिखाई दे रही है।
कांग्रेस के लिए बड़ी चुनौती
कांग्रेस के लिए यह समय आत्ममंथन का है। अपने सबसे भरोसेमंद सहयोगियों में से एक को खोना पार्टी के लिए एक गंभीर चेतावनी है।
तमिलनाडु जैसे महत्वपूर्ण राज्य में कांग्रेस अब अलग-थलग पड़ सकती है। वहां पार्टी पूरी तरह से द्रविड़ दलों के समर्थन पर निर्भर रही है।
राष्ट्रीय राजनीति में अन्य क्षेत्रीय दल भी अब अपनी शर्तों पर बात करेंगे। DMK के इस कदम से अन्य दलों को भी स्वतंत्र होने की प्रेरणा मिल सकती है।
तमिलनाडु के चुनावी समीकरणों में बदलाव
तमिलनाडु की राजनीति हमेशा से ही गठबंधन आधारित रही है। DMK और कांग्रेस के टूटने से वहां एक नया राजनीतिक शून्य पैदा हो सकता है।
DMK अब अपनी क्षेत्रीय ताकत के दम पर अकेले आगे बढ़ने की योजना बना रही है। उन्हें विश्वास है कि वे बिना किसी राष्ट्रीय बैगेज के सफल होंगे।
वहीं, कांग्रेस को अब राज्य में नए सहयोगियों की तलाश करनी होगी। यह कार्य उनके लिए काफी चुनौतीपूर्ण साबित होने वाला है।
क्षेत्रीय दलों की बढ़ती ताकत
DMK का यह फैसला क्षेत्रीय गौरव और स्वायत्तता की राजनीति का हिस्सा है। वे अब राष्ट्रीय दलों के दबाव से मुक्त होकर काम करना चाहते हैं।
तमिलनाडु के मुख्यमंत्री एम.के. स्टालिन के नेतृत्व में पार्टी ने अपनी स्थिति को काफी मजबूत किया है। वे अब राष्ट्रीय राजनीति में एक निर्णायक भूमिका चाहते हैं।
क्षेत्रीय दलों का मानना है कि राष्ट्रीय दल अक्सर उनकी स्थानीय चिंताओं को नजरअंदाज कर देते हैं। DMK का विद्रोह इसी असंतोष का परिणाम है।
भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के साथ हमारा गठबंधन अब समाप्त हो चुका है।
भविष्य की राजनीतिक रणनीति
DMK अब संसद में एक स्वतंत्र इकाई के रूप में मतदान करेगी। वे मुद्दों के आधार पर सरकार या विपक्ष का समर्थन करने के लिए स्वतंत्र होंगे।
यह स्थिति DMK को केंद्र सरकार के साथ सौदेबाजी करने की बेहतर शक्ति प्रदान करेगी। वे तमिलनाडु के हितों को अधिक मुखरता से उठा सकेंगे।
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि यह अलगाव 2029 के आम चुनावों की तैयारी का हिस्सा हो सकता है। DMK अपनी नई जमीन तैयार कर रही है।
स्वतंत्र पहचान की तलाश
कनिमोझी ने अपने पत्र के माध्यम से यह संदेश दिया है कि DMK किसी की पिछलग्गू पार्टी नहीं है। उनकी अपनी एक अलग और मजबूत पहचान है।
संसद में सीटों का बदलाव केवल बैठने की जगह का बदलाव नहीं है। यह विचारधारा और भविष्य की राजनीति के बदलाव का प्रतीक है।
आने वाले दिनों में यह देखना दिलचस्प होगा कि कांग्रेस इस झटके से कैसे उबरती है। क्या वे DMK को वापस मनाने की कोशिश करेंगे?
निष्कर्ष
DMK और कांग्रेस का अलग होना भारतीय राजनीति की एक बड़ी घटना है। इसने विपक्षी खेमे की गणित को पूरी तरह से बिगाड़ दिया है।
कनिमोझी का पत्र केवल एक प्रशासनिक अनुरोध नहीं, बल्कि एक राजनीतिक घोषणापत्र है। DMK अब अपने दम पर आसमान छूने को तैयार है।
इस फैसले का असर न केवल संसद के भीतर, बल्कि तमिलनाडु की गलियों तक महसूस किया जाएगा। भारतीय राजनीति अब एक नए दौर में प्रवेश कर रही है।
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