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हिंदुस्तान जिंक टैक्स विवाद खत्म: हिंदुस्तान जिंक का 27 साल पुराना टैक्स विवाद सुलझा: राजस्थान हाईकोर्ट ने आयकर विभाग और कंपनी के बीच किया फैसला, जानें किसे मिली राहत और किसे झटका

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राजस्थान हाईकोर्ट की जोधपुर पीठ ने हिंदुस्तान जिंक और आयकर विभाग के बीच चल रहे 27 साल पुराने कानूनी विवाद का निपटारा कर दिया है। कोर्ट ने दो अलग-अलग वर्षों के मामलों में एक में कंपनी को राहत दी है, जबकि दूसरे में विभाग की दलील को सही माना है।

HIGHLIGHTS

  • हिंदुस्तान जिंक और आयकर विभाग के बीच 27 साल से चल रहा कानूनी विवाद आखिरकार समाप्त हो गया है।
  • राजस्थान हाईकोर्ट ने 1993-94 के मामले में कंपनी को रिफंड की अनुमति देकर राहत प्रदान की है।
  • कर निर्धारण वर्ष 1995-96 में कोर्ट ने विभाग के पक्ष में फैसला देते हुए रिफंड के दावे को खारिज किया।
  • कोर्ट ने स्पष्ट किया कि KVSS योजना के तहत जारी प्रमाण पत्र अंतिम होता है और उसे दोबारा नहीं खोला जा सकता।
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जोधपुर | राजस्थान के न्यायिक इतिहास में टैक्स से जुड़े सबसे पुराने मामलों में से एक का अब पटाक्षेप हो गया है। राजस्थान हाईकोर्ट की जोधपुर मुख्यपीठ ने उदयपुर स्थित दिग्गज कंपनी हिंदुस्तान जिंक लिमिटेड और आयकर विभाग के बीच चल रहे 27 साल पुराने विवाद को सुलझा दिया है। जस्टिस अरुण मोंगा और जस्टिस सुनील बेनीवाल की खंडपीठ ने इस महत्वपूर्ण मामले पर अपना विस्तृत फैसला सुनाया है। कोर्ट ने आयकर विभाग द्वारा दायर की गई दो अलग-अलग अपीलों पर गहराई से सुनवाई की और कानूनी स्थिति स्पष्ट की। इस फैसले के बाद अब स्पष्ट हो गया है कि 'कर विवाद समाधान योजना-1998' (KVSS) के तहत हुए समझौतों की मर्यादा क्या है।

दो अलग-अलग वर्षों का था मामला

यह पूरा कानूनी विवाद मुख्य रूप से कर निर्धारण वर्ष 1993-94 और 1995-96 से जुड़ा हुआ था। कोर्ट ने अपने फैसले में एक साल के मामले में कंपनी को राहत दी है, जबकि दूसरे साल के मामले में विभाग की जीत हुई है। कर निर्धारण वर्ष 1993-94 के मामले में हाईकोर्ट ने आयकर विभाग की अपील को खारिज कर दिया। इसका सीधा मतलब यह है कि इस वर्ष के लिए कंपनी को रिफंड का लाभ प्राप्त होगा। वहीं, कर निर्धारण वर्ष 1995-96 के मामले में कोर्ट ने विभाग की दलीलों को स्वीकार कर लिया है।

क्या है KVSS योजना और विवाद की जड़

इस विवाद की शुरुआत वर्ष 1998-99 में हुई थी, जब केंद्र सरकार ने 'कर विवाद समाधान योजना' (KVSS) पेश की थी। हिंदुस्तान जिंक ने उस समय अपने बकाया करों के निपटान के लिए इस योजना के तहत घोषणा की थी। आयकर आयुक्त ने फरवरी 1999 में प्रमाण पत्र जारी कर समझौते पर अपनी मुहर लगा दी थी। सब कुछ ठीक चल रहा था, लेकिन विवाद तब पैदा हुआ जब रिफंड का मुद्दा सामने आया। आयकर अपीलीय न्यायाधिकरण (ITAT) ने 23 जनवरी 2008 को एक आदेश जारी किया था।

ITAT के आदेश ने बढ़ाई थी हलचल

ITAT ने अपने आदेश में कहा था कि कंपनी के पुराने वर्षों के घाटे को समायोजित किया जाना चाहिए। इस समायोजन के बाद कंपनी को टैक्स रिफंड जारी करने का निर्देश दिया गया था। आयकर विभाग ने ITAT के इस फैसले को हाईकोर्ट में चुनौती देने का निर्णय लिया। विभाग का मुख्य तर्क यह था कि एक बार KVSS के तहत समझौता होने के बाद रिफंड संभव नहीं है। वित्त अधिनियम 1998 की धारा 93 का हवाला देते हुए विभाग ने अपनी बात रखी।

अदालत में वकीलों की जोरदार बहस

आयकर विभाग की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता के.के. बिस्सा ने कोर्ट में अपना पक्ष रखा। उन्होंने तर्क दिया कि KVSS योजना के तहत जमा की गई किसी भी राशि का रिफंड कानूनन मना है। दूसरी ओर, हिंदुस्तान जिंक की ओर से अधिवक्ता अंजय कोठारी और हरप्रीत सिंह ने दलीलें दीं। कंपनी के वकीलों का कहना था कि पिछले वर्षों का घाटा KVSS समझौते के दायरे में नहीं आता। उनका तर्क था कि रिफंड का दावा समझौते से अलग एक स्वतंत्र कानूनी प्रक्रिया है।

1993-94 के मामले में कोर्ट का तर्क

खंडपीठ ने 1993-94 के मामले का विश्लेषण करते हुए पाया कि उस वर्ष का KVSS प्रमाण पत्र अलग प्रकृति का था। कोर्ट ने देखा कि उस वर्ष का समझौता केवल बकाया ब्याज के निपटान के लिए किया गया था। इसमें टैक्स की कोई मूल मांग शामिल नहीं थी, इसलिए रिफंड पर रोक का नियम यहाँ लागू नहीं होता। अदालत ने माना कि साल 1992-93 के 5.53 करोड़ रुपए के घाटे को समायोजित करना सही था। इसके आधार पर कोर्ट ने कंपनी को रिफंड देने के ITAT के निर्देश को बरकरार रखा।

1995-96 के मामले में क्यों मिली विभाग को जीत?

कर निर्धारण वर्ष 1995-96 का मामला थोड़ा जटिल था और इसमें बड़ी राशि शामिल थी। इस वर्ष के लिए विभाग ने 50.30 करोड़ रुपए से ज्यादा की बकाया टैक्स मांग निकाली थी। कंपनी ने KVSS के तहत मात्र 16.84 करोड़ रुपए देकर इस पूरी मांग का सेटलमेंट कर लिया था। इस सेटलमेंट में 22.13 करोड़ रुपए की मुख्य आयकर मांग भी शामिल थी जिसे कम किया गया था। कोर्ट ने कहा कि इतने बड़े डिस्काउंट के बाद फिर से रिफंड मांगना उचित नहीं है।

कानूनी प्रावधानों की व्याख्या

जस्टिस अरुण मोंगा ने अपने फैसले में वित्त अधिनियम 1998 की धारा 90(3) का विशेष उल्लेख किया। उन्होंने स्पष्ट किया कि इस योजना के तहत जारी किया गया प्रमाण पत्र अंतिम और निर्णायक होता है। एक बार मामला बंद हो जाने के बाद उसे किसी भी आधार पर दोबारा नहीं खोला जा सकता। कोर्ट ने माना कि अगर इस मामले में रिफंड दिया जाता है, तो यह कंपनी को अनुचित लाभ देने जैसा होगा। कानूनी भाषा में इसे 'अनजस्ट एनरिचमेंट' की श्रेणी में रखा गया जो स्वीकार्य नहीं है।

27 साल का लंबा इंतजार और सबक

यह मामला दर्शाता है कि भारत में टैक्स से जुड़े विवाद कितने लंबे समय तक खिंच सकते हैं। हिंदुस्तान जिंक जैसी बड़ी कंपनी के लिए यह फैसला वित्तीय स्पष्टता लेकर आया है। विशेषज्ञों का मानना है कि इस फैसले से KVSS जैसी पुरानी योजनाओं के कानूनी पहलुओं पर रोशनी पड़ी है। भविष्य में अन्य कंपनियों के लिए भी यह फैसला एक नजीर की तरह काम करेगा। टैक्स सेटलमेंट करते समय अब कंपनियों को रिफंड की शर्तों पर अधिक ध्यान देना होगा।

फैसले का मुख्य सारांश

  • कोर्ट ने स्पष्ट किया कि KVSS प्रमाण पत्र एक बार जारी होने पर अंतिम होता है।
  • ब्याज और मूल टैक्स मांग के बीच के अंतर को कोर्ट ने बारीकी से समझा।
  • घाटे के समायोजन (Set-off of losses) के नियमों पर विस्तृत चर्चा की गई।
  • आयकर विभाग की अपीलों का आंशिक रूप से निपटारा कर दिया गया।

उदयपुर और हिंदुस्तान जिंक का जुड़ाव

उदयपुर स्थित हिंदुस्तान जिंक दुनिया की प्रमुख जस्ता और सीसा उत्पादक कंपनियों में से एक है। कंपनी का मुख्यालय और मुख्य परिचालन राजस्थान में होने के कारण यह राज्य के लिए महत्वपूर्ण है। ऐसे में कंपनी से जुड़े इतने बड़े टैक्स विवाद का सुलझना औद्योगिक जगत के लिए बड़ी खबर है। कोर्ट के इस फैसले ने अब दशकों पुरानी फाइलों को बंद करने का रास्ता साफ कर दिया है। न्यायपालिका ने एक बार फिर साबित किया है कि कानून की बारीकियां ही अंतिम सत्य तय करती हैं।

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